ओलंपिक मशाल का इतिहास
नई दिल्ली, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। यूनान के प्राचीन शहर ओलंपिया स्थित हीरा के मंदिर के भग्नावशेषों से अपना सफर शुरू करने वाली ओलंपिक मशाल दुनिया की सैर पर है।
दर्पण की मदद से सूर्य की किरणों की तेज से प्रज्जवलित होने वाली यह मशाल ओलंपिक खेलों के आगाज से महीनों पहले अपनी यात्रा खत्म कर मेजबान शहर में पहुंचती है।
आधुनिक ओलंपिक की बात करें तो 1936 के बर्लिन ओलंपिक में पहली बार मशाल यात्रा शुरू हुई। 1952 के ओस्लो ओलंपिक में मशाल ने पहली बार हवाई मार्ग से यात्रा की। 1956 के स्कॉटहोम ओलंपिक में घोड़े की पीठ पर मशाल यात्रा संपन्न की गई। 2000 के सिडनी ओलंपिक में रेगिस्तान पार करते समय घोड़ों का स्थान ऊंटों ने ले लिया।
सन 1960 के रोम ओलंपिक में पहली बार मशाल यात्रा का टेलीविजन प्रसारण हुआ। इस बार इसमें मीडिया ने भी दिलचस्पी दिखाई। 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में मशाल को समुद्र के रास्ते ले जाया गया। 1976 के मांट्रियल ओलंपिक में कनाडा ने एथेंस से ओटावा तक मशाल के सफर का सेटेलाइट प्रसारण किया। 1994 के लिलेहैमल शीतकालीन खेलों के दौरान पैराजंपरों ने पहली बार हवा में मशाल का आदान-प्रदान किया। 2000 के सिडनी ओलंपिक में तो मशाल को ग्रेट बैरियर रीफ के पास समुद्र की गहराइयों में उतारा गया।
क्या है मशाल
आज की मशाल गैस से प्रज्जवलित होती है। समय के साथ इसके स्वरूप, रंग और इसमें प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं में बदलाव आता रहा है लेकिन प्राचीन समय से लेकर आज तक इसका मूल स्वरूप नहीं बदला है। जैसे कि 2000 में सिडनी ओलंपिक के दौरान मशाल को सिडनी ओपरा हाउस और बूमरैंग का आकार दिया गया था। बीजिंग ओलंपिक मशाल की बात करें तो एल्यूमिनियम और मैग्नीज से मिलकर बनी लगभग एक किलोग्राम वजनी इस मशाल को कंप्यूटर कंपनी लिनोवो के 30 डिजाइन विशेषज्ञों ने तैयार किया है।
इंडो-एश्यिन न्यूज सर्विस।
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