पहाड़ों के बीच क्रिकेट का मज़ा
एश्वर्य कपूर
बीबीसी संवाददाता, धर्मशाला से
तिब्बत के बौद्ध धार्मिक नेता दलाई लामा के प्रधान कार्यालय के रूप में प्रख्यात हिमाचल प्रदेश का ख़ूबसूरत शहर धर्मशाला इन गर्मियों में केवल सैलानियों के लिए ही आकर्षण का केंद्र नहीं है बल्कि क्रिकेट प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है.
हिमालय की धौलाधार पर्वतमाला श्रृंखला की प्राकृतिक सुंदर छटा में बसा यह शहर उस समय क्रिकेट प्रमियों को अपने ठंडे वातावरण से नई ऊर्जा से भरने में कामयाब हो गया जब भारत के विभिन्न शहरों में हो रहे आईपीएल मैचों का आयोजन तेज गर्मी से तपते मौसम में हो रहा है.
हांलाकि कभी पंजाब का हिस्सा रहे हिमाचल प्रदेश के इस मन मोहने वाले शहर में किंग्स इलेवन पंजाब टीम की चेन्नई सुपर किंग्स से हार गई, लेकिन धर्मशाला के जिस स्टेडियम में यह मैच 18 अप्रैल को खेला गया उसमें एक नया इतिहास भी लिखा गया.
इस स्टेडियम का इतिहास रहा है कि आज तक यहां कोई भी मैच ऐसा न रहा है जिसमें बारिश न हुईं हो. मगर पहली बार पंजाब और चेन्नई के बीच हुए इस मैच में बारिश नहीं हुईं.
पुलिस की सख्त निगरानी के बावजूद मैच देखने लिए खेल प्रेमियों से स्टेडियम खचाखच भर गया था. करीब 20 हज़ार दर्शकों ने अपनी मनपसंद टीम की हौसला अफजाई करने में भी कोई कमी भी नहीं छोड़ी.
ज़ाहिर है कि धर्मशाला अब अपना रंग बदल रहा है और इसकी नैसर्गिक ख़ूबसूरती में खेल की नई खुशबू का समावेश हो रहा है. इस स्टेडियम को बने अभी केवल दो साल ही हुए हैं मगर यहां जब भी कोई महत्वपूर्ण मैच हुआ तो बारिश ने अपना खेल ज़रूर दिखाया.
इस स्टेडियम में आईपीएल श्रृंखला के दो मैच हुए और दोनों में ही किंग्स इलेवन पंजाब की हार हुई. मगर लोगों में इसके बावजूद खेल के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ और उनमें लगातार जोश बना रहा.
यह बात अलग है कि धर्मशाला जैसे किसी भी पहाड़ी शहर की अपनी सीमाएं होती हैं जिसके भीतर नागरिक सुविधाओं का परिचालन करना थोड़ कठिन होता है, लेकिन क्रिकेट के दीवाने आस-पास के शहरों से जैसे-तैसे पहुंच ही गए, खास कर पंजाब से.
बदलते वक़्त की माँग
इस खूबसूरत शहर के लोगों ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि उनके शहर में भी दिल्ली और मुबंई की तरह आईपीएल मैच खेले जाएंगे. वे अपने देश के नामी–गिरामी खिलाड़ियों के साथ ही विश्व के अन्य देशों के प्रख्यात खिलाड़ियों को अपने सामने खेलते हुए देख पाएंगे.
उनका यह ख्वाब सच हो रहा था और वे सब कुछ अपनी आंखों के सामने देख रहे थे. उन्हें लग रहा था कि सचमुच भारत बदल रहा है. इस बदलते भारत की तस्वीर को वे खुद बनते हुए देखना चाहते थे.
यही वजह रही की धर्मशाला के सभी होटलों में मैच शुरू होने से पहले ही सभी कमरे बुक हो चुके थे.
इसके अलग कांगड़ा की धरती एक नया चित्र बना रही है जिसमें आधुनिक भारत के युवा मन की आकांक्षाएं भी छिपी हुई हैं. यह आकांक्षा सिर्फ कलात्मक नहीं बल्कि भौतिकतावादी समाज में अपनी जगह बनाने की भी है. शायद यही वजह है कि धर्मशाला में पहाड़ों का सीना रौंद कर यह शानदार स्टेडियम बनाया गया है.
यह बदलते वक़्त के साथ अपनी खासियत को बरकरार रखते हुए क़दम से क़दम मिला कर चलने की चाहत भी है. हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ यानि एचपीसीए की कड़ी मेहनत के बाद ही यह धर्मशाला का स्टेडियम तैयार हो पाया है. इसे बनाने में एचपीसीए की महत्वपूर्ण भूमिका है.
बीबीसी के साथ खास बातचीत में हिमाचल प्रदेश के हम्मीरपुर क्षेत्र से सांसद और एचपीसीए के अध्यक्ष और अनुराग ठाकुर ने बताया कि धर्मशाला जैसी जगह में विश्व स्तरीय स्टेडियम बनाने में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
उनका कहना है, “जब हिमाचल प्रदेश सरकार ने हमें यह ज़मीन दी थी तो यहां एक 70 फुट ऊंचे पहाड़ के अलावा कुछ भी नहीं था. यह सब एचपीसीए के कर्मचारियों की कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा है कि आप सब यहां हमारे मेहमान बन कर आए हैं. अब से कुछ वर्ष पहले अगर आपने धर्मशाला को देखा होता तो आज आप इसे पहचान न पाते.”
दूसरी तरफ धर्मशाला के आम नागरिकों को इससे थोड़ी बहुत शिकायत भी है. उनलोगों का कहना है कि अगर सरकार क्रिकेट के लिए स्टेडियम बना रही है तो उसे इससे प्रभावित होने वाले नागरिकों के सुविधाओं की तरफ भी ध्यान देना चाहिए. मसलन बड़ी संख्या में खेल प्रेमियों के आने से उत्पन्न समस्याओं से निपटने के पुख्ता इंतजाम करने की भी जरूरत है.
देवभूमि और खेलभूमि
इसमें सबसे प्रमुख है शहर की प्रकृतिक खूबसूरती को बचाए रखना और सामुदायिक सुविधाओं का आसानी से उपलब्ध होना. सड़कों का चोड़ा होना भी बहुत ज़रूरी है.
इस विषय पर अनुराग ठाकुर का कहना है, “पिछले काफ़ी समय से राज्य सरकार धर्मशाला के विकास पर विशेष ध्यान दे रही है. मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि हिमाचल प्रदेश देव भूमि है. यहां धार्मिक पर्यटक बहुत में आते हैं. मगर इस राज्य की प्राकृतिक सुंदरता में खेलों की भी काफ़ी गुंजाइश है. मेरा प्रयास यह है कि इसे केवल देवभू्मि ही नहीं बल्कि खेलभूमि के नाम से भी जाना जाए. यहां की युवा पीढ़ी खेल में किसी से कम नहीं है, उसे आधारभूत सुविधाएं तो मुहैया करानी ही होंगी.”
हिमाचल प्रदेश सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी तो यह भी है कि धर्मशाला जैसे अन्य शहरों की प्राकृतिक छटा पर भौतिकवादी व वाणिज्यिक प्रगति की आपाधापी का दाग न लगे. क्योंकि पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग से परेशान है इसलिए भारत के इस पहाड़ी इलाकों को हम सीमेंट का जंगल नहीं बनाना चाहते. हमें हर सूरत में प्रकृति के साथ संतुलन बना कर ही आगे बढ़ना होगा. हमें खेल भी चाहिए और रेल भी.
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