शतक का मीठा खुमार और कड़वा सच

By Super

प्रदीप मैगज़ीन

वरिष्ठ खेल पत्रकार

सचिन तेंदुलकर की जीवंतता, बढ़ती उम्र और अपने कौशल में सिद्धहस्त होने के बावजूद रन बनाने के लिए उनका बाल-सुलभ जुनून, इनकी प्रशस्ति के लिए भारी-भरकम विशेषणों की आवश्यकता नहीं है.

उनका नाम ही खेल में श्रेष्ठता का पर्याय बन गया है और वे कितने महान हैं ये कहने के लिए शब्दों को ख़र्च करने का कोई मतलब नहीं.

वे 50वाँ टेस्ट शतक नहीं भी लगाते या अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों का शतक नहीं भी लगा पाते, तो भी वे श्रेष्ठता के एक उदाहरण और एक ऐसी मरीचिका बने रहेंगे जहाँ हर खिलाड़ी पहुँचना चाहेगा.

सेंचुरियन टेस्ट को भारत में तेंदुलकर की उपलब्धि के तौर पर याद रखा जाएगा ना कि एक शर्मनाक हार के लिए और मेरे मन में इसे लेकर संशय है कि क्या एक ऐसे खेल को लेकर हमारा नज़रिया ऐसा होना चाहिए जो कि एक टीम-स्पर्धा है.

हमारा देश ऐसा देश है जहाँ रिकॉर्ड को लेकर बड़ा आग्रह रहता है, जहाँ विकेटों और शतकों की संख्या उन पराजयों से अधिक भारी पड़ती हैं जो हमने झेली हैं.

ये उस दौर में भी सच था जब हम बड़ी मुश्किल से कभी कोई मैच जीतते थे और तब किसी एक खिलाड़ी का प्रदर्शन हमारे घायल सम्मान पर लगानेवाला सबसे बढ़िया मरहम हुआ करता था.

मुझे 1996 का इंग्लैंड का एजबैस्टन टेस्ट अभी भी याद है जहाँ सचिन के शानदार शतक ने हमारा दिन बना दिया, वरना सदा की तरह ये भी भारत के लिए एक और हार वाला मैच बनकर रह जाता.

मुझे अभी भी उस दिन का बर्मिंघम से भेजा अपना लेख याद है जिसमें तेंदुलकर की बड़ाई की चर्चा अधिक थी कि कैसे उन्होंने क्रिकेट खेलनेवाली दुनिया को दिखाया कि बल्लेबाज़ी क्या होती है, और इसकी चर्चा कम कि कैसे हम उस मैच में लहुलूहान हो गए.

ये शतक तेंदुलकर के क्रिकेट जीवन का एक शानदार शतक था, जहाँ उन्होंने पूरी आक्रामकता से एक-पर-एक स्ट्रोक लगाए और एक धोखा दे सकनेवाली विकेट पर लुईस और कॉर्क की तेज़ गेंदों का सामना किया और फ़्रंटफ़ुट पर क़दम बाहर निकालकर स्पिनरों का मुक़ाबला किया.

वो पारी, उनकी दूसरी पारियों की ही तरह, एक पारंगत खिलाड़ी का खेल था, जो ना केवल बल्लेबाज़ी का व्याकरण समझता है बल्कि अपने नियम गढ़ भी सकता है.

तो अपने आप को एक और हार के ग़म में डुबा देने के स्थान पर हम सब उस जादुई पारी का उत्सव मनाने में जुट गए जिसने दुनिया की नज़रों में हमारी मान-मर्यादा को बचाए रखा.

आज, जब हम दुनिया की पहले नंबर की टीम हैं, ये सोच बदलनी चाहिए, मैं ये मान लेना चाहता हूँ कि तेंदुलकर की इस उपलब्धि पर जो उत्सवी वातावरण है, वो एक थोड़ी अलग चीज़ है, विशेष तौर पर इस उपलब्धि के आकार को देखते हुए.

इस उत्सव को सही ठहराया जा सकता है, मगर अपने प्रतिद्वंद्वियों के हाथों जो पारी की दुःखदायी हार को भुला दिया जाए, इस कीमत पर नहीं.

ये दौरा शुरू होने से पहले ही, दक्षिण अफ़्रीकी टीम उनके देश में हमारे अभी तक के दयनीय प्रदर्शन को देखते हुए हमारे नंबर वन बनने का मखौल उड़ा रही थी.

इयन चैपल ने एक बार कहा था कि भारत और ऑस्ट्रेलिया में फ़र्क ये है कि अगर वॉ एक सैकड़ा लगाएँ और ऑस्ट्रेलिया हार जाए, तो शतक को कोई भी नहीं पूछेगा. मगर भारत में तेंदुलकर शतक जड़ें, और भारत हार जाए, तो कोई हार को नहीं पूछता.

ये तब की बात है जब ऑस्ट्रेलियाई टीम अजेय हुआ करती थी.

आज दुनिया बदल गई है और हम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम कहलाने में गर्व का अनुभव करते हैं.

अब जबकि हम डरबन टेस्ट में उतरेंगे, हम उम्मीद करते हैं हमारे बल्लेबाज़ों ने तेंदुलकर के जुझारूपन से प्रेरणा ली होगी और हमारे तेज़ गेंदबाज़ वैसी मरी हुई गेंदबाज़़ी नहीं करेंगे जैसा कि उन्होंने सेंचुरियन में किया.

Story first published: Friday, December 24, 2010, 22:00 [IST]
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