कहीं यह कोई सपना या छलावा तो नहीं!
ओलंपिक स्टेडियम में तिरंगा लहराया, राष्ट्रगान की धुन बजी तो एकबारगी तो यही लगा कि कहीं यह कोई सपना या छलावा तो नहीं है...
आम भारतीय की बात छोड़ें, खेल प्रेमियों से भी अगर आप यह सवाल आज से पहले पूछते तो शायद ज़्यादा लोगों को बिंद्रा का नाम सुनने पर पहले पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष आईएस बिंद्रा का नाम ही ध्यान आता.
यह आज अभिनव बिंद्रा ने जो कर दिखाया है वह आज से पहले किसी गावस्कर या तेंदुलकर ने भी नहीं किया.
जिस समय अभिनव को स्वर्ण पदक मिला, ओलंपिक स्टेडियम में तिरंगा लहराया और राष्ट्रगान की धुन बजी तो एकबारगी यही लगा कि कहीं यह कोई सपना, छलावा या किसी कंपनी का दिल छूने वाला स्मार्ट विज्ञापन तो नहीं है. ख़ुद की नज़रों पर ही जैसे विश्वास नहीं हो रहा था.
फिर अनुभवी और घिसे हुए टीवी एंकरों के कुछ रुंधे गले और टीवी न्यूज़ रूम में बज रही तालियों और सभी चैनल्स पर मच रही ब्रेकिंग न्यूज़ की होड़ से बात सही सही समझ में आने लगी.
समझ में आने लगा कि कुछ असंभव सी लगने वाली ऐतिहासिक घटना घट चुकी है.
आशा की बूंद
एक ऐसे माहौल में जब देश में सिर्फ़ हताशा, निराशा और असंतोष की ख़बरें ही सुर्खियाँ बन रही थीं, उस सबके बीच अभिनव का यह स्वर्ण पदक जैसे एक प्यासे राष्ट्र के लिए आशा की बूंद बन कर आया है.
अभिनव ने जो कर दिखाया है वह गावस्कर या तेंदुलकर ने भी नहीं किया
जैसा कि मेरे सहयोगी रेहान फ़ज़ल ने कहा कि जब उन्होंने अभिनव के स्वर्ण का समाचार सुना तो मन हुआ कि वह चलती गाड़ी से उतर कर सड़क पर नाचना शुरू कर दें.
शायद बहुत लोगों को आज भारत में एक अजीब तरह की खुशी का एहसास हुआ होगा.
एक ऐसी खुशी जिसमें शायद 20-20 चैंपियनशिप की जीत का उन्माद नहीं है और शायद अभिनव कभी भी धोनी, युवराज जैसी लोकप्रियता की बुलंदी भी नहीं छुए, पर आज के स्वर्ण पदक में एक अलग और अजब से ठहराव, गर्व और राष्ट्रवाद का समिश्रण है.
और इस अनुभूति में कुछ भी जिंगोइस्टिक या कहिए नकारात्मक राष्ट्रवाद नहीं है.
आज की अनुभूति में एक ख़ास तरह का इत्मिनान है, आत्मसम्मान है कि आख़िरकार दुनिया के दूसरे सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राष्ट्र में एक अरब से भी ज़्यादा लोगों में एक तो ऐसा निकला जिसने आज भारत को पहली बार अंतरराष्ट्रीय और वह भी ओलंपिक के मंच पर अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया.
हम होंगे कामयाब गाने को सुनते हुए इतने वर्ष हो गए थे कि लगने लगा था कि इस गीत के बोल शायद ही कभी यथार्थ बन पाएं.
कम से कम ओलंपिक के संदर्भ में तो आज अभिनव ने इस गीत को चरितार्थ कर दिखाया है.
और भरा है राष्ट्र में और भारत के युवा में एक नया आत्मविश्वास कि हमारे लिए भी असंभव कुछ नहीं है.
आम भारतीय की बात छोड़ें, खेल प्रेमियों से भी अगर आप यह सवाल आज से पहले पूछते तो शायद ज़्यादा लोगों को बिंद्रा का नाम सुनने पर पहले पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष आईएस बिंद्रा का नाम ही ध्यान आता.
यह आज अभिनव बिंद्रा ने जो कर दिखाया है वह आज से पहले किसी गावस्कर या तेंदुलकर ने भी नहीं किया.
जिस समय अभिनव को स्वर्ण पदक मिला, ओलंपिक स्टेडियम में तिरंगा लहराया और राष्ट्रगान की धुन बजी तो एकबारगी यही लगा कि कहीं यह कोई सपना, छलावा या किसी कंपनी का दिल छूने वाला स्मार्ट विज्ञापन तो नहीं है. ख़ुद की नज़रों पर ही जैसे विश्वास नहीं हो रहा था.
फिर अनुभवी और घिसे हुए टीवी एंकरों के कुछ रुंधे गले और टीवी न्यूज़ रूम में बज रही तालियों और सभी चैनल्स पर मच रही ब्रेकिंग न्यूज़ की होड़ से बात सही सही समझ में आने लगी.
समझ में आने लगा कि कुछ असंभव सी लगने वाली ऐतिहासिक घटना घट चुकी है.
आशा की बूंद
एक ऐसे माहौल में जब देश में सिर्फ़ हताशा, निराशा और असंतोष की ख़बरें ही सुर्खियाँ बन रही थीं, उस सबके बीच अभिनव का यह स्वर्ण पदक जैसे एक प्यासे राष्ट्र के लिए आशा की बूंद बन कर आया है.
अभिनव ने जो कर दिखाया है वह गावस्कर या तेंदुलकर ने भी नहीं किया
जैसा कि मेरे सहयोगी रेहान फ़ज़ल ने कहा कि जब उन्होंने अभिनव के स्वर्ण का समाचार सुना तो मन हुआ कि वह चलती गाड़ी से उतर कर सड़क पर नाचना शुरू कर दें.
शायद बहुत लोगों को आज भारत में एक अजीब तरह की खुशी का एहसास हुआ होगा.
एक ऐसी खुशी जिसमें शायद 20-20 चैंपियनशिप की जीत का उन्माद नहीं है और शायद अभिनव कभी भी धोनी, युवराज जैसी लोकप्रियता की बुलंदी भी नहीं छुए, पर आज के स्वर्ण पदक में एक अलग और अजब से ठहराव, गर्व और राष्ट्रवाद का समिश्रण है.
और इस अनुभूति में कुछ भी जिंगोइस्टिक या कहिए नकारात्मक राष्ट्रवाद नहीं है.
आज की अनुभूति में एक ख़ास तरह का इत्मिनान है, आत्मसम्मान है कि आख़िरकार दुनिया के दूसरे सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राष्ट्र में एक अरब से भी ज़्यादा लोगों में एक तो ऐसा निकला जिसने आज भारत को पहली बार अंतरराष्ट्रीय और वह भी ओलंपिक के मंच पर अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया.
हम होंगे कामयाब गाने को सुनते हुए इतने वर्ष हो गए थे कि लगने लगा था कि इस गीत के बोल शायद ही कभी यथार्थ बन पाएं.
कम से कम ओलंपिक के संदर्भ में तो आज अभिनव ने इस गीत को चरितार्थ कर दिखाया है.
और भरा है राष्ट्र में और भारत के युवा में एक नया आत्मविश्वास कि हमारे लिए भी असंभव कुछ नहीं है.
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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