Tokyo Olympics : हारकर भी दिल जीत गईं मैरी काॅम, याद रहेंगी उनकी उपलब्धियां जो हैं बेहद खास
स्पोर्ट्स डेस्क (राहुल) : चैंपियन कभी हारते नहीं, बल्कि एक मिसाल बनते हैं। मैरीकाॅम भी उन खिलाड़ियों में से एक हैं जिन्होंने अपने खेल से महिलाओं में भी जुनून भरने का काम किया। उन्होंने दिखाया कि औरतें भी किसी से कम नहीं, बस हाैसला होना चाहिए कुछ कर गुजरने का। टोक्यो ओलंपिक में स्टार बाॅक्सर मैरीकाॅम प्री क्वार्टरफाइनल में कोलंबियाई मुक्केबाज और 2016 रियो ओंलपिक की मेडलिस्ट इंग्नित वेलेंशिया से 3-2 से हार गए। उन्हें महिला फ्लायवेट (48-51 किग्रा) स्पर्धा में हार मिली, जिससे भारत की मेडल हासिल करने की उम्मीद भी खत्म हो गई। उन्होंने मैच भले हारा, लेकिन करोड़ों लोगों का दिल जीता और इसके पीछे कई वजहें भी हैं।

मैच हारा, पर लोगों का दिल हमेशा के लिए जीता
कई युवा खिलाड़ियों को आपने खेल के मैदान पर जबरदस्त प्रदर्शन करते देखा होगा। टोक्यो ओलंपिक में भी भारतीय दल से कई युवाओं ने शानदार प्रदर्शन कर सुर्खियां बटोरीं, लेकिन वो मैरी काॅम ही हैं जिन्होंने 38 साल की उम्र में दम दिखाया है। इतनी ज्यादा उम्र में विरोधी से भिड़ना आसान नहीं, लेकिन ये मैरी काॅम ही हैं जिनके अदंर लड़ने का जज्बा था। हार मायने नहीं रखती। मायने यह है कि उन्होंने यहां तक पहुंचने से पहले भी क्या-क्या हासिल किया है। उपलब्धियां भी ऐसी हैं कि अन्य किसी महिला बाॅक्सर के लिए छूना कोई आसान काम नहीं है।

मैरी काॅम पर है हमें गर्व
मणिपुर की रहने वालीं मैरी काॅम 6 बार वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हैं। 2012 के लंदन ओलम्पिक में उन्होंने ब्राॅन्ज मेडल जीता। 2010 के ऐशियाई खेलों में ब्राॅन्ज तथा 2014 के एशियाई खेलों में उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया था। उनके ऊपर 2014 में फिल्म भी आई थी जिसमें उनकी भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई थी। इन सब चीजों को देखते हुए सोशल मीडिया पर लोगों ने मैरी काॅम के लिए प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर पूर्व भारतीय क्रिकेटर वसीम जाफर ने लिखा- गर्व है भारत की बेटी पर, शाबाश। उनके अलावा कई महान दिग्गजों ने मैरी काॅम की उपलब्धियों को याद करते हुए इस हार को भूलाने का काम किया।

पैसों की कमी थी, पर हाैसले की नहीं
घर में पैसों की कमी थी, लेकिन सुपमॉम मैरी काॅम के हाैसले की नहीं। 1 मार्च 1983 को मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक गरीब किसान के परिवार में पैदा हुईं मैरी काॅम ने अपनी प्राथमिक शिक्षा लोकटक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल और सेंट हेवियर स्कूल से पूरी की। फिर आदिमजाति हाई स्कूल, इम्फाल गईं लेकिन परीक्षा में फेल होने के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और फिर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से परीक्षा दी। बचपन से ही उनकी रुचि एथ्लेटिक्स में थी। साल 1999 वो समय था जब उन्होंने खुमान लम्पक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में कुछ लड़कियों को बॉक्सिंग रिंग में लड़कों के साथ बॉक्सिंग के दांव-पेंच आजमाते देखा। फिर इसके बाद उन्होंने भी कदम आगे बढ़ाए। फिर उनके द्वारा जो प्रदर्शन देखने को मिला उससे हर भारतीय रूबरू है।

याद रहेंगी उनकी उपलब्धियां जो हैं बेहद खास-
- अब तक 10 राष्ट्रीय खिताब जीत चुकी है।
- भारत सरकार ने साल 2003 में उन्हे अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया।
- वर्ष 2006 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
- 29 जुलाई, 2009 को भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए चुनी गईं
- लंदन ओलंपिक गेम्स 2012 में ब्राॅन्ज मेडल
- विश्व चैंपियनशिप में आठ मेडल जीते, जिसमें 6 गोल्ड मेडल, एक सिल्वर व एक ब्राॅन्ज मेडल जीता।
- एशियन गेम्स में 2014 में इंचियोन में गोल्ड मेडल, जबकि 2010 गुआंगजो में हुई एशियन गेम्स में ब्राॅन्ज मेडल जीता।
- एशियाई चैंपियनशिप में 5 गोल्ड मेडल, जबकि 2 सिल्वर मेडल जीते।
- 2018 गोल्ड कोस्ट में गोल्ड, जबकि 2009 हनोई में एशियन इंडोर गेम्स के दाैरान गोल्ड मेडल जीता।
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