इसे पढ़ने के बाद आप कभी नहीं कहेंगे... चक दे इंडिया
हरियाणा की सरकार खिलाड़ियों के लिए बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन उसी राज्य की सात लड़कियां इसलिए हिलाचल प्रदेश चली गयीं क्योंकि उनके पास अपनी प्रतिभा को निखारने के लिए ना कोच था और ना मैदान और ना ही खेलने के लिए हॉकी स्टिक। जिन हाथों में हॉकी स्टिक होनी चाहिए आज उन्ही हाथों में फसल काटने वाली दरांति है।
ये कहानी है हरियाणा की डिम्पल और सोनिया की जिनका सपना है कि देश के लिए सम्मान पाएं, लेकिन उनके कंधे पर अपने मां बाप की थोड़ी जमीन से अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का भार भी है। इस मजबूरी के कारण ये दोनों राष्ट्रीय खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग छोड़कर गांव आकर अपने खेतों में गेहूं की फसल काट रही हैं।
डिम्पल और सोनिया का गांव हरियाणा के कैथल में हैं। लेकिन दोनों हिमाचल प्रदेश की ओर से खेलती हैं। मां बाप के पास यहा गांव में छोड़ी सी जमीन है, इसिलिए यहां उनकी मदद के लिए अपनी ट्रेनिंग छोड़कर खेतों में काम करने चली आती हैं। दिनभर चिलचिलाती धूप में खेतों में काम करना और फिर वक्त मिलने पर शाम को हांकी की अभ्यास करना।
अगर ये हिमाचल से अपनी प्रैक्टिस छोड़कर न आएं तो, इनके मां बाप दो वक्त की रोटी के भी मोहताज हो जाएं।
हिमांचल से ट्रेनिंग छोड़कर गांव लौटने वाली यह हॉकी खिलाड़ी गांव में लगभग 50 लड़कियों को हॉकी के गुर सिखा रही हैं। हालात ऐसे है कि देश के लिए खेलने का सपना देखने वाली इन लड़कियों के पास ना तो जूते तक नहीं है, कई लड़किया तो बिना जूते के ही प्रैक्टिस करती है। कमियां तो और भी है लेकिन हरियाणा की ये लड़कियां इनको अपनी मजबूती बनाकर निरंतर अभ्यास में लगी है।
ये कहानी है हरियाणा की डिम्पल और सोनिया की जिनका सपना है कि देश के लिए सम्मान पाएं, लेकिन उनके कंधे पर अपने मां बाप की थोड़ी जमीन से अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का भार भी है। इस मजबूरी के कारण ये दोनों राष्ट्रीय खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग छोड़कर गांव आकर अपने खेतों में गेहूं की फसल काट रही हैं।
डिम्पल और सोनिया का गांव हरियाणा के कैथल में हैं। लेकिन दोनों हिमाचल प्रदेश की ओर से खेलती हैं। मां बाप के पास यहा गांव में छोड़ी सी जमीन है, इसिलिए यहां उनकी मदद के लिए अपनी ट्रेनिंग छोड़कर खेतों में काम करने चली आती हैं। दिनभर चिलचिलाती धूप में खेतों में काम करना और फिर वक्त मिलने पर शाम को हांकी की अभ्यास करना।
अगर ये हिमाचल से अपनी प्रैक्टिस छोड़कर न आएं तो, इनके मां बाप दो वक्त की रोटी के भी मोहताज हो जाएं।
हिमांचल से ट्रेनिंग छोड़कर गांव लौटने वाली यह हॉकी खिलाड़ी गांव में लगभग 50 लड़कियों को हॉकी के गुर सिखा रही हैं। हालात ऐसे है कि देश के लिए खेलने का सपना देखने वाली इन लड़कियों के पास ना तो जूते तक नहीं है, कई लड़किया तो बिना जूते के ही प्रैक्टिस करती है। कमियां तो और भी है लेकिन हरियाणा की ये लड़कियां इनको अपनी मजबूती बनाकर निरंतर अभ्यास में लगी है।
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:16 [IST]
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