जुझारू 'जंबो' को भूलना मुश्किल
अनिल कुंबले ने अपने करियर में जिस तरह की क्रिकेट खेली है और करियर के उतार-चढ़ाव से जिस तरह जूझे हैं, उससे मन में सिर्फ़ सम्मान की भावना आती है.
कोटला मैदान पर अनिल कुंबले ने कई बाद अपनी जादुई गेंदबाज़ी से भारत को यादगार जीत दिलाई है, इसी मैदान पर कुंबले ने एक पारी के सभी 10 विकेट लिए.
और अब इसी मैदान पर अनिल कुंबले ने संन्यास लेने का फ़ैसला किया. जब दिल्ली टेस्ट में टॉस के लिए कुंबले मैदान में उतरे थे, तो शायद उन्होंने कभी ऐसा नहीं सोचा होगा.
कुंबले यही पसंद करते कि वे संन्यास का फ़ैसला इस सिरीज़ के आख़िरी टेस्ट के बाद करें. लेकिन भाग्य को तो कुछ और ही मंज़ूर था.
कुंबले एक ऐसे लड़ाकू खिलाड़ी के रूप में चर्चित रहे हैं, जैसा खिलाड़ी शायद भारत को फिर नहीं मिले. इन सबके बावजूद हरेक व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय आता है जब उसे ऐसे फ़ैसले लेने पड़ते हैं और भविष्य का रास्ता तय करना पड़ता है.
इस बार कोटला के मैदान पर अपने अच्छे प्रदर्शन के लिए जी-तोड़ कोशिश करते कुंबले को देखना अच्छा अनुभव नहीं था. कुंबले बार-बार कोशिश कर रहे थे कि वे दिल्ली टेस्ट में अपनी गेंदबाज़ी की बदौलत भारत को वापसी दिला सकें. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.
यह भी तय था कि उनका शरीर अब पहले की तरह नहीं रहा और वे जैसा चाहते थे, वैसा वे प्रदर्शन भी नहीं कर सके. उनकी गेंदबाज़ी में वो कमी भी देखने को मिली, जिसकी बदौलत वे भारत को कई मैचों में जितवा चुके हैं.
कुंबले को इसका अंदाज़ा था कि शरीर का साथ न मिलने के कारण कैसे उनका प्रदर्शन प्रभावित हो रहा है. इसकी पूरी संभावना थी कि वे वैसे भी नागपुर टेस्ट उनका आख़िरी टेस्ट होता.
जुझारू कुंबले
लेकिन दिल्ली टेस्ट के दौरान उनकी हाथ में लगी चोट ने उनके करियर के आख़िरी अध्याय में एक ऐसा मोड़ ला दिया जिसकी उम्मीद नहीं थी.
कुंबले ने भारत की ओर से सर्वाधिक विकेट लिया है
कई लोग इस पर आश्चर्य कर रहे थे कि इतनी चोट लगने के बावजूद वे गेंदबाज़ी क्यों कर रहे थे, तो उन्हें यह भी याद रखना होगा कि एक बार वे अपने जबड़े में लगी गंभीर चोट के बावजूद भी गेंदबाज़ी कर चुके हैं.
दिल्ली टेस्ट के दौरान साफ़ दिख रहा था कि अमित मिश्रा अभी कुंबले जैसी गेंदबाज़ी करने के लिए तैयार नहीं है. अमित मिश्रा भले ही कुंबले से ज़्यादा गेंदों को स्पिन करा रहे हैं, लेकिन उनमें अभी नियंत्रण की कमी है.
दिल्ली टेस्ट के दौरान हाथ में लगे 11 टाँकों के बावजूद अनिल कुंबले को गेंदबाज़ी करते देखना बिल्कुल अच्छा नहीं था. कुंबले ऐसे दिख रहे थे, जिन्हें पता था कि उनका करियर ख़त्म होने वाला है लेकिन वे सम्मान के साथ अलविदा कहना चाहते थे.
ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी में जब उन्हें चोट के बावजूद अपनी ही गेंद पर मिचेल जॉनसन का जिस तरह कैच लपका, उससे उन्होंने एक बार फिर अपने जुझारुपन को साबित किया.
कुंबले को किसी के लिए कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है. कुंबले ने भारतीय क्रिकेट को ज़रूरत से ज़्यादा दिया है. कुंबले ने जिस तरह की क्रिकेट खेली है और अपने क्रिकेट करियर के दौरान जिस तरह उतार-चढ़ाव से जूझे हैं, उससे उनके लिए सिर्फ़ सम्मान की भावना आती है.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)
कोटला मैदान पर अनिल कुंबले ने कई बाद अपनी जादुई गेंदबाज़ी से भारत को यादगार जीत दिलाई है, इसी मैदान पर कुंबले ने एक पारी के सभी 10 विकेट लिए.
और अब इसी मैदान पर अनिल कुंबले ने संन्यास लेने का फ़ैसला किया. जब दिल्ली टेस्ट में टॉस के लिए कुंबले मैदान में उतरे थे, तो शायद उन्होंने कभी ऐसा नहीं सोचा होगा.
कुंबले यही पसंद करते कि वे संन्यास का फ़ैसला इस सिरीज़ के आख़िरी टेस्ट के बाद करें. लेकिन भाग्य को तो कुछ और ही मंज़ूर था.
कुंबले एक ऐसे लड़ाकू खिलाड़ी के रूप में चर्चित रहे हैं, जैसा खिलाड़ी शायद भारत को फिर नहीं मिले. इन सबके बावजूद हरेक व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय आता है जब उसे ऐसे फ़ैसले लेने पड़ते हैं और भविष्य का रास्ता तय करना पड़ता है.
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यह भी तय था कि उनका शरीर अब पहले की तरह नहीं रहा और वे जैसा चाहते थे, वैसा वे प्रदर्शन भी नहीं कर सके. उनकी गेंदबाज़ी में वो कमी भी देखने को मिली, जिसकी बदौलत वे भारत को कई मैचों में जितवा चुके हैं.
कुंबले को इसका अंदाज़ा था कि शरीर का साथ न मिलने के कारण कैसे उनका प्रदर्शन प्रभावित हो रहा है. इसकी पूरी संभावना थी कि वे वैसे भी नागपुर टेस्ट उनका आख़िरी टेस्ट होता.
जुझारू कुंबले
लेकिन दिल्ली टेस्ट के दौरान उनकी हाथ में लगी चोट ने उनके करियर के आख़िरी अध्याय में एक ऐसा मोड़ ला दिया जिसकी उम्मीद नहीं थी.
कुंबले ने भारत की ओर से सर्वाधिक विकेट लिया है
कई लोग इस पर आश्चर्य कर रहे थे कि इतनी चोट लगने के बावजूद वे गेंदबाज़ी क्यों कर रहे थे, तो उन्हें यह भी याद रखना होगा कि एक बार वे अपने जबड़े में लगी गंभीर चोट के बावजूद भी गेंदबाज़ी कर चुके हैं.
दिल्ली टेस्ट के दौरान साफ़ दिख रहा था कि अमित मिश्रा अभी कुंबले जैसी गेंदबाज़ी करने के लिए तैयार नहीं है. अमित मिश्रा भले ही कुंबले से ज़्यादा गेंदों को स्पिन करा रहे हैं, लेकिन उनमें अभी नियंत्रण की कमी है.
दिल्ली टेस्ट के दौरान हाथ में लगे 11 टाँकों के बावजूद अनिल कुंबले को गेंदबाज़ी करते देखना बिल्कुल अच्छा नहीं था. कुंबले ऐसे दिख रहे थे, जिन्हें पता था कि उनका करियर ख़त्म होने वाला है लेकिन वे सम्मान के साथ अलविदा कहना चाहते थे.
ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी में जब उन्हें चोट के बावजूद अपनी ही गेंद पर मिचेल जॉनसन का जिस तरह कैच लपका, उससे उन्होंने एक बार फिर अपने जुझारुपन को साबित किया.
कुंबले को किसी के लिए कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है. कुंबले ने भारतीय क्रिकेट को ज़रूरत से ज़्यादा दिया है. कुंबले ने जिस तरह की क्रिकेट खेली है और अपने क्रिकेट करियर के दौरान जिस तरह उतार-चढ़ाव से जूझे हैं, उससे उनके लिए सिर्फ़ सम्मान की भावना आती है.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:19 [IST]
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