'बहस को देश की अस्मिता से न जोड़ें'
गिलक्रिस्ट की आत्मकथा में सचिन के बारे में कही बातों पर बहस ज़रूर होनी चाहिए, लेकिन इसे देश की अस्मिता और अखंडता से जोड़कर नहीं देखना चाहिए.
और अगर कोई इन खूबियों पर ऊंगली उठाता है तो उससे ऐसा सलूक किया जाता है मानो वो देश का दुश्मन हो.
यहाँ तक कि हल्की-फुल्की आलोचनाओं पर भी ऐसी प्रतिक्रिया दी जाती है मानो ये भारत की संस्कृति और नैतिक मूल्यों पर हमला है.
अब एडम गिलक्रिस्ट की आत्मकथा को ही लें.
एक ऑस्ट्रेलियाई अख़बार में ये ख़बर छपी कि हरभजन सिंह-एंड्र्यू साइमंड्स विवाद के समय गवाही के दौरान सचिन के अपनी बात से पलट जाने पर गिलक्रिस्ट को निराशा हुई थी.
गिलक्रिस्ट ने इसका जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है. इस पर ज़ोरदार प्रतिक्रिया हुई जबकि इसका नस्लभेद से कुछ लेना-देना नहीं है.
नज़रिया
अगर गिलक्रिस्ट के नज़रिए से देखें तो उन्हें उम्मीद थी कि सचिन इस विवाद की पहली सुनवाई के दौरान दिए गए बयान पर क़ायम रहेंगे, लेकिन जब निर्णायक सुनवाई में ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें निराशा हुई.
अगर गिलक्रिस्ट जो कह रहे हैं वो सच है तो उन्होंने अपनी भावनाओं के साथ न्याय किया है. लेकिन जो कुछ उन्होंने कहा अगर वो सच नहीं है तो इससे साबित होता है कि वो झूठे हैं.
ये मसला हर हाल में यहीं खत्म हो जाना चाहिए था. इससे न तो तेंदुलकर के क्रिकेट की महानतम शख़्सियत की छवि पर कोई असर पड़ेगा और न ही बतौर व्यक्ति उनकी छवि प्रभावित होगी.
मान लेते हैं को गिलक्रिस्ट जो कुछ कह रहे हैं वो सच है, तो क्या भारतीयों को इस बात से ख़ुश नहीं होना चाहिए कि सचिन ने तब भी हरभजन सिंह का साथ देना बेहतर समझा, जबकि वो पक्की तरह नहीं जानते थे कि इस विवाद में हरभजन बेदाग़ हैं.
इस मामले को ‘हम बनाम वो का मुद्दा क्यों बनाएँ?
बेशक गिलक्रिस्ट, तेंदुलकर जितने बड़े खिलाड़ी न हों, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में उनकी छवि ईमानदार और अपनी बात साफ़-सीधे तरीक़े से रखने वाले खिलाड़ी की रही है.
कद्रदान
और ये माना जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया में ऐसे लोगों की संख्या काफ़ी अधिक है जो मानते हैं को गिलक्रिस्ट जो कह रहे हैं, वो सच है.
ठीक वैसे ही जैसे भारत में अधिकांश लोग वही मानेंगे जो इस मसले पर तेंदुलकर कहेंगे.
मुश्किल ये है कि इस तरह की बहस में जो चीज़ सबसे पहले दम तोड़ती है वो है सच. मुझे यक़ीन है कि जिन्होंने सुनवाई की होगी, उन्होंने उसके दस्तावेज़ भी सुरक्षित रखे होंगे.
लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी जिस तरह की गोपनीयता बरतती है उससे हमें कभी भी इन बैठकों की असलियत पता नहीं चल सकेगी.
दूसरी तरफ, अगर तेंदुलकर, गिलक्रिस्ट की बातों से इनकार करते हैं तब भी हम सच नहीं जान पाएँगे. ये बातें हमेशा के लिए किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे के लिए कही बात तक सीमित रह जाएँगी.
गिलक्रिस्ट की आत्मकथा का ये पन्ना क्रिकेट खेलने वाले दो देशों को हमेशा-हमेशा के लिए बाँट देगा.
ऑस्ट्रेलियाई भारतीयों की प्रतिक्रिया को अपने खिलाड़ी का बचाव क़रार देंगे तो भारत के लिए ये विवाद भी गोरे क्रिकेटरों के ख़िलाफ़ एकजुट होने की प्रतीक बन जाएगा.
मैं ये कहना चाहता हूँ कि इस मुद्दे पर स्वस्थ बहस होनी चाहिए और इसे देश की अस्मिता और अखंडता से जोड़कर नहीं देखना चाहिए.
हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि तमाम महान उपलब्धियों के बावजूद तेंदुलकर ये मानते हैं कि भारतीय होना तेंदुलकर से बड़ा है. लेकिन शायद भारत नहीं मानता कि वो तेंदुलकर हैं.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)
और अगर कोई इन खूबियों पर ऊंगली उठाता है तो उससे ऐसा सलूक किया जाता है मानो वो देश का दुश्मन हो.
यहाँ तक कि हल्की-फुल्की आलोचनाओं पर भी ऐसी प्रतिक्रिया दी जाती है मानो ये भारत की संस्कृति और नैतिक मूल्यों पर हमला है.
अब एडम गिलक्रिस्ट की आत्मकथा को ही लें.
एक ऑस्ट्रेलियाई अख़बार में ये ख़बर छपी कि हरभजन सिंह-एंड्र्यू साइमंड्स विवाद के समय गवाही के दौरान सचिन के अपनी बात से पलट जाने पर गिलक्रिस्ट को निराशा हुई थी.
गिलक्रिस्ट ने इसका जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है. इस पर ज़ोरदार प्रतिक्रिया हुई जबकि इसका नस्लभेद से कुछ लेना-देना नहीं है.
नज़रिया
अगर गिलक्रिस्ट के नज़रिए से देखें तो उन्हें उम्मीद थी कि सचिन इस विवाद की पहली सुनवाई के दौरान दिए गए बयान पर क़ायम रहेंगे, लेकिन जब निर्णायक सुनवाई में ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें निराशा हुई.
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ये मसला हर हाल में यहीं खत्म हो जाना चाहिए था. इससे न तो तेंदुलकर के क्रिकेट की महानतम शख़्सियत की छवि पर कोई असर पड़ेगा और न ही बतौर व्यक्ति उनकी छवि प्रभावित होगी.
मान लेते हैं को गिलक्रिस्ट जो कुछ कह रहे हैं वो सच है, तो क्या भारतीयों को इस बात से ख़ुश नहीं होना चाहिए कि सचिन ने तब भी हरभजन सिंह का साथ देना बेहतर समझा, जबकि वो पक्की तरह नहीं जानते थे कि इस विवाद में हरभजन बेदाग़ हैं.
इस मामले को ‘हम बनाम वो का मुद्दा क्यों बनाएँ?
बेशक गिलक्रिस्ट, तेंदुलकर जितने बड़े खिलाड़ी न हों, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में उनकी छवि ईमानदार और अपनी बात साफ़-सीधे तरीक़े से रखने वाले खिलाड़ी की रही है.
कद्रदान
और ये माना जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया में ऐसे लोगों की संख्या काफ़ी अधिक है जो मानते हैं को गिलक्रिस्ट जो कह रहे हैं, वो सच है.
ठीक वैसे ही जैसे भारत में अधिकांश लोग वही मानेंगे जो इस मसले पर तेंदुलकर कहेंगे.
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लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी जिस तरह की गोपनीयता बरतती है उससे हमें कभी भी इन बैठकों की असलियत पता नहीं चल सकेगी.
दूसरी तरफ, अगर तेंदुलकर, गिलक्रिस्ट की बातों से इनकार करते हैं तब भी हम सच नहीं जान पाएँगे. ये बातें हमेशा के लिए किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे के लिए कही बात तक सीमित रह जाएँगी.
गिलक्रिस्ट की आत्मकथा का ये पन्ना क्रिकेट खेलने वाले दो देशों को हमेशा-हमेशा के लिए बाँट देगा.
ऑस्ट्रेलियाई भारतीयों की प्रतिक्रिया को अपने खिलाड़ी का बचाव क़रार देंगे तो भारत के लिए ये विवाद भी गोरे क्रिकेटरों के ख़िलाफ़ एकजुट होने की प्रतीक बन जाएगा.
मैं ये कहना चाहता हूँ कि इस मुद्दे पर स्वस्थ बहस होनी चाहिए और इसे देश की अस्मिता और अखंडता से जोड़कर नहीं देखना चाहिए.
हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि तमाम महान उपलब्धियों के बावजूद तेंदुलकर ये मानते हैं कि भारतीय होना तेंदुलकर से बड़ा है. लेकिन शायद भारत नहीं मानता कि वो तेंदुलकर हैं.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:19 [IST]
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