पवन नारा
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
खेलों के आयोजन से लोग तो ख़ुश नज़र आए लेकिन लगता है लोगों ने कलमाड़ी को अभी तक कथित गड़बड़ी के लिए ज़िम्मेदार माना है.जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम में मौजूद दर्शकों की प्रतिक्रिया को अगर पैमाना माना जाए तो दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल पूरी तरह से सफल हुए हैं. पर इस सफलता का श्रेय सुरेश कलमाड़ी को मिलता नज़र नहीं आता.
खचाखच भरे स्टेडियम में जैसे ही सुरेश कलमाडी बोलने के लिए खड़े हुए, वहाँ मौजूद दर्शकों ने कलमाड़ी की जबरदस्त 'हूटिंग' की.ये कोई चुनावी सभा वाली 'हूटिंग' नहीं थी जिसे किसी ने नियोजित किया हो, जिस अंदाज़ में मैदान के हर कोने से स्वाभाविक तौर पर एकजुट आवाज़ आई, लगा मानों सभी एकमत से कलमाड़ी को दोषी मान रहें हैं.
हम आप को बता दें कि जैसे ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, युपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नाम पुकारे गए, स्टेडियम में मौजूद दर्शकों ने तालियाँ बजाने में कोई कंजूसी नहीं की.प्रतिक्रिया से लगा मानो जनता फ़ैसला सुना रही हो कि वो किसे किसे दोषी मानती है. सुरेश कलमाड़ी ने अपने धन्यवाद भाषण में लगभग सभी एंजेसियों समेत सभी गणमान्य लोगों का नाम शामिल किया.
कलमाड़ी नें राहुल गाँधी का विशेष तौर पर धन्यवाद करते हुए कहा की राहुल गाँधी ने अति-विशिष्ठ लोगों के बीच बैठ मैच देखने की बजाए आम लोगों के बीच बैठ खिलाडियों का उत्साह बढ़ाया.कलमाड़ी ने भारतीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी का भी विशेष धन्यवाद किया तो दर्शक चिल्लाते सुनाई दिए "हम समझ सकते हैं कि पैसा कहाँ से आया हैं."
अक्सर लोगों की आलोचना का शिकार होने वाली दिल्ली पुलिस को भी लोगों की खूब तालियाँ मिली. राष्ट्रमंडल खेलों के वॉलेंटियरस का नाम आते ही स्टेडियम गूँज गया.खेलों की शुरुआत में अतंरराष्ट्रीय स्तर पर हुई आलोचना उस समय धुलती नज़र आई जब विदेशी खिलाड़ी टीम पोस्टर लेकर मैदान पर उतरे जिसपर लिखा था, " भारत, ज़बरदस्त खेलों के लिए धन्यवाद."
भारत के गगन नारंग समापन समारोह में भारत का झंडा लेकर मैदान में उतरे.उद्धघाटन समारोह में खेलों के शुभांकर शेरा को दरकिनार किए जाने की व्यापक आलोचना के बाद समापन समारोह में इस कमी को दूर करने की कौशिश का गई.शेरा को खुले ऑटो में मैदान पर गायक शान लेकर आए और शेरा की विदाई का गीत भी गाया.
लेज़र शो ने लोगों में जोश भर दिया तो बॉलीवुड के गानों पर दर्शक आधे घंटे तक थिरकते रहे.शुरुआत में विदेशी पत्रकारों ने नाचते हुए लोगों को घूरती नज़रों से देखा, पर संगीत के जादू से वो बच नहीं पाए. कुछ ही देर बाद विदेशी पत्रकार भी झूमते नज़र आए.अवसर देख कुछ लोगों ने उन्हे नाच सिखाना शुरु कर दिया.
संगीत जब बंद हुआ तो सब थके हुए नज़र आए पर चेहरे पर संतोष साफ झलक रहा था.स्टेडियम से बाहर आते वक़्त हमें दो युवा वॉलिटियरों से मिले जिनके चेहरे उतरे हुए थे. वजह पूछी तो पता चला कि वो सुबह पाँच बजे से घर से निकले है.
समापन समरोह के बीच में उन्हे अपने कार्यक्रम पेश करने के बाद स्टेडियम से निकाल, ग्रिन रुम में भेज दिया गया और उन्हे समारोह देखने का अवसर नहीं मिला.जब आपके कानों में हज़ारो लोगों की जोश भरी आवाज़ हो और आंखों के सामने कुछ भी नहीं, तो अपके मन पर क्या बीतेगी? वैसा ही कुछ ये दो वॉलिटियर महसूस कर रहें थे. ऐसे में युवा मन का उदास होना स्वाभाविक है.
हालाकिं ऐसा ही कुछ दिल्ली वालों को भी महसूस हुआ होगा. जो की इन खेलों के इतने क़रीब होने के बावजूद, टिकट ना मिलने की वजह से खेल टीवी पर ही देख पाए.