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Tokyo Olympics : जाट परिवार से है पूजा रानी, पिता से बचने के लिए दोस्त के घर रहना पड़ता था

स्पोर्ट्स डेस्क(नोएडा) : टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रदर्शन अभी तक उतना बेहतर नहीं रहा, जितना की उम्मीद थी। भारत के खाते में अभी तक सिर्फ एक ही मेडल आया है जो वेटलिफ्टिंग में मीराबाई चानू ने दिलाया। मीराबाई ने 49 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीता था। हालांकि पूरे देश को अब बाॅक्सर पूजा रानी से भी मेडल लाने की उम्मीद है जिसने खेल के छठे दिन राउंड ऑफ 16 मुकाबले में शानदार जीत दर्ज की। 30 साल की भारत की अनुभवी मुक्केबाज पूजा रानी ने 20 साल की अल्जीरिया की बॉक्सर इचरक चैब को 5-0 से मात देकर क्वार्टरफाइनल में जगह बनाई। वह अब मेडल से एक कदम दूर हैं। आइए जानते हैं कि आखिर काैन है पूजा रानी, जिनसे अब उम्मीदें लगी हुईं हैं।

जाट परिवार से हैं पूजा रानी

जाट परिवार से हैं पूजा रानी

पूजा का जन्म जन्म 17 फरवरी 1991 को हुआ था। वह हरियाणा राज्य के भिवानी के निमरीवाली गांव के एक जाट परिवार से हैं। पूजा हरियाणा सरकार में आयकर निरीक्षक के रूप में भी काम करती हैं। पूजा रानी मेरी कॉम को अपना रोल मॉडल मानती हैं। जब पूजा काॅलेज में थी तो उनकी बास्केटबॉल में दिलचस्पी थी। वह बास्केटबॉल में अपना करियर बनाना चाहती थीं, लेकिन कोच संजय के कहने पर उन्होंने फैसला बदल दिया। कोच के कहने पर पूजा ने बाॅक्सिंग में हाथ आजमाना शुरू कर दिया, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार अपने नाम किए। हरियाणा सरकार ने उसे भीम अवॉर्ड से भी सम्मानित किया था।

पिता से बचने के लिए दोस्त के घर रहना पड़ता था

पिता से बचने के लिए दोस्त के घर रहना पड़ता था

पूजा की कामयाबी के पीछे एक रोचक बात भी रही है। वो यह है कि वो अपने पिता से छुपके से बाॅक्सिंग खेला करती थी। उसके पिता नहीं चाहते थे कि बेटी बाॅक्सिंग में हाथ आजमाए। उसने अपने ही शहर में हवा सिंह बाॅक्सिंग में ट्रेनिंग शुरू की, लेकिन इस बात को उसने अपने पिता को नहीं बताया था। उसे डर था कि अगर पिता को पता चलेगा तो वह ट्रेनिंग करने के लिए मना कर देगें। ट्रेनिंग के दाैरान पूजा कई बार चोटिल हो जाती थी तो वह पिता से बचने के लिए अपने दोस्त के घर में ही रूक जाया करती थी।

एक इंटरव्यू के दाैरान पूजा ने बताया था कि उसके पिता उसे बताते थे कि 'अच्छे बच्चे बॉक्सिंग नहीं खेलते थे'। फिर कुछ महीनों बाद पूजा ने पिता के साथ अपने करियर को लेकर खुलकर बात की, लेकिन वह नहीं माने। पूजा का ट्रेनिंग करना बंद हो गया, लेकिन फिर उसने अपने कोच से कहा कि वो उसके घरवालों को मनाएं। कोच संजय कुमार श्योराण ने फिर पूजा के पिता को समझाया। फिर भी उसके पिता को मनाने के लिए करीब 6 महीने लग गए थे।

2016 रियो में नहीं बना पाई थी जगह

2016 रियो में नहीं बना पाई थी जगह

पूजा ने 75 किलोग्राम श्रेणी में 2014 एशियाई खेलों में ब्राॅन्ज मेडल जीता। उन्होंने दक्षिण एशियाई खेलों 2016 में गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने एशियाई चैंपियनशिप 75 किलो वजन श्रेणियों में सिल्वर (2012) और ब्राॅन्ज (2015) भी जीता। पूजा ने 75 किलोग्राम श्रेणी में ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों 2014 में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2016 में, वह रियो ओलंपिक में जगह बनाने में नाकाम रहीं थी क्योंकि मई 2016 में महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप के दूसरे दौर में वह हार गईं थीं। फिर 2020 में वह 2020 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक के लिए जगह बनाने में सफल हुईं।

पूजा के करियर की पहली बड़ी जीत 2009 में हुई जब उन्होंने राज्य चैंपियनशिप - नेशनल यूथ बॉक्सिंग चैंपियनशिप 2009 में हरियाणा की एक प्रमुख मुक्केबाज प्रीति बेनीवाल को हराकर सिल्वर मेडल जीता था।

Story first published: Wednesday, July 28, 2021, 17:05 [IST]
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