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शुरुआती दिनों में रेसिज्म का शिकार हुए थे उस्मान ख्वाजा, साथी आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को लेकर किया बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया दुनिया के उन चुनिंदा क्रिकेट बोर्ड में से एक है जिसमें सभी खिलाड़ियों को बराबरी का दर्जा दिया जाता है, जिसके लिये अक्सर उसकी तारीफ होती है। कुछ समय पहले ही क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने अफगानिस्तान के खिलाफ होने वाले ऐतिहासिक टेस्ट मैच को सिर्फ इस लिये कैंसिल करने की बात कही क्योंकि वह ऐसे देश के साथ मैच नहीं खेलना चाहते जहां पर महिला क्रिकेट को बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता है। उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद से महिलाओं के किसी भी तरह के खेल का हिस्सा बनने पर पाबंदी लगी हुई है। जिसके बाद क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की जमकर तारीफ हुई है।

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इस बीच ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज बल्लेबाज उस्मान ख्वाजा ने ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के दूसरे पहलू की कहानी सुनाई है जिसे सुनकर हर किसी को हैरानी हुई है। पाकिस्तान में जन्मा यह क्रिकेटर बचपन में ही परिवार समेत ऑस्ट्रेलिया शिफ्ट हो गया था, जहां पर उसने ऑस्ट्रेलिया के लिये 44 टेस्ट, 40 वनडे और 9 टी20 मैच खेले हैं।

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सिर्फ लैंगिक नहीं नस्लीय समानता भी जरूरी

सिर्फ लैंगिक नहीं नस्लीय समानता भी जरूरी

ऑस्ट्रेलिया के इस बल्लेबाज ने अपने करियर में ऑस्ट्रेलिया के लिये काफी अच्छी पारियां खेली हैं लेकिन यहां तक पहुंचने का सफर उनका आसान नहीं रहा है। 34 वर्षीय ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ने अपने सफर के दौरान आयी चुनौतियों और मुश्किलों का खुलासा करते हुए बताया कि कैसे एक बार करियर का ग्राफ नीचे जाता देख वो अपनी नस्ल को ब्राउन से वाइट करना चाहते थे।

द एज एंड द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड के साथ बात करते हुए ख्वाजा ने कहा,' खेल की सबसे जरूरी चीजों में आपके आस-पास के लोग, कोच और सीए का स्टाफ शामिल होता है। वह लैंगिक समानता लाने में अहम भूमिका निभाते नजर आ सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यही चीज उन्हें बहुसंस्कृतिवाद के लिये भी करनी चाहिये थी और यह बात सिर्फ नीचे के लोगों के लिये ही नहीं बल्कि बोर्ड में टॉप पर काबिज लोगों के लिये भी है।'

टॉप लेवल पर करनी होगी बदलाव की शुरुआत

टॉप लेवल पर करनी होगी बदलाव की शुरुआत

उस्मान ने आगे बात करते हुए कहा,'मुझे कोई ये बताये कि क्या कोई ऐसी नस्ल है जो ऑस्ट्रेलिया की सामान्य आबादी को दर्शाती हो, या यह सिर्फ पुराने क्रिकेटर हैं जो मुख्य रूप से गोरे, एंग्लो-सैक्सन खिलाड़ी हैं? इस मुद्दे की हमेशा से यही जड़ रही है। क्रिकेट लंबे समय से सिर्फ गोरे लोगों का खेल रहा है और ऑस्ट्रेलिया में काफी लंबे समय से है, ऐसे में जब तक आप ऊपर से चीजें बदलना नहीं शुरू करेंगे, तब तक जमीनी स्तर पर हालात ठीक होना काफी मुश्किल है, क्योंकि यह टॉप मैनेजमेंट ही है जहां पर सभी निर्णय लिये जाते हैं।'

लोगों ने कहा था कि मुझे कभी मौका नहीं मिलेगा

लोगों ने कहा था कि मुझे कभी मौका नहीं मिलेगा

गौरतलब है कि जब उस्मान ख्वाजा ने साल 2011 में ऑस्ट्रेलिया के लिये अपना टेस्ट डेब्यू किया था तो वो पहले पाकिस्तान मुस्लिम खिलाड़ी बने थे जिसे कंगारू टीम में खेलने की जगह मिली थी। जहां ख्वाजा की टीम में एंट्री से बहुत सारे लोगों को यह ऐतिहासिक पल लगा था और साउथ एशियाई खिलाड़ी जो कि ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं, उनके लिये सर्वश्रेष्ठ स्तर पर खेलने का सपना जगा था, तो वहीं पर सच्चाई यह है कि लगभग एक दशक का समय बीत जाने के बावजूद ख्वाजा इकलौते ऐसे खिलाड़ी हैं जो दक्षिण एशियाई क्षेत्र से आकर ऑस्ट्रेलिया के लिये अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेले हैं। अपने शुरुआती करियर के अनुभव को याद करते हुए ख्वाजा ने खुलासा किया कि कई लोग उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए नहीं देखना चाहते थे।

उन्होंने कहा,'मैंने पहले भी कई बार कहा है कि लोगों ने मुझे कहा था कि तुम जगह नहीं बना पाओगे, तुम ऑस्ट्रेलिया के लिये नहीं खेल सकते, यह गोरे लोगों का खेल है, वो कभी भी तुम्हारा चयन नहीं करेंगे। करियर में कई बार ऐसे पल आये जब मुझे लगा कि यह काफी कठिन है और यह हो नहीं हो सकता। मुझे अभी मौके नहीं मिल पा रहे हैं, लेकिन मैं सौभाग्यशाली हूं कि मैं काफी जिद्दी रहा।'

Story first published: Monday, October 25, 2021, 15:18 [IST]
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