क्रिकेट के मक्का में बदनाम हो गया विश्वकप, पहले कभी न हुई इतनी खराब प्रतियोगिता
नई दिल्ली। जेंटलमैन गेम क्रिकेट अपने सबसे बड़े जलसे में बेआबरू हो गया। इंग्लैंड में आयोजित 2019 का विश्वकप क्रिकेट इतिहास की सबसे विवादास्पद और घटिया प्रतियोगिता रही। बरसात, विवाद और नाकाबिल अम्पायरों ने क्रिकेट के महाकुंभ को मजाक बना कर रख दिया। मैदानी अम्पायरों में तो जैसे गलती करने की होड़ लगी हुई थी। हद तो तब हो गई जब टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने वाले थर्ड अम्पायरों ने भी गलत फैसले देने लगे। आज तक किसी भी विश्वकप में बारिश की वजह से इतने मैच प्रभावित नहीं हुए थे। रिजर्व डे नहीं रहने से कई देशों की किस्मत खराब हो गयी। विश्वकप इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि विजेता से अधिक उपविजेता को इज्जत मिल रही है। इंग्लैंड अपने खेल से नहीं, बल्कि अम्पायर की मेहरबानियों से जीता। वह जीत कर भी हार गया।

भारत को बेईमानी से हराया सेमीफाइनल में
सेमीफाइनल में आम्पायरों की चूक और ब्रॉडकास्टरों की गलती एक तरह से बड़ी बेईमानी थी। महेन्द्र सिंह धोनी को जिस गेंद पर रन आउट दिया गया था दरअसल वो गेंद नो बॉल थी। धोनी को 49 वें ओवर की तीसरी गेंद पर रन आउट करार दिया गया था। लेकिन उस समय न्यूजीलैंड ने पावर प्ले के फील्डिंग प्रतिबंधों का उल्लंघन किया था। तीसरे और आखिरी पावर प्ले (41 से 50 ओवर) में केवल पांच फील्डर ही 30 गज के घेरे से बाहर रह सकते हैं। लेकिन उस समय न्यूजीलैंड के छह फील्डर 30 गज के घेरे से बाहर थे। मैदान में खड़े किसी अम्पायर ने इस गलती पर ध्यान नहीं दिया। इस मामले में ब्रॉडकास्टर भी दोषी हैं। उन्होंने इस एंगल से कैमरा के फ्रेम को नहीं दिखाया। ड्रोन कैमरे के एंगल को भी तब स्क्रीन पर नहीं लाया गया। अगर पूरी फील्डिंग पोजिशन को लौंग शॉट के जरिये दिखाया जाता तो ये गलती पकड़ में आ सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। भारत को अंतिम दो ओवरों में 31 रन बनाने थे। 49 वें ओवर की पहली गेंद पर धोनी छक्का मार चुके थे। दूसरी गेंद पर कोई रन नहीं बना। नो बॉल होने से तीसरी गेंद पर धोनी आउट ही नहीं होते और भारत को दो रन मिल जाते। इस तरह धोनी क्रीज पर रहते और शेष 9 गेंदों पर 23 रन बनाने का टारगेट रहता। इस मुकाम पर धोनी भारत के पक्ष में मैच पलट सकते थे। लेकिन बेईमानी ने भारत को जीतने नहीं दिया।

बार-बार रिप्ले देख कर भी गलत फैसला
मैदानी अम्पायर की बढ़ती गलतियों से बचने के लिए ही डीआरएस का नियम लागू किया गया है। मैदानी अम्पायर के फैसले पर अगर शक है तो तीसरे अम्पायर के पास जाने का विकल्प इस लिए मिला है ताकि खेल में निष्पक्षता बनी रहे। लेकिन इस प्रतियोगिता में थर्ड अम्पायर ने बार-बार रिप्ले देखने, स्निकोमीटर से जांच करने के बाद भी गलत फैसले दिये। वेस्टइंडीज के खिलाफ रोहित शर्मा को थर्ड अम्पायर द्वारा आउट दिया जाना गलत था। केमार रोच की एक गेंद रोहित के बैट-पैड के बीच से निकल विकेटकीपर के दस्ताने में गयी थी। रोच ने अपील की जिसे मैदानी अम्पायर ने नकार दिया। इसके बाद रोच ने रिव्यू की अपील कर दी। मामला थर्ड अम्पायर के पास गया। थर्ड अम्पायर ने कई एंगल से रिप्ले देखे। स्निकोमीटर से जांचा कि गेंद बल्ले से लगी है कि बैट से। इसके बाद रोहित को कैच आउट करार दिया गया, जब कि गेंद पैड से लग कर गयी थी। अगर तकनीक का इस्तेमाल करने के बाद भी फैसला गलत ही हो तो फिर इसका क्या फायदा ?
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उप्फ ! फाइनल में इतनी खराब अम्पायरिंग ?
लगता है अम्पायरों ने अपने सबसे घटिया फैसले फाइनल के लिए ही बचा के रखे थे। एक- दो गलतियां हों तो मानवीय भूल मानी जा सकती हैं लेकिन गलतियों का अंबार कोई कैसे माफ कर सकता है। फाइनल के तीसरे ओवर में ही अम्पायर धर्मसेना ने न्यूजीलैंड के हेनरी निकोलस को आउट दे दिया था। निकोलस ने रिव्यू लिया तो वह नॉट आउट थे। 23 वें ओवर में विलिमसन के बल्ले से कैच निकला था लेकिन धर्मसेना ने नॉट आउट करार दिया। इंग्लैंड ने रिव्यू लिया तो विलियमसन आउट हो गये। 34 वें ओवर में मैदानी अम्पायर इरासमस ने रॉस टेलर को आउट दे दिया जब कि रिप्ले से पता चला कि वे आउट नहीं थे। न्यूजीलैंड के पास रिव्यू नहीं बचा था इस लिए टेलर गलत फैसले का शिकार हो गये। इंग्लैंड ने जब पारी शुरू की तो पहली गेंद पर जेसन राय के खिलाफ लेग बिफोर की अपील हुई। रिप्ले में गेंद स्टंप को छू कर जा रही थी लेकिन अम्पायर कॉल बरकरार रखा गया।
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