Happy Birthday Ganguly: दादा के 4 फैसले जिन्होंने भारतीय क्रिकेट का भविष्य तराशा
नई दिल्लीः प्रिंस ऑफ कोलकाता के नाम से मशहूर भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली गुरुवार को 49 साल के हो गए हैं। वह निश्चित तौर पर देश के सबसे बेहतरीन क्रिकेट कप्तानों में से एक है। मौजूदा समय में बीसीसीआई के अध्यक्ष के तौर पर क्रिकेट की सेवा कर रहे दादा ने 11363 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय रन 22 शतक के साथ अपने करियर में बनाए। उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में भी 113 मैच खेलते हुए 7212 रन बनाए।
गांगुली को उनके बेबाक अंदाज चले जाना जाता था और वह विपक्षी टीम की अक्सर परवाह नहीं करते थे। गांगुली के अंदर अपने खिलाड़ियों की प्रतिभा पहचानने की क्षमता नैसर्गिक थी और इतना नेचुरल कप्तान भारत के लिए विरला ही रहेगा। दादा के जन्मदिन के मौके पर हम ऐसे पांच फैसलों के बारे में बात करेंगे जब सौरव गांगुली ने भारतीय क्रिकेट को हमेशा के लिए बदल दिया।

1. लक्ष्मण को नंबर तीन पर खिलाने का फैसला लिया-
गांगुली ने कप्तान के तौर पर हमेशा अपनी अंदरूनी आवाज सुनी और इसी तरह की एक आवाज ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 2001 में कोलकाता टेस्ट में आई थी। गांगुली को लगा कि लक्ष्मण की सही क्षमता का इस्तेमाल उनको नंबर तीन पर भेजकर किया जा सकता है। भारत तब तीसरी दिन फॉलोऑन कर रहा था, टीम की हालत पतली थी और लक्ष्मण को राहुल द्रविड़ से ऊपर बैटिंग करने के लिए भेजा गया था। वीवीएस के बनाए 281 रन कौन भूल सकता है। यह किसी भारतीय बल्लेबाज के द्वारा खेली गई अब तक की सर्वकालिक लोकप्रिय पारी भी है। इस मैच में द्रविड़ ने भी शतक बनाया था और हरभजन सिंह ने पांचवें दिन कमाल की गेंदबाजी की थी जिसके दम पर ऑस्ट्रेलिया का लगातार 16 मैच जीतने का सिलसिला भी खत्म हुआ और इसके अगले चेन्नई टेस्ट में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर 2-1 से वह सीरीज जीत ली।
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2. वीरेंद्र सहवाग को ओपनर बना देना-
वीरेंद्र सहवाग विस्फोटक खिलाड़ी थे लेकिन उन्होंने मध्यक्रम के बल्लेबाज के तौर पर शुरुआत की थी जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट डेब्यू करते हुए नंबर 6 पर शतक लगाया था। गांगुली ने सहवाग की बेबाक बल्लेबाजी को देखकर उनको ओपनिंग करने का न्योता दे दिया। वीरू की तकनीक ओपनर के लायक नहीं थी लेकिन गांगुली ने जो भरोसा दिखाया वह भारतीय क्रिकेट के लिए बहुत काम कर गया और सहवाग दो तिहरे शतक और 50 के करीब औसत के साथ भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सफल टेस्ट ओपनर में एक साबित हुए।

3. राहुल द्रविड़ को विकेटकीपिंग के लिए मनाना-
गांगुली के करियर का दुर्भाग्य यह रहा कि उनके समय में धोनी जैसा विकेटकीपर नहीं खेला। धोनी के आने से पहले तक भारतीय टीम अच्छे विकेटकीपर बल्लेबाजों के लिए जूझती थी ऐसे में सौरव गांगुली को राहुल द्रविड़ के तौर पर एक ऐसा जुगाड़ दिखाई दिया जो विकेट कीपिंग भी कर सकता था। राहुल ने शुरुआती हिचकिचाहट के बाद यह रोल अपना लिया और फिर बाद में नियमित तौर पर ऐसा काम करने लगे। इस जुगाड़ के जरिए गांगुली ने 2002 से 2004 के बीच अतिरिक्त बल्लेबाज खिलाना शुरू कर दिया। भारत को एक्स्ट्रा बल्लेबाज का फायदा मिला। साथ ही द्रविड़ को बाद में नंबर पांच पर भेजा गया जहां उन्होंने एकदिवसीय क्रिकेट में अपने करियर की कुछ बेहतरीन पारियां खेली।

4. युवाओं में नया जोश और आत्मविश्वास भरा-
गांगुली ने युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि वे भारतीय धरती पर ही शेर नहीं हैं। गांगुली ने वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, हरभजन सिंह, जहीर खान, महेंद्र सिंह धोनी जैसे धुरंधरों की एक ऐसी टीम तैयार की जो विदेशों में भी जीत का जज्बा रखती थी। उन्होंने बिल्कुल खाक से अपनी टीम को तैयार किया और यह सौरव गांगुली की ही मेहनत थी जो बाद में महेंद्र सिंह धोनी के काम आई। टीम इंडिया 2000 में मैच फिक्सिंग स्कैंडल में फंस गई थी और खिलाड़ियों का मोराल डाउन हो गया था। ऐसे में गांगुली ने ही खिलाड़ियों में आत्मविश्वास भरा और बताया कि वह कहीं पर भी जीत सकते हैं।
गांगुली ने 28 ओवरसीज टेस्ट मैच खेले हैं जिसमें 11 में जीत दर्ज की है जो कि विराट कोहली के बाद दूसरे सबसे ज्यादा विदेशी टेस्ट जीत में दर्ज है। लेकिन यहां पर एक बात ध्यान देने की है कि विराट कोहली ने विदेशों में बहुत कमजोर टीमों को भी हराया है जबकि गांगुली के समय वेस्टइंडीज और जिंबाब्वे जैसी टीम भी अपने घर में बहुत मजबूत हुआ करती थी। इसलिए कई बार आंकड़े दो अलग-अलग समय अवधि के बीच तुलना करने में न्याय नहीं कर पाते।
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