'गुरु' ग्रेग के गुर और ऑस्ट्रेलिया का खेल
बंगलौर में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले जा रहे क्रिकेट मैच की कुछ चुलबुली और अंदर की ख़बर बता रहे हैं बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव...
भारतीय पिचों पर तो 123 रनों की पोंटिंग की पारी सबसे बेहतरीन है ही. लेकिन गौर करनेवाली बात ये है की शायद गुरु ग्रेग से मिले इस महत्वपूर्ण गुर, कि भारतीय पिचों पर गेंद थोड़ी धीमे आती है इसलिए रुक कर अपने शॉट्स खेलने चाहिए, शायद अब पोंटिंग की समझ में आ चुका है.
वैसे शुक्रवार की सुबह क़रीब आठ बजे जब ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी नेट पर अभ्यास करने मैदान पर पहुंचे तो मैंने भी ग्रेग चैपल से पोंटिंग की उम्दा पारी के बारे में पूछा.
चैपल का कहना था, "शायद पोंटिंग आगे चल के टेस्ट क्रिकेट इतिहास में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज़ भी बन जाएं."
क्रिकेटर या पहलवान
सबसे पहले नेट्स में अभ्यास करने पहुंचे थे ऑस्ट्रेलिया के ऑलराउंडर स्टुअर्ट क्लार्क.
क़रीब छह फुट और पाँच इंच लंबे स्टुअर्ट पास से किसी फ़्रीस्टाइल कुश्ती पहलवान से कम नहीं नज़र आते हैं.
लगभग आधे घंटे तक एक ही स्टंप पर गेंदबाज़ी का अभ्यास करने के बाद स्टुअर्ट क्लार्क ने 20 मिनट तक बल्लेबाज़ी पर भी हाथ आज़माया.
वैसे क्लार्क का एक भरतीय कनेक्शन भी है. उनके पिता यहीं इसी शहर बंगलौर में रह चुके हैं.
'मुझे बुड्ढा मिल गया..'
टेस्ट श्रंखला शुरू होने के पहले ऑस्ट्रेलिया के कप्तान रिकी पोंटिंग ने पत्रकारों से बात करते वक्त कहा था की उनकी टीम थोड़ी लचर भरतीय फील्डिंग को ज़रूर निशाना बनाएगी.
हुआ भी ऐसा ही. क़रीब डेढ़ दिन ऑस्ट्रेलिया की बल्लेबाज़ी को गौर से देखने के बाद एहसास हुआ कि जिस तरफ़ थोड़े उम्रदराज़ भारतीय खिलाड़ी फील्डिंग करते हैं, ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज़ उसी तरफ़ ज़्यादा से ज़्यादा गेंदों को अपने बल्ले से टिका कर एक या फिर दो रन चुरा लेते हैं.
कम से कम डेढ़ दिन के खेल में तो यही देखने देखने मिला.
ख़ास तौर पर ऑफ़ साइड फील्डिंग को मैदान पर दौड़ाते रखा रिकी पोंटिंग, साइमन कटिच और फिर हस्सी ने भी.
क्योंकि चाहे वो फील्डिंग कर रहे कप्तान अनिल कुंबले हों या फिर स्लिप्स में लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ हों.
दादा यानी सौरव गांगुली की फील्डिंग को भी निशाना बना रखा था इन बल्लेबाज़ों ने और दादा कभी मिड ऑफ़ पर तो कभी लॉन्ग ऑन पर गेंद का पीछा करते देखे जा सकते थे.
गुठलियों के दाम
क्रिकेट मैदान में सुरक्षा के लिए कड़े इंतज़ाम हैं
कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन ने एक बेहद नायाब तरीका निकला है राज्य के नामी-गिरामी चित्रकारों को मैच देखने के लिए आमंत्रित करने का.
ख़ास बात ये है कि इन सभी चित्रकारों को, चाहे वो राहुल द्रविड़ की माँ पुष्पा द्रविड़ हों या फिर जेसू रावल, शंकर केंदाली और रानी रेखी हों, सभी को पेंटिंग करने की एक ख़ास जगह दी गई है.
मैच ख़त्म होने के बाद इन चित्रों में से कुछ को राज्य क्रिकेट एसोसिएशन को तोहफ़े में देने के अलावा परोपकार करने के लिए नीलाम भी किया जाएगा.
क्रिकेट पर पहरा
अब बात चिन्नास्वामी स्टेडियम के सुरक्षा इंतज़ामों की. स्टेडियम में दाखिल होते ही पहला एहसास यही होता है की मानों किसी छावनी में आ पहुंचे हैं.
यहाँ तक कि पत्रकारों को अपने मीडिया बॉक्स से पैवेलियन के दूसरे हिस्सों में चहलकदमी करने को बड़ी नम्रता से मना कर दिया जाता है.
मुख्य द्वार पर आपका स्वागत करेंगे बम निरोधक दस्ते के बेहद प्रशिक्षित लाब्राडोर और जर्मन शेफ़र्ड नस्ल के कुत्ते.
उसके बाद हर किसी को नाना प्रकार के मेटल डिटेक्टोरों से गुज़रते हुए अपनी अपनी जगह पर पहुंचना होता है.
पूरे स्टेडियम में 32 सीसीटीवी कैमरे भी जगह जगह पर लगाए गए हैं ताकि अंदर होने वाली हर गतिविधि पर नज़र रखी जा सके.
राज्य क्रिकेट एसोसिएशन ने ख़ुद पहल करते हुए एक निजी बम-निरोधक कंपनी, मिक्रो सेक को लगा रखा है. इनके जवान काले रंग की एक ख़ास कमांडो वर्दी में हर तरफ़ नज़र आते हैं और ख़ास तौर पर मैदान के भीतर बाउंड्री के इर्द-गिर्द.
इन जवानों की हेलमेट पर भी कैमरा लगे हुए हैं और इनके हाथ में एक ऐसा उपकरण है जिससे पाँच सौ मीटर तक की दूरी में अगर कोई भी विस्फोटक होंगे तो इनके सेन्सर्स उन्हें पकड़ लेंगे.
भारतीय पिचों पर तो 123 रनों की पोंटिंग की पारी सबसे बेहतरीन है ही. लेकिन गौर करनेवाली बात ये है की शायद गुरु ग्रेग से मिले इस महत्वपूर्ण गुर, कि भारतीय पिचों पर गेंद थोड़ी धीमे आती है इसलिए रुक कर अपने शॉट्स खेलने चाहिए, शायद अब पोंटिंग की समझ में आ चुका है.
वैसे शुक्रवार की सुबह क़रीब आठ बजे जब ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी नेट पर अभ्यास करने मैदान पर पहुंचे तो मैंने भी ग्रेग चैपल से पोंटिंग की उम्दा पारी के बारे में पूछा.
चैपल का कहना था, "शायद पोंटिंग आगे चल के टेस्ट क्रिकेट इतिहास में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज़ भी बन जाएं."
क्रिकेटर या पहलवान
सबसे पहले नेट्स में अभ्यास करने पहुंचे थे ऑस्ट्रेलिया के ऑलराउंडर स्टुअर्ट क्लार्क.
क़रीब छह फुट और पाँच इंच लंबे स्टुअर्ट पास से किसी फ़्रीस्टाइल कुश्ती पहलवान से कम नहीं नज़र आते हैं.
लगभग आधे घंटे तक एक ही स्टंप पर गेंदबाज़ी का अभ्यास करने के बाद स्टुअर्ट क्लार्क ने 20 मिनट तक बल्लेबाज़ी पर भी हाथ आज़माया.
वैसे क्लार्क का एक भरतीय कनेक्शन भी है. उनके पिता यहीं इसी शहर बंगलौर में रह चुके हैं.
'मुझे बुड्ढा मिल गया..'
टेस्ट श्रंखला शुरू होने के पहले ऑस्ट्रेलिया के कप्तान रिकी पोंटिंग ने पत्रकारों से बात करते वक्त कहा था की उनकी टीम थोड़ी लचर भरतीय फील्डिंग को ज़रूर निशाना बनाएगी.
हुआ भी ऐसा ही. क़रीब डेढ़ दिन ऑस्ट्रेलिया की बल्लेबाज़ी को गौर से देखने के बाद एहसास हुआ कि जिस तरफ़ थोड़े उम्रदराज़ भारतीय खिलाड़ी फील्डिंग करते हैं, ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज़ उसी तरफ़ ज़्यादा से ज़्यादा गेंदों को अपने बल्ले से टिका कर एक या फिर दो रन चुरा लेते हैं.
कम से कम डेढ़ दिन के खेल में तो यही देखने देखने मिला.
ख़ास तौर पर ऑफ़ साइड फील्डिंग को मैदान पर दौड़ाते रखा रिकी पोंटिंग, साइमन कटिच और फिर हस्सी ने भी.
क्योंकि चाहे वो फील्डिंग कर रहे कप्तान अनिल कुंबले हों या फिर स्लिप्स में लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ हों.
दादा यानी सौरव गांगुली की फील्डिंग को भी निशाना बना रखा था इन बल्लेबाज़ों ने और दादा कभी मिड ऑफ़ पर तो कभी लॉन्ग ऑन पर गेंद का पीछा करते देखे जा सकते थे.
गुठलियों के दाम
क्रिकेट मैदान में सुरक्षा के लिए कड़े इंतज़ाम हैं
कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन ने एक बेहद नायाब तरीका निकला है राज्य के नामी-गिरामी चित्रकारों को मैच देखने के लिए आमंत्रित करने का.
ख़ास बात ये है कि इन सभी चित्रकारों को, चाहे वो राहुल द्रविड़ की माँ पुष्पा द्रविड़ हों या फिर जेसू रावल, शंकर केंदाली और रानी रेखी हों, सभी को पेंटिंग करने की एक ख़ास जगह दी गई है.
मैच ख़त्म होने के बाद इन चित्रों में से कुछ को राज्य क्रिकेट एसोसिएशन को तोहफ़े में देने के अलावा परोपकार करने के लिए नीलाम भी किया जाएगा.
क्रिकेट पर पहरा
अब बात चिन्नास्वामी स्टेडियम के सुरक्षा इंतज़ामों की. स्टेडियम में दाखिल होते ही पहला एहसास यही होता है की मानों किसी छावनी में आ पहुंचे हैं.
यहाँ तक कि पत्रकारों को अपने मीडिया बॉक्स से पैवेलियन के दूसरे हिस्सों में चहलकदमी करने को बड़ी नम्रता से मना कर दिया जाता है.
मुख्य द्वार पर आपका स्वागत करेंगे बम निरोधक दस्ते के बेहद प्रशिक्षित लाब्राडोर और जर्मन शेफ़र्ड नस्ल के कुत्ते.
उसके बाद हर किसी को नाना प्रकार के मेटल डिटेक्टोरों से गुज़रते हुए अपनी अपनी जगह पर पहुंचना होता है.
पूरे स्टेडियम में 32 सीसीटीवी कैमरे भी जगह जगह पर लगाए गए हैं ताकि अंदर होने वाली हर गतिविधि पर नज़र रखी जा सके.
राज्य क्रिकेट एसोसिएशन ने ख़ुद पहल करते हुए एक निजी बम-निरोधक कंपनी, मिक्रो सेक को लगा रखा है. इनके जवान काले रंग की एक ख़ास कमांडो वर्दी में हर तरफ़ नज़र आते हैं और ख़ास तौर पर मैदान के भीतर बाउंड्री के इर्द-गिर्द.
इन जवानों की हेलमेट पर भी कैमरा लगे हुए हैं और इनके हाथ में एक ऐसा उपकरण है जिससे पाँच सौ मीटर तक की दूरी में अगर कोई भी विस्फोटक होंगे तो इनके सेन्सर्स उन्हें पकड़ लेंगे.
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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