एशियाड 2010: दुखी है भारतीय खेमा
बीबीसी संवाददाता, ग्वांगजो से
निशानेबाज़ों के प्रदर्शन से भारतीय खेमे में मायूसी है. भारतीय निशानेबाज़ी टीम के बुरे प्रदर्शन से सभी दुखी हैं. कोच सनी टॉमस और राइफ़ल टीम के कोच लैपिडस का कहना है कि खिलाड़ियों को राष्ट्रमंडल खेलों के एक ही महीने के भीतर इस टूर्नामेंट में आना पड़ा जिसकी वजह से उन्हें तैयारी का मौक़ा नहीं मिला.
मगर टीम के एक वरिष्ठ सदस्य ने इसके अलावा एक और वजह बताई. उनका कहना था कि एशियाड की टीम में जिन लोगों का चयन नहीं हुआ उनमें से कुछ ने टीम को बद्दुआएँ भी दी हैं और कहा है कि अच्छा होगा अगर उनके बुरे स्कोर आएँ. अभी हम इस बात की गंभीरता को संबंध समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि तभी मुक़ाबला हारे हुए निशानेबाज़ समरेश जंग उधर से गुज़रे. वो भी उस अधिकारी से मज़ाक में कह गए कि टोना-टोटका हुआ है, झाड़ फूँक करवाइए तभी फ़ायदा होगा.
वुशु और पत्रकार
भारतीय संध्या रानी वुशु के फ़ाइनल में मंगलवार को प्रवेश कर गईं थीं इसलिए यहाँ आए सभी पत्रकारों को पता था कि वुशु में एक पदक मिलेगा. दिनभर में भारत को कहीं कोई पदक नहीं मिला तो भारत से आए लगभग सारे पत्रकार एक साथ वुशु की प्रतियोगिता देखने निकल पड़े. इतने लोग थे कि एक पूरी बस भर गई और आयोजकों को दूसरी बस का इंतज़ाम करना पड़ा.
प्रतियोगिता स्थल पहुँचे तो ज़्यादातर पत्रकार एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे क्योंकि वुशु क्या बला है इसका उन्हें पता ही नहीं था. ख़ैर एक-दो मैच देखकर खेल का और स्कोरिंग का अंदाज़ा हुआ. उसके बाद जब संध्यारानी देवी आईं तो पत्रकार उठ-उठकर चिल्लाते रहे मार-मार, पटक-पटक मगर सब बेक़ार गया और ईरानी ख़दीजा ने स्वर्ण जीत लिया.
टेलिविज़न के पत्रकारों ने तय किया था कि अगर संध्यारानी जीतेंगी तो सभी अलग-अलग इंटरव्यू करेंगे और अगर हारीं तो एकसाथ मिलकर बात करके निकल जाएँगे. हारीं संध्या और काम आसान हुआ पत्रकारों का जो एकसाथ बात करके एक ही बस में भरकर वापस आ गए.
साथियों का समर्थन
भारतीय महिला हॉकी टीम एक बार फिर हार गई. उनके मैच से ठीक पहले भारतीय पुरुष टीम का बांग्लादेश के विरुद्ध मैच ख़त्म हुआ था. पुरुष टीम मैच के बाद का अभ्यास करके जब जाने को तैयार हुई तो महिला टीम का दूसरे हाफ़ का मुक़ाबला अंतिम समय की ओर बढ़ रहा था और भारत 1-0 से पीछे था. खिलाड़ियों ने अपनी किट वहीं किनारे डाली और सब के सब स्टेडियम के किनारे ग्रुप में खड़े होकर टीम का हौसला बढ़ाने लगे.
वे हौसला भी बढ़ा रहे थे और चिल्ला भी रहे थे कि अब गेंद को आगे बढ़ाओ, अब पास दो और अंदर ले जाओ. अंत के समय जब भारत का एक गोल रेफ़री ने नहीं माना तो भारतीय पुरुष टीम के खिलाड़ियों ने भी शोर मचाया, वैसे उससे हुआ कुछ नहीं.
मैच ख़त्म होते ही पुरुष टीम वापस खेल गाँव के लिए निकल गई. बाद में मैंने महिला टीम की कप्तान सुरिंदर कौर से पूछा कि उन्हें पुरुष टीम से मिल रहे समर्थन का पता चला तो उन्होंने कहा कि खेलते समय शोर का तो अंदाज़ा होता है मगर समर्थक है कौन इसका पता नहीं चलता.
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