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जानिए नो-बॉल का पूरा इतिहास-भूगोल

मुंबई। सेमीफाइनल हारने के बाद कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने कहा कि दो नो-बॉल ने मैच हमारे हाथ से छीन लिया। जरा सोचिए दो नो-बॉल के कारण टीम इंडिया टी20 विश्वकप से बाहर हो गई है।

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आईये जानते हैं 'नो बॉल' और उसके इतिहास के बारे में..

  • 'नो बॉल' फील्डिंग कर रही टीम पर लगने वाली पेनाल्टी है जो कि गलत ढंग( नियम के मुताबिक नहीं) से बॉलिंग करने पर लगता है
  • कोई गेंद कई कारणों से 'नो बॉल' हो सकती है।
  • अगर गेंदबाज गलत स्थान से गेंदबाजी करता है या अगर गेंद फेंकने के दौरान वह अपनी कोहनी को सीधा कर लेता है या गेंद दो से अधिक बार बाउंस होती है तो गेंद 'नो-बॉल' हो जाती है।
  • 'नो-बॉल' पर बैटिंग वालों को एक अतिरिक्त रन मिलता है।
  • बल्लेबाज को किसी भी 'नो-बॉल' से आउट नहीं किया जा सकता है।
  • साल 2013 में आईसीसी ने 'नो-बॉल' से जुड़ा एक नया नियम लागू किया जिसके मुताबिक एक-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय और ट्वेंटी-20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में गेंदबाज गेंद करते समय नॉन-स्ट्राइकर छोर पर विकेट गिराता है तो वो 'नो-बॉल' होगी, पहले ये 'डेड बॉल' हुआ करती थी।
  • इसके अंतर्गत पहला अंतरराष्ट्रीय मैच 3 मई 2013 को जिम्बाब्वे और बांग्लादेश के बीच खेला गया था।
  • साल 2015 में एक-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय और ट्वेंटी-20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में बैटसमैन को 'फ्री हिट' मिलेगी।
  • नोबाल के नये नियम (24 . 6) के मुताबिक यदि बॉलर बॉलिंग करते समय अपने छोर का विकेट उखाड़ देता है तो उसे 'नो-बॉल' करार दिया जाएगा।
  • रनर के साथ खेलने वाला बल्लेबाज यदि 'नो-बॉल' पर स्टंप आउट होता है तो उसे आउट नहीं दिया जाएगा। पहले उसे रन आउट दिया जाता था।

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Story first published: Monday, November 13, 2017, 11:14 [IST]
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