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दीवानगी थी 'पर्फ़ेक्शन' के लिए संजय मांजरेकर में

By Bbc Hindi

90 के दशक में भारतीय क्रिकेट टीम की टीम मीटिंग मैनेजर के होटल के कमरे में हुआ करती थी. दिलचस्प बात ये थी कि सीनियर खिलाड़ी कुर्सियों और सोफ़े पर बैठते थे और जूनियर खिलाड़ी ज़मीन पर पसर जाते थे.

हालांकि भारतीय खिलाड़ी मैदान पर आपस में हिंदी, पंजाबी या मराठी में बात किया करते थे, लेकिन पता नहीं किन कारणों से टीम मीटिंग में हमेशा बातचीत अंग्रेज़ी में की जाती थी.

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संजय मांजरेकर बताते हैं, 'कप्तान अज़हरुद्दीन के बोलने के ढंग पर हंसी आती थी. अक्सर वो बुदबुदा रहे होते थे और हमें उन्हें समझने के लिए उनके होठों के 'मूवमेंट' को पढ़ना होता था. उनके मुंह से आवाज़ ऐसी निकलती थी. जैसी एक पुराने शॉर्ट वेव ट्रांज़िस्टर की आवाज़. रेडियो के 'साउंड वेव्स' की तरह उनकी आवाज़ कभी ऊंची हो जाती थी तो कभी बहुत नीची.'

वो कहते हैं, 'एक चीज़ मैंने और नोट की सीनियर खिलाड़ियों को ज़रूरत से ज़्यादा सम्मान दिया जाता था. जब भी वो कमरे में घुसते थे, जूनियर खिलाड़ी एकदम से खड़े हो जाते थे. सीनियर खिलाड़ियों की धाक इतनी थी कि कपिलदेव जैसा खिलाड़ी भी नेट पर गेंदबाज़ी करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझता था.'

संजय मांजरेकर की नज़र में वैसे तो अज़हर निजी ज़िदगी में बहुत दरियादिल इंसान थे, लेकिन आदर्श कप्तान कभी नहीं थे.

संजय बताते हैं, 'जब विपक्षी बल्लेबाज़ जम जाता था तो अज़हर अक्सर 'ड्रिंक्स इंटरवेल' में हम सब खिलाड़ियों को जमा कर पूछते थे कि इसे कैसे आउट किया जाए? हर कोई अपनी सलाह देता था और इसके आधार पर अज़हर तय करते थे कि मैं इस छोर से राजू से तीन ओवर गेंद कराउंगा, दूसरे छोर से मन्नू गेंद करेगा. इसके बाद कपिल पाजी और श्रीनाथ आ जाएंगे. इसके बाद अज़हर अपनी फ़ील्डिंग पोज़ीशन पर चले जाते थे, ये सोचते हुए कि अब अगले 75 मिनट तक उन्हें कुछ भी नहीं करना है.'

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द्रविड़ और गांगुली की वजह से लिया संन्यास

80 और 90 के दशक में भारतीय क्रिकेट में दो महान खिलाड़ियों सचिन तेंदुल्कर और अनिल कुंबले का उदय हुआ था. लेकिन ये एक ऐसा समय भी था जब कई प्रतिभाशाली क्रिकेटर उन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाए, जिनकी एक समय उनसे उम्मीद की जा रही थी. उनमें से एक थे संजय मांजरेकर.

1996 में जब अचानक उन्होंने क्रिकेट से संन्यास लिया तो क्रिकेट पंडितों ने एक स्वर में कहा कि उनमें कम से कम तीन साल की क्रिकेट और बची थी.

संजय मांजरेकर के करियर को नज़दीक से देखने वाले गौतम चिंतामणि बताते हैं, 'जब भी आप किसी खिलाड़ी की बात करते हैं तो उसकी प्रतिभा और क्षमताओं का ज़िक्र तो होता ही है, लेकिन 'टीम गेम' में बाकी की 'बेंच स्ट्रेंथ' का भी खिलाड़ी के करियर पर असर पड़ता है. 1996 के बाद भारतीय टीम में जिस तरह एक साथ राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली का पदार्पण हुआ था, जिसकी वजह से संजय मांजरेकर के लिए टीम में 'कम बैक' करना मुश्किल हो गया था. चयनकर्ताओं की भी ग़लती थी कि उन्होंने संजय मांजरेकर को अच्छे से 'मैनेज' नहीं किया और उन्हें समय से पहले संन्यास लेना पड़ा.'

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पिता विजय मांजरेकर से ख़ौफ़ खाते थे संजय

संजय मांजरेकर भारत के महान बल्लेबाज़ों में से एक विजय मांजरेकर के पुत्र हैं. एक बार किसी ने टाइगर पटौदी से पूछा कि आपकी नज़र में भारत का अब तक का सबसे तकनीकी रूप से सक्षम बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर हैं या सचिन तेंदुलकर? सवाल पूरा होने से पहले ही टाइगर ने जवाब दिया था विजय मांजरेकर.

लेकिन आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इन्हीं विजय मांजरेकर का बेटा संजय मांजरेकर उनसे थर्राया करता था.

एक बार उन्होंने संजय से कहा था कि वो उनकी नेट प्रैक्टिस देखने मैदान पर आएंगे. संजय डर के मारे उस दिन नेट प्रैक्टिस पर ही नहीं गए.

संजय मांजरेकर बताते हैं, 'मेरे अपने पिता के साथ किसी तरह के संबंध नहीं थे. मैं उनसे इतना डरा करता था कि जब वो घर से बाहर चले जाते थे, जब मैं बिस्तर से उठता था. उनके 'मूड स्विंग्स' होते थे और मेरी माँ, मुझे और मेरी दो बहनों को अक्सर उनका शिकार बनना पड़ता था.'

संजय बताते हैं, 'वो बहुत मुंहफट थे. एक बार जब उन्होंने क्रिकेट कोचिंग में अपना हाथ आज़माने की कोशिश की तो भारत के ओपनर चेतन चौहान ने उनसे पूछा था, 'आप की नज़र में मेरी बैटिंग में क्या क्या नुख़्स हैं?' मांजरेकर का जवाब था, 'तुम्हारी बैटिंग में कोई नुख्स नहीं है. नुख़्स उन चयनकर्ताओं में है, जिन्होंने तुम्हें टीम में लिया.'

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छाता ले कर महान खिलाड़ियों का स्वागत

लेकिन विजय मांजरेकर को मशहूर क्रिकेट खिलाड़ियों को अपने घर खाने पर बुलाने का शौक था. सुनील गावस्कर, भागवत चंद्रशेखर, गुंडप्पा विश्वनाथ, इरापल्ली प्रसन्ना और यहाँ तक कि रोहन कन्हाई भी उनके दादर वाले घर में अक्सर खाने पर आमंत्रित किए जाते थे.

संजय मांजरेकर बताते हैं, 'उस समय मैं 11 साल का भी नहीं था. मेरे पिता मुझे छाता ले तक इन खिलाड़ियों को 'रिसीव' करने सड़क पर भेजते थे, ताकि इन खिलाड़ियों को सड़क पर चलने वाले लोग पहचान नहीं सके. लेकिन होता इसका उल्टा था, क्योंकि मेरा क़द इतना छोटा होता था कि मैं छाते से भी इन महान खिलाड़ियों को 'कवर' नहीं कर पाता था और उन को छिपाने के बजाए मेरी ये हरकत लोगों का और ध्यान आकर्षित करती थी.'

विवियन रिचर्ड्स की दरियादिली

अपने पहले ही टेस्ट में बाउंसर से घायल होने के बावजूद मांजरेकर ने उसी वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ उन्हें की ज़मीन पर शतक लगाया था.

संजय मांजरेकर याद करते हैं, 'वो टेस्ट हम हार गए थे. लेकिन जब हम होटल जाने के लिए अपनी बस की तरफ़ बढ़ रहे थे तो पार्किंग में खुद विवियन रिचर्ड्स खड़े थे. उन्होंने मुझे एक तरफ़ बुलाया और कहा, 'वेल प्लेड मैन. कीप इट अप.'

संजय याद करते हैं, 'ये वही रिचर्ड्स थे जो अपनी प्रतिद्वंदात्मक ठसक बनाने के लिए विपक्षी टीम के खिलाड़ियों से दूर दूर रहा करते थे और कभी कभी रूखा व्यवहार भी करते थे.'

लेकिन 1992 के ऑस्ट्रेलिया दौरे में संजय का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा और 1996 आते आते वो भारतीय टीम में अपना स्थान खो बैठे.

गौतम चिंतामणि बताते हैं, 'संजय मांजरेकर 'टेकनीक' पर इतना ध्यान देते थे कि कहीं न कहीं क्रिकेट के प्रति उनका 'नैचुरल इन्सटिंक्ट' मार खा गया. मेरे हिसाब से तो वो द्रविड़ से पहले के द्रविड़ हैं. तकनीक पर उनका इतना ध्यान रहा कि उनके लिए बाकी सभी चीज़ें गौण हो गईं. कम लोगों को पता है कि संजय ने चार शतक लगाए जिसमें से एक दोहरा शतक है और ये सभी शतक उन्होंने भारत से बाहर लगाए हैं, जो अपनेआप में बहुत बड़ी बात है.'

संजय मांजरेकर खुद कहते हैं, 'अगर मैं बग़ैर ग़लती किए खेल रहा हूँ तो मेरे लिए ये मायने नहीं रखता था कि एक घंटे के खेल के बाद मेरा 'स्कोर' क्या है. तकनीक पर मेरा इतना ज़ोर था कि कभी कभी मैं भूल जाता था कि 'क्रीज़' पर रहने का मेरा असल उद्देश्य क्या है? अगर मैंने दोहरा शतक भी मारा है तो उस पर खुश होने के बजाए मैं उन 'शार्ट्स' के बारे में सोचता था जो मैंने उस पारी के दौरान सही नहीं खेले थे.'

इमरान ख़ान के मुरीद

संजय मांजरेकर के सबसे बड़े हीरो इमरान ख़ान हैं. उनकी हर अदा उनको पसंद थी- यहाँ तक कि उनकी गालियाँ भी.

एक बार जब एलन लैंब ने वकार युनुस को 'मिड ऑन' के पार मारा, जहाँ इमरान ख़ान फील्डिंग कर रहे थे. इमरान को गेंद के पीछे भागना पसंद नहीं था. उन्होंने किसी तरह बाउंड्री से कुछ इंच पहले वो गेंद रोकी और फिर वकार के पास आ कर बोले, 'विकी ये कौन सी गेंद तुमने कर दी? वकार का जवाब था, मैं इन स्विंगर डालने की कोशिश कर रहा था. इमरान ने चिल्ला कर वकार से कहा था, 'अगली बार ऐसा करने से पहले मुझसे पूछ लेना.'

संजय मांजरेकर बताते हैं, 'मैं उनको 10 में से 10 अंक देता हूँ. एक तो वो देखने में बहुत अच्छे थे. 'ऑक्सफर्ड' में पढ़ने के बावजूद वो अपने साथियों को चुनिंदा पाकिस्तानी और अंग्रेज़ी गालियों से लताड़ते थे. जब हमारी टीम पाकिस्तान गई तो उन्होंने पहल कर इंग्लैंड से तटस्थ अंपायर बुलवाए ताकि पाकिस्तान की जीत पर कोई सवाल न उठा सके. जब उनकी टीम 'स्ट्रगल' करती थी तो खुद सामने आ जाते थे और अपनी टीम के कमज़ोर खिलाड़ियों को हमेशा प्रोटेक्ट करते थे.'

सरेआम रोए थे विनोद कांबली ईडेन गार्डेन में

संजय माजरेकर ने अपनी किताब में 1996 के विश्व कप के सेमी फ़ाइनल में 'ईडेन गार्डेन' में श्रीलंका के हाथों हुई हार का बहुत मार्मिक चित्रण खींचा है.

संजय बताते हैं, 'टीम में अकेले नवजोत सिंद सिद्धू थे जिन्होंने सलाह दी थी कि भारत को पहले 'बैंटिंग' करनी चाहिए. लेकिन अज़हरुद्दीन ने उनकी बात नहीं मानी. हम में कुछ ज़्यादा ही आत्मविश्वास था, क्योंकि हम पहले पाकिस्तान को हरा चुके थे. जब तक मैं और तेंदुलकर क्रीज़ पर थे, विकेट अच्छी खेल रही थी. लेकिन फिर विकेट इतनी ख़राब हो गई कि पिच पर सिर्फ़ खड़े रहना ही बहुत बड़ा काम हो गया.'

वो आगे कहते हैं, 'हार के बाद 'डेसी' (जो कि विनोद कांबली का दूसरा नाम है), बीच मैदान में ही रोने लगे. बाद में जब वो ड्रेसिंग रूम में घुसे तो अजय जडेजा सार्वजनिक रूप से अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए विनोद को बहुत लताड़ा.'

प्रभाकर के पास था ज़बरदस्त क्रिकेटिंग दिमाग़

संजय मांजरेकर टीम इंडिया के अपने साथी मनोज प्रभाकर की 'क्रिकेटिंग' सोच के भी कायल हैं. मनोज जब भी भारत की पारी की शुरुआत करते थे तो जानबूझ कर डेवेन माल्कम और ब्रायन मैकमिलन को 'बाउंसर' फ़ेकने की चुनौती देते थे. इसका मतलब ये था कि वो 'बोल्ड' या 'एलबीडब्लू' नहीं हो सकते थे.

संजय मांजरेकर कहते हैं, 'आगे जा कर मनोज प्रभाकर ने गलतियां भी कीं, लेकिन उनमें ख़ूबियाँ भी बहुत थी. उनके जैसा 'फ़ाइटर' मैंने देखा नहीं. वो उन गिनेचुने लोगों में थे जो अपनी टीम की बॉलिंग और बैंटिंग दोनों की शुरुआत करते थे. 'रिवर्स स्विंग' का गुर भारतीय टीम में सबसे पहले मनोज प्रभाकर ने ही सीखा था और उन्होंने ही कपिल को ये कला सिखाई थी. मनोज ने कपिल को इस बात के लिए कभी नहीं माफ़ किया कि 1986 के इंग्लैंड दौरे के दौरान जब चेतन शर्मा घायल हो गए तो मनोज प्रभाकर के टीम में रहने के बावजूद उन्होंने मदन लाल को टीम में शामिल होने के लिए भारत से बुलवाया था.'

तेज़ गेंदबाज़ी से बचने के लिए पहले बल्लेबाज़ी

जिस ज़माने में संजय मांजरेकर क्रिकेट खेला करते थे, भारतीय टीम में वरिष्ठ खिलाड़ियों की भीड़ हुआ करती थी. एक समय में तो छह पूर्व कप्तान भारतीय टीम में शामिल थे. नतीजा ये होता था कि कई बार भारतीय टीम सिर्फ़ इसलिए पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला करती थी, क्योंकि वरिष्ठ खिलाड़ी पहले नई गेंद खेलने के लिए तैयार नहीं होते थे.

संजय मांजरेकर बताते हैं, 'गावस्कर, रवि शास्त्री और संदीप पाटिल मुझे अक्सर उन बल्लेबाज़ों के किस्से सुनाते थे जो वेस्टइंडीज़ के दौरे से पहले जानबूझ कर अपनेआप को घायल घोषित कर देते थे. दिलीप सरदेसाई इन लोगों के लिए एक शब्द का प्रयोग करते थे- 'फट्टू' यानी डरपोक.'

मांजरेकर कहते हैं, 'जब मैं बंबई की टीम में खेलने के लिए पहली बार चुना गया तो संदीप पाटिल ने मुझसे पूछा कि तुम किस नंबर पर खेलना पसंद करोगे. मैंने नम्रता से जवाब दिया 'जहाँ आप चाहें.' संदीप पाटिल ने मुझे तुरंत टोका, अगर भारतीय टीम में यहीं सवाल तुमसे पूछा जाए और अगर इसका यही जवाब तुमने दिया तो तुम कहीं के न रहोगे. बाद में मैंने पाया कि संदीप पाटिल की सलाह सही थी.'

मांजरेकर ने आगे कहा, 'वरिष्ठ खिलाड़ियों को 'होसटाइल' तेज़ गेंदबाज़ी से बचाने के लिए कई बल्लेबाज़ों के क्रम में परिवर्तन किए गए. इसकी वजह से कई खिलाड़ियों के करियर बरबाद हुए. कभी कभी टीम की ज़रूरत के लिए खिलाड़ियों के रोल में परिवर्तन किया जाता था, जैसे द्रविड़ से कई सालों तक विकेटकीपिंग कराई गई. रवि शास्त्री को भी बार बार अलग अलग रोल दिए गए. लेकिन उनके पास कौशल के साथ साथ बहुत अच्छा 'क्रिकेटिंग' दिमाग भी था. इसलिए वो तो खप गए. लेकिन बहुत से भारतीय खिलाड़ियों का करियर इस वजह से बर्बाद हो गया.'

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Story first published: Saturday, February 17, 2018, 12:35 [IST]
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