कम उम्र में रन बनाने से आप सचिन नहीं बन जाते, पृथ्वी शॉ को लेनी होगी बड़ी सीख
नई दिल्ली: पृथ्वी शॉ को भारत का अगला सचिन तेंदुलकर कहा जा रहा था। इस किशोर बल्लेबाज ने पिछले साल वेस्ट इंडीज के खिलाफ घरेलू सीरीज में टेस्ट शतक लगाकर एक सनसनीखेज अंतर्राष्ट्रीय करियर की शुरुआत की थी। इससे पहले, उन्होंने 2018 में न्यूजीलैंड में अंडर -19 विश्व कप खिताब के लिए भारत का नेतृत्व किया। पृथ्वी से जो आसमान सरीखी उम्मीदें लगाई जा रही थी उनको सबसे बड़ा झटका 30 जुलाई, 2019 को तब लगा जब वे 15 नवंबर तक क्रिकेट से निलंबित हो गए। उनको आठ महीने का प्रतिबंध झेलना पड़ेगा जिसकी शुरुआत मार्च 2019 से मानी जाएगी। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अनुसार, पृथ्वी ने अनजाने में एक बैन किए जा चुके पदार्थ का सेवन किया था, यह पदार्थ आमतौर पर कफ सिरप में मिलता है।

शानदार रफ्तार से चली करियर की गाड़ी पर लगा ब्रेक-
इसका मतलब साफ है कि पृथ्वी दक्षिण अफ्रीका और बांग्लादेश के खिलाफ घरेलू सीरीज से बाहर रहेंगे। उन्हें कूल्हे की चोट के कारण अगले महीने से शुरू होने वाले वेस्टइंडीज के दौरे के लिए नहीं चुना गया है और एडिलेड में पहले मैच की पूर्व संध्या पर टखने की चोट ने भी उनको काफी काफी परेशान किया था और वे पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज में हिस्सा लेने से भी चूक गए। कारण चाहे जो भी रहा है सच यह है कि एक बेहतरीन शुरुआत के बाद पृथ्वी के अंतरराष्ट्रीय करियर की रफ्तार पर काफी अंकुश लग गया है। बीसीसीआई पृथ्वी के इस जवाब से संतुष्ट है कि उन्होंने दवा का सेवन फेफड़ों के इंफेक्शन को ठीक करने के लिए लिया था ना की अपनी परफारमेंस सुधारने के लिए। इसके बावजूद बीसीसीआई नियमों से बंधा था और उसने शॉ को अपेक्षाकृत कम समय के लिए ही सही लेकिन निलंबित किया।

कम उम्र में रन बनाने से हर कोई सचिन नहीं बनता-
पृथ्वी शॉ आज की पीढ़ी के उन युवाओं में हैं जो बहुत कम समय में मिली शोहरत को संभालने में दिक्कत महसूस कर सकते हैं। ऐसे में उनके पास सचिन तेंदुलकर जैसा महान मार्गदर्शक है जिनके साथ वे ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान भी काफी बातचीत कर चुके हैं। सचिन ने भी अपना करियर केवल 16 साल की उम्र में शुरू किया था और एक भी विवाद उनके करियर में अड़चन नहीं डाल पाया। निश्चित तौर पर इस समय युवाओं के लिए सचिन के युग की तुलना में खुद को संभालना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। हमको यह समझना बहुत जरूरी है कि महानता का संबंध कम उम्र में रन बनाने से नहीं है बल्कि यह सारा खेल स्थिरता का है। इसलिए पृथ्वी की तुलना सचिन से तब की जानी चाहिए जब वह कुछ समय का क्रिकेट खेलकर खुद को साबित कर दें।
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क्रिकेट के साथ जीवन की भी ट्रेनिंग लेनी जरूरी-
वैसे भी सचिन तेंदुलकर बनना बहुत मुश्किल है और विनोद कांबली की तरह अपना करियर बर्बाद करना ज्यादा आसान है। एक समय कांबली, सचिन से भी ज्यादा टैलेंटिड माने जाते थे। उन्होंने 1990 में इंग्लैंड और जिंबाब्वे के खिलाफ बैक टू बैक दो डबल सेंचुरी लगाकर ये बात साबित भी की थी। लेकिन उसके बाद सब खत्म हो गया। खरगोश और कछुए की चाल में तेंदुलकर यह रेस जीत गए थे। ऐसे में यदि आप सचिन को केवल छूना भी चाहते हैं तो पृथ्वी और उनकी तरह के कई युवा खिलाड़ियों को केवल अपने क्रिकेट कौशल पर ध्यान लगाने की जगह अन्य चीजों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। क्रिकेट में अस्तित्व बनाए रखने के लिए बहुत लंबा रास्ता तय करना होता है और टी20 टाइप तकनीक के दम पर आप बहुत लंबी पारी नहीं खेल सकते हैं।
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