क्या डर गये हैं कप्तान कोहली ! गुटबाजी का शिकार टीम कैसे खेलगी वेस्टइंडीज के खिलाफ ?
नई दिल्ली: टीम इंडिया के कोच रवि शास्त्री विराट कोहली को बेहद आक्रमक खिलाड़ी मानते हैं। लेकिन वक्त कुछ यूं बदल गया है कि कोहली को अब डर के साये में जीना पड़ रहा। उन्हें डर सताने लगा है कि कहीं धांसू बैटिंग कर रहे रोहित शर्मा उनकी कप्तानी छीन न लें। गुटबाजी का शिकार टीम इंडिया 29 जुलाई को वाया अमेरिका वेस्टइंडीज जा रही है। बेशक भारतीय टीम अभी लाजवाब खेल रही है। टीम की बॉलिंग, फील्डिंग और बैटिंग तीनों शानदार हैं। लेकिन जब कोई मजबूत टीम टुकड़ों में बिखर जाती है तो शर्मनाक हार के लिए मजबूर होना पड़ता है। गुटबाजी ने पहले भी भारतीय क्रिकेट का बहुत नुकसान किया है। एक बार फिर वही डर सताने लगा है। जून 1983 में विश्वकप जीतने के बाद भारतीय टीम का हौसला बुलंदी पर था। लेकिन तभी कपिलदेव, गावस्कर और मोहिंदर अमरनाथ में गंभीर मतभेद हो गये थे। अक्टूबर 1983 में जब वेस्टइंडीज की टीम भारत आयी तो उसने गुटों में बंटी टीम इंडिया की मिट्टीपलीद कर दी थी।

डर गये हैं कोहली
पहले तय था कि कोहली वेस्टइंडीज दौरे के टी-20 और वनडे मैचों में नहीं खेलेंगे और आराम करेंगे। लेकिन कोहली को ये अंदेशा हो गया कि अगर रोहित शर्मा ने टी-20 और वनडे मैचों में अच्छा खेला और भारत को जीत दिला दी तो लिमिटेड ओवर क्रिकेट से उनकी कप्तानी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। इसी डर से उन्होंने फैसला बदल लिया। अब वे तीनों प्रारूपों की टीम के कप्तान हैं। ऐसा पहले भी हुआ है कि एक अच्छी भली भारतीय टीम गुटबाजी के वजह बर्बाद हुई है। क्या कोहली की इस सोच का टीम के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा ? कोहली लाख कहें कि ड्रेसिंग रूम का माहौल बहुत दोस्ताना है, लेकिन हकीकत कुछ और है। टीम में गुटबाजी है और यह छिपने वाली नहीं।

धोनी से सीखें कोहली-
कोहली धोनी से सीखें कि कप्तानी कैसे एक बेहतर खिलाड़ी को ट्रांसफर की जाती है। अगर धोनी ने 100 टेस्ट मैच खेलने का लोभ पाला होता तो क्या कोहली 2014 के अंत में कप्तान बन जाते ? 2016 में वनडे की कप्तानी छोड़ने के बाद धोनी ने कहा था कि उन्होंने कोहली के लिए ऐसा किया था। क्या विराट कोहली भी ऐसी दरियादिली दिखा सकते हैं ? 2014 में भारत की टीम आस्ट्रेलिया के दौरे पर थी। टीम के कप्तान धोनी थे। भारत चार टेस्ट मैचों की श्रृंखला में पहले दो टेस्ट हार कर 2-0 से पिछड़ चुका था। सीरीज में वापस आने के लिए तीसरा मैच जितना जरूरी था। मेलबर्न में तीसरा टेस्ट था। आस्ट्रेलिया ने भारत को जीतने के लिए 384 रनों का लक्ष्य दिया था। चौथी पारी में इतना बड़ा स्कोर बनाना आसान न था। ये टेस्ट ड्रा हो गया और भारत सीरीज हार गया। इस हार से हताश धोनी ने न केवल कप्तानी छोड़ी बल्कि टेस्ट क्रिकेट से ही संन्यास ले लिया। ये फैसला उसी समय लागू हो गया और विराट कोहली चौथे टेस्ट के लिए कप्तान घोषित हो गये। तब धोनी ने कहा था कि एक बेहतर टीम बनाने के लिए यह फैसला लेना जरुरी था। उन्होंने कप्तानी और टेस्ट मैच को एक साथ अलविदा कहा था। धोनी ने जब कप्तानी छोड़ी उस समय तक वे 90 टेस्ट खेल चुके थे। वे चाहते तो 100 टेस्ट का लैंडमार्क छूने के लिए कुछ दिन और खेल सकते थे। लेकिन टीम के हित में ऐसा नहीं किया।
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1983 और 1985 में गुटबाजी से शर्मनाक हार
1983 में विश्वकप जीतने के बाद भारतीय टीम में गुटबाजी शुरू हो गयी थी। इगो की वजह से कुछ सीनियर खिलाड़ियों में खुन्नस थी। कप्तान कपिल से गावस्कर और मोहिंदर अमरनाथ की खटपट शुरू हो गयी थी। अमरनाथ विश्वकप में सेमीफाइनल और फाइनल के मैन ऑफ द मैच थे। उनकी लोकप्रियता शबाब पर थी। गावस्कर पहले से मशहूर बल्लेबाज थे। कपिल दुनिया के महान ऑलराउंडर में एक थे। लेकिन इन तीन नामी खिलाड़ियों में पटरी नहीं बैठ रही थी। इसी बीच अक्टूबर 1983 में वेस्टइंडीज की टीम भारत के दौरे पर आयी। वेस्टइंडीज विश्वकप फाइनल में भारत से हारने के बाद तिलमिलाया हुआ था। फिर तो उसने खेमों में बंटी भारतीय टीम दुर्दशा कर डाली। वेस्टइंडीज ने विश्वविजेता भारत को पांच वनडे मैचों की श्रृंखला में 5-0 से रौंद दिया। पहले टेस्ट में गावस्कर और अमरनाथ 0 पर आउट हुए। पांचवें टेस्ट में फिर गावस्कर और अमरनाथ 0 ही आउट हो गये। इन दोनों के प्रदर्शन के बाद यह आरोप लगा था कि ये दोनों कप्तान कपिल की भद्द पिटवाने के लिए खराब खेल रहे थे। हालांकि गावस्कर ने इस श्रृंखला में एक शतक और एक दोहरा शतक जरूर बनाया था लेकिन जब भारत को मैच बचाने की दरकार थी थी उन्होंने रन नहीं बनाये थे। इसकी वजह से भारत 6 टेस्ट मैचों की श्रृंखला 3-0 से हार गया था। 1984 में कपिल और गावस्कर में मैच फीस को लेकर झगड़ा हो गया था। इसकी वजह से गुटबंदी और तेज हो गयी थी। इसका नतीजा ये रहा कि भारत 1984-85 में इंग्लैंड से क्रिकेट श्रृंखला हार गया था।
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