तालिबानी हमलों के बीच कैसे अफगानिस्तान में जीने की वजह बन रहा क्रिकेट
नई दिल्ली। अफगानिस्तान में जलालाबाद को क्रिकेट का अड्डा कहा जाता है, लेकिन इसी प्रांत को दुनिया सिर्फ इसलिए जानती है कि यहां तालिबान की जड़े सबसे ज्यादा मजबूत है, जो कि सच भी है। एक तरफ अफगानिस्तान में तालिबान जितनी तेजी के साथ हमले कर खौफ पैदा कर रहा, तो दूसरी तरफ क्रिकेट उतने ही जोश के साथ बढ़ता जा रहा है। अफगानिस्तान में क्रिकेट और तालिबान का अपना-अपना खेल है। तालिबान मौत का खुनी खेल रहा है, तो क्रिकेट लोगों के दिलों का खेल बनता जा रहा है। पिछले एक दशक में अफगानिस्तान में क्रिकेट जिस तेजी के साथ उभरा है, उससे वहां के लोगों को भी अब लगना है कि इस मुल्क में तालिबान के हाथों मरना ही नहीं लिखा है, क्रिकेट भी है जिसे देखकर जिया जा सकता है। ब्रिटिश न्यूजपेपर 'टेलीग्राफ' अपनी एक स्टोरी में लिखा है 'अफगानिस्तान में तालिबान से भी ज्यादा पॉपुलर है क्रिकेट' जहां युद्ध के खून खराबे में बर्बाद होते अफगानिस्तान को क्रिकेट ने जीने की वजह दी है।

क्रिकेट के प्रति दिवानगी का रहस्य है उत्साही भूख
करीब 25 साल पहले अफगानिस्तान में क्रिकेट का अस्तित्व नहीं था, लेकिन अक्टूबर 2013 में वो भी क्या दिन रहा होगा, जब पहली बार अफगानिस्तान ने केन्या को हारकर 2015 विश्व कप के लिए क्वालिफाई कर लिया। अफगानिस्तान के उभरते क्रिकेट को देखकर हैरानी इसलिए होती है, क्योंकि इस देश के खिलाड़ी दुनिया के सबसे विषम परिस्थितियों में खेलते हुए आगे बढ़ रहे हैं। क्रिकेट भी उस देश में उभर रहा है, जहां तालिबान कभी भी और किसी भी वक्त हमला कर देता है। उत्साही भूख ही अफगानिस्तान में क्रिकेट के प्रति दिवानगी का रहस्य है।

शिविरों में पैदा होता क्रिकेट
एक तरफ दुनिया में क्रिकेट खेलने वाले देशों के पास अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे हैं, दूसरी तरफ अफगान क्रिकेट का जन्म बंजर जमीनों और शरणार्थी शिविरों में हुआ है और उसी जगह से क्रिकेट उठ भी रहा है। संपन्न देशों और अफगानिस्तान में सिर्फ क्रिकेट की एक असीमित भूख का फर्क है, जो अफगानियों में खत्म ही नहीं हो रही। क्रिकेट जर्नलिस्ट शील्ड बेरी एक जगह लिखते हैं, लकड़ियों और पत्थरों के साथ खेलना हमेशा अफगानी बचपन का हिस्सा रहा है। दूसरे देशों के बच्चों की तरह अफगानी बच्चे वीडियो गेम जैसी चीजों से फिलहाल कोसो दूर है।

बिना अपने घर में खेलकर उभरता क्रिकेट
तालिबान के डर से अफगानिस्तान कोई भी मैच अपने होमग्राउंड में नहीं खेल पाया है और शायद खेल भी नहीं पाएगा। लेकिन हैरानी की बात देखिए कि बिना होमग्राउंड पर खेले और अनुभव लिए अफगानिस्तान का क्रिकेट ना सिर्फ आयरलैंड, स्कॉटलैंड, जिंबाब्वे और बांग्लादेश के बराबर आकर खड़ा हो गया है, बल्कि भारत जैसे देश को भी एक बार तो जीतने (एशिया कप 2018 का पहला मैच) में अफगान खिलाड़ियों के आगे पसीने छूट गए।

भारत ने अफगानिस्तान में क्रिकेट
अफगानिस्तान में उभरते क्रिकेट के लिए भारत का भी बहुत बड़ा योगदान है। भारत ही वह देश है, जिसने अफगानिस्तान में शांति को फिर से स्थापित करने के लिए खेल के महत्व को पहचाना है। कांधार में क्रिकेट स्टेडियम खड़ा करने के लिए भारत 10 लाख डॉलर की घोषणा कर चुका है। अफगानिस्तान के कई खिलाड़ी भारत में क्रिकेट की ट्रेनिंग ले रहे हैं। पिछले कई सालों से भारत अफगानिस्तान क्रिकेट को हरसंभव मदद कर रही है। अफगानिस्तान का 80 फीसदी क्रिकेट रिवेन्यू भारत में बनता है। हाल ही में बीसीसीआई ने अफगानिस्तान को अपना पहला टेस्ट मैच खेलने के लिए आमंत्रित किया था।
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