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'क्रिकेटर हमें पैसे तो देते नहीं, फिर क्यों देखते हैं क्रिकेट?'

By हिमांशु तिवारी आत्मीय

भारत और क्रिकेट एक दूसरे का नाता, लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। फिर जब इंडिया का मैच पाकिस्तान से हो तो लोगों की दिलचस्पी देखते बनती है। जो लोग आमतौर पर क्रिकेट नहीं भी देखते या पसंद करते, वे सम्मान, भारत-पाक के बीच बरसों से चली आ रही तकरार की वजह से, एक दूसरे को नीचा दिखाने के कारण इंडिया वर्सेज पाकिस्तान के मैच में अपने तमाम काम समेटकर टेलीविजन सेट्स के सामने बैठ जाते हैं।

'अब फर्सट डेटिंग में कपल्स चांद-तारों की नहीं कोहली-युवी की करते हैं बातें'

लेकिन अक्सर एक सवाल हमारे परिवार के बड़े लोगों के द्वारा उठाया जाता है जिन्हें किसी भी तरह से अन्य टीमों के साथ मैच में इंट्रेस्ट नहीं है कि ''ये क्रिकेटर तुम्हें पैसे दे जाएंगे क्या आकर, नहीं न। फिर समय क्यों बर्बाद कर रहे हो।'' क्यों इस तरह के सवालों से आप भी रूबरू हुए हैं या नहीं। हुए होंगे। लेकिन फिर भी क्रिकेट देखते हैं। वास्तव में क्रिकेट को देखने से हमें वह किस तरह से प्रभावित करता है।

कुछ लोगों का मानना है कि काफी बुरे परिणाम हो जाते हैं। पर क्या ? आईये जानते हैं वन इंडिया की इस खास रिपोर्ट से-

बच्चों में क्रिकेट काफी ''पॉपुलर गेम''

संडे हो और घर के पास ग्राउंड हो तो बच्चों को क्रिकेट खेलते हुए देखना काफी आम बात है। यहां तक गली मुहल्लों में रहने वाले बच्चे भी क्रिकेट खेलने के लिए जगह ढूंढ़ ही लेते हैं। हां अब तो बाकायदा उसे नाम भी दे दिया गया है ''गली क्रिकेट''....लेकिन कई बार बच्चे कोचिंग क्लास, स्कूल को बंक करके क्रिकेट खेलते हैं या फिर टेलीविजन पर आ रहे मैच से चिपके रहते हैं। जो कि बच्चों को बुरी तरह से प्रभावित करता है। बच्चे अपने समय का काफी बड़ा हिस्सा क्रिकेट में खर्च करते हैं। कुछ तो खेलने में और कुछ देखने में।

और गहरी कर दी जाती हैं दुश्मनी की लकीरें

इंडिया-पाकिस्तान के बीच आयोजित होने वाला एक आम मैच भी कूटनीतिक रिश्तों में लंबे समय से खटास के चलते उन्माद में बदल जाता है। फिर तैयार होते हैं ''मौका-मौका'' सरीखे विज्ञापन। हालांकि यह महज किसी एक ओर से नहीं बल्कि दोनों देशों में होता है। पाकिस्तानी टीम के हारने के बाद खेल का उन्माद आक्रोश में तब्दील हो जाता है। टेलीविजन सेट्स फोड़े जाते हैं। पाकिस्तानी क्रिकेटर्स के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। जो कि गलत है या फिर सही ये आप ही तय करें।

दूसरे खेलों में दिलचस्पी न होना

भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी है। लेकिन क्या वाकई आपको लगता है कि क्रिकेट जैसी लोकप्रियता हॉकी की है। शायद नहीं। क्रिकेट के चलते भारत में दूसरे खेलों की अनदेखी आम है। ये बात सिर्फ संस्थागत तौर पर क्रिकेट को प्रोत्साहन दिए जाने की ही बात नहीं है, बल्कि चारों तरफ फैली क्रिकेट की खुमारी, पैसा और ग्लैमर के चलते नए खिलाड़ी भी दूसरे खेलों के बजाय सिर्फ क्रिकेट की ओर आकर्षित होते हैं।

सट्टा बाजार की क्रिकेट से गर्माहट

क्रिकेट में गर्म रहने वाले सट्टाबाजार से तो आप भली भांति परिचित होंगे। दरअसल ​क्रिकेट के मैदान के बाहर भी क्रिकेट के मैच खेले जाते हैं और इनकी शक्ल होती है अवैध सट्टेबाजी की। एक अनुमान के मुता​बिक एक विश्वकप के दौरान केवल भारत में तकरीबन दस हजार करोड़ रूपये से ज्यादा का सट्टा लगाया जाता है। इस सब में काला धन इस्तेमाल होता है।

बिकाऊ क्रिकेट के योद्धा

क्रिकेट के नए पैटर्न टी 20 लगान फिल्म के उस दृश्य को हकीकत सा पेश करते कि जीत के लिए कुछ भी कर गुजरना होगा। क्योंकि ऊंची बोलियों में क्रिकेटर्स के खेल को खरीदा गया है। बेहतरीन परफार्मेंस पर कीमत तय की गई हैं। साथ ही ये नया फार्मेट रोमन साम्राज्य के गुलाम ग्लेडिएटर्स की भी यादों को ताजा करते हैं, जो खरीदारों के एंटरटेनमेंट के लिए जान की बाजी लगाकर लड़ा करते थे। शायद आपको भी ये प्रभावित करता है।

Story first published: Monday, November 13, 2017, 11:14 [IST]
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