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टेस्ट क्रिकेट का अस्तित्व ख़तरे में

प्रदीप मैगज़ीन

वरिष्ठ खेल पत्रकार

सचिन तेंदुलकर के शांत चेहरे, बल्लेबाज़ी के जोश और करियर की शुरुआत जैसी रनों की भूख को देखकर लगता है कि संभवत: वे टेस्ट मैचों में 20 हज़ार रन भी बना सकते हैं.

स्पष्ट है कि क्रिकेट के इस अदभुत चमत्कार की कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है. हो सकता है कि कोलंबो में उनका दोहरा शतक उनकी बेहतरीन पारियों में एक न हो क्यों पिच ही ऐसी थी.

लेकिन उस पारी से ये तो साफ़ दिखाई देता है कि बल्लेबाज़ी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और एकाग्रता से विकेट पर टिकने की क्षमता उतनी ही प्रबल है जैसी तब थी जब उन्होंने अपना क्रिकेट करियर शुरु किया था.

लेकिन इस स्तंभ का मक़सद हमारे समय के सबसे महान बल्लेबाज़ का गुणगान करना नहीं है. न ही इसमें मैं बेहतरीन स्ट्रोक प्ले के ज़रिए शतक लगाने वाले, काबिलियत के धनी, सुरेश रैना की संभावनाओं और भविष्य में भारतीय बल्लेबाज़ी की रीढ़ बनने की बात करुँगा.

प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में फ़ील्ड पर बनाए गए हर रन की अपनी जगह होती है. प्रतिस्पर्धा जितनी कड़ी होती है, रनों और विकेटों की कद्र उतनी ज़्यादा होती है.

लेकिन अब ऐसे मैच के बारे में कोई क्या कहे जिसमें लगभग पूरे मैच के दौरान टेल-एंडर भी शतक बनाने में सक्षम नज़र आ रहे थे और अच्छे-ख़ासे गेंदबाज़ विकेट लेना तो दूर, बल्ले को 'बीट' करने में भी विफल थे.

अंतिम दिन जब लंच के बाद अचानक गेंद ने टर्न करना शुरु किया तब बल्लेबाज़ और गेंदबाज़ का मुक़ाबला रोचक होने लगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

यह केवल ये दर्शाता है कि जब पिच से गेंदबाज़ को मदद मिलने लगती है तो एक नीरस मैच में भी जान फूँकी जा सकती है और उसमें दर्शकों की दिलचस्पी बन जाती है.

इन शतकों का रिकॉर्ड की किताबें भरने और एवरेजिस बढ़ाने के अलावा क्या महत्व है? ये शर्मनाक है कि ऐसे समय जब हम सभी डरते हैं कि टेस्ट क्रिकेट के अस्तित्व को ही ख़तरा है, इस उप महाद्वीप में हम अब भी ऐसी विकेट बना रहे हैं जहाँ गेंदबाजों का प्रदर्शन बेमानी हो जाता है और बल्लेबाज़ आँखों पर पट्टी बांधकर भी रन बना सकते हैं.

जिस तरह भारत-श्रीलंका के हाल के टेस्ट मैच में हुआ, इससे टेस्ट खेलने की पूरी प्रक्रिया बेमानी हो जाती है और दर्शक न केवल स्टेडियम से बल्कि अपने टीवी से भी दूर भाग जाते हैं. टेस्ट मैच देखने का मज़ा तभी है अगर बल्ले और गेंद के बीच सही संतुलन हो और विकेट से गेंदबाज़ों को पर्याप्त मदद मिले ताकि बल्लेबाज़ों की काबिलियत की सही परीक्षा हो सके.

ऑस्ट्रेलिया-पाकिस्तान के टेस्ट मैच ने ये सिद्ध कर दिया है कि टेस्ट मैचों का कोई विकल्प नहीं है. दोनों टीमों के बीच द्वंद्व इसलिए इतना रोचक रहा क्योंकि हालात ऐसे थे जिनमें तेज़ गेंदबाज़ों को मदद मिली और बल्लेबाज़ों को कड़ी परीक्षा से गुज़रना पडा.

हम इस महाद्वीप में ऐसी विकेट क्यों बनाते हैं जिसके कारण क्रिकेट की कसमें खाने वाले दर्शक भी इतने निराश हो जाते हैं कि अगर उनके प्रिय खेल का अंत भी हो जाए तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता.

ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि पाँच दिवसीय टेस्ट क्रिकेट के ख़िलाफ़ कोई षड्यंत्र रचा जा रहा हो ताकि जनता के लिए टी-20 देखने के अलावा मनोरंजन का कोई साधन ही न बचे.

यदि मेरी बात मानें तो मैं सबसे पहले भारत-श्रीलंका के एक दूसरे के ख़िलाफ़ खेलने पर अगले दो साल तक प्रतिबंध लगा दूँ. यदि कहीं पर ऐसा विकेट बनाया जाए जिस पर बल्लेबाज़ को आउट करना दीवार में सिर मारने के समान हो, तो ऐसे स्टेडियम पर हमेशा के लिए अंतरराष्ट्रीय मैच की मेज़बानी करने का प्रतिबंध लगा देना चाहिए. यदि ऐसा नहीं होता तो उपमहाद्वीप में टेस्ट क्रिकेट का अंत हो जाएगा और ये इतनी जल्दी होगा कि हमने इसकी कल्पना भी नहीं की होगी.

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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