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क्रिकेट के क़रीब ही रहेंगे गांगुली

सौरभ अकेले ऐसे शख़्स हैं जिन्होंने फ़ुटबाल का मक्का कहे जाने वाले कोलकाता ही नहीं, पूरे पश्चिम बंगाल में क्रिकेट के प्रति जुनून पैदा किया.

उन्होंने संन्यास भले ले लिया हो, उनके प्रति लोगों की दीवानगी में कोई कमी नहीं आई है.

अपना अंतिम प्रथम श्रेणी मैच खेल कर लौटने के बाद अगले तीन दिनों तक वे विभिन्न शहरों में कई समारोहों में शिरकत करते रहे.

पश्चिम बंगाल के महानायकों में शुमार सौरभ कहते हैं कि "क्रिकेट से अभी पूरी तरह संन्यास कहाँ लिया है. अभी तो दो साल तक इंडियन प्रीमियर लीग के मैचों में कोलकाता नाइट राइडर्स की ओर से बल्ला थाम कर मैदान पर उतरना ही होगा. इसके अलावा किसी न किसी तरह इस खेल से जुड़ा ही रहूँगा."

हर क्रिकेटर को एक न एक दिन संन्यास लेना ही पड़ता है, ताकि नए प्रतिभावान खिलाड़ियों को मौक़ा मिले सौरभ गांगुली

हर क्रिकेटर को एक न एक दिन संन्यास लेना ही पड़ता है, ताकि नए प्रतिभावान खिलाड़ियों को मौक़ा मिले

अपने अंतिम मैच में गोवा के ख़िलाफ़ बंगाल की जीत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. इसी वजह से बंगाल एलीट ग्रुप में पहुँच सका. वे कहते हैं कि अब शरीर भी साथ नहीं दे रहा था और एकाग्रता भी पहले जैसी नहीं रही थी.

संन्यास से दुख नहीं

सौरभ मानते हैं कि अभी उनमें एक साल का क्रिकेट बाक़ी था. लेकिन दिमाग़ ने कह दिया कि अब जाने का समय हो गया है. इसलिए काफ़ी सोच-समझ कर ही संन्यास का फ़ैसला किया.

वे दलील देते हैं, "गावसकर, लारा और ग्रेग चैपल ने भी जब संन्यास लिया था तब वे लोग कम से कम एक साल और खेल सकते थे. लेकिन मैंने सोचा कि अब बहुत हो गया. जाने का समय आ गया है."

सौरभ कहते हैं, "इस खेल ने मुझे पैसा और नाम तो दिया ही है, मुश्किल परिस्थितियों से जूझने का हौसला भी दिया है. क्रिकेट ने जितना दिया है, अब उसे ही लौटाना चाहता हूं. गांगुली कहते हैं कि हर क्रिकेटर को एक न एक दिन संन्यास लेना ही पड़ता है, ताकि नए प्रतिभावान खिलाड़ियों को मौक़e मिले. इसलिए संन्यास के फ़ैसले से मुझे कोई दुख नहीं हुआ."

सौरभ का आईपीएल में कोलकाता नाईट राईडर्स के साथ अनुबंध है

कुछ दिनों तक आराम करने के बाद वे ईडेन गार्डेन में दोबारा अभ्यास शुरू करेंगे ताकि आईपीएल मैचों के पहले मैच फ़िटनेस बनी रहे.

सौरभ भावी योजनाओं की पूरी जानकारी तो नहीं देते, लेकिन अख़बारों में नियमित तौर पर कॉलम लिखना तो उन्होंने शुरू ही कर दिया है. विभिन्न चैनलों की ओर से कमेंटेटर बनने के भी कुछ प्रस्ताव हैं. वे कहते हैं कि अभी इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया है.

गांगुली कहते हैं कि क्रिकेट के बाद भी तो ज़िंदगी होती है. वे अब ज़िंदगी की नयी पारी शुरू करेंगे. उन्होंने इतना ज़रूर कहा कि क्रिकेट से जुड़ा ही रहूँगा.

वैसे, भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड ने उनको तकनीकी समिति का सदस्य भी मनोनीत कर दिया है. सौरभ अब कोलकाता स्थित अपने रेस्तरां और क्रिकेट अकादमी को कुछ ज़्यादा समय देंगे.

मैंने वही किया जो टीम के हित में था. भारतीय टीम का कप्तान बनने के लिए चमड़ी कुछ मोटी होनी चाहिए सौरभ गांगुली

मैंने वही किया जो टीम के हित में था. भारतीय टीम का कप्तान बनने के लिए चमड़ी कुछ मोटी होनी चाहिए

अपनी कप्तानी के दिनों में हुए विवादों पर वे चर्चा नहीं करना चाहते.

लेकिन कहते हैं, "मैंने हमेशा वही किया जो एक कप्तान का फ़र्ज़ है. मैं हर खिलाड़ी के मुश्किल वक़्त में उसके साथ खड़ा रहा. वह चाहे 2001 के दक्षिण अफ्रीका दौरे के लिए वीरेंदर सहवाग के चयन का मामला हो या फिर हरभजन सिंह को मौक़ा देने का."

वे मानते हैं कि टीम में अनिल कुंबले और हरभजन के होने की वजह से कई बार चाह कर भी मुरली कार्तिक को टीम में नहीं ले सके.

इसी तरह एक बार उन्होंने राहुल द्रविड़ के लिए भी चयनकर्ताओं से दो-दो हाथ कर लिया. सौरभ कहते हैं कि उन्होंने वही किया जो टीम के हित में था.

गांगुली का मानना है कि भारतीय टीम का कप्तान बनने के लिए चमड़ी कुछ मोटी होनी चाहिए. आलोचनाओं पर ध्यान देने की बजाय टीम के हितों को प्राथमिकता देना ज़रूरी है.

अपने करियर की सबसे यादगार पारी के बारे में सवाल करते ही वे बेझिझक कहते हैं कि 1996 में लार्ड्स में लगाया गया पहला शतक. वे पूछते हैं, "अगर उस मैच में मैंने रन नहीं बनाए होते तो क्या आप इस समय मुझसे बात कर रहे होते?"

सौरभ का यह सवाल जायज़ है. उस पारी और उस दौरे ने ही सौरभ को भारतीय क्रिकेट का सफ़लतम कप्तान बनने की राह पर आगे बढ़ाया था.

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:19 [IST]
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