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आईपीएल से सीख हासिल करने का समय

सुनील गावस्कर

पूर्व क्रिकेटर

अब जबकि डीएलएफ़ इंडियन प्रीमियर लीग अपने अंतिम सप्ताह में आ चुका है कुछ आंकड़े काफ़ी चौंकाने वाले हैं.

इसे लिखते समय इस आईपीएल मुक़ाबलों के शीर्ष पांच हिटर बल्लेबाज़ों में सारे के सारे भारतीय हैं और सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले पहले तीन खिलाड़ी स्पिनर हैं.

कुछ टीमों को लगा कि उनसे ग़लती हो गई है, हालांकि भारतीय पिच तेज़ गेंदबाज़ों की पसंद की नहीं थी लेकिन उन्होंने अपने विरोधी खिलाड़ियों ख़ास तौर से कुछ भारतीय स्टार बल्लेबाज़ों को आसानी से खेलने नहीं दिया.

चलिए हम पहले अंतिम की बात करते हैं. फ़र्स्ट क्लास मैचों में भारतीय पिचों को हमेशा मेज़बान टीम के लिहाज़ से तैयार किया जाता रहा है ताकि उन्हें उसका लाभ मिल सके. जिसका अर्थ आम तौर पर ये रहा कि पिच सपाट बनाई जाती हैं जिस पर गेंद ज़्यादा उछाल न ले सके और मुश्किल से ही घूम सके.

ऐसे में बल्लेबाज़ों को सिर्फ़ इतना करना रह जाए कि वे अपने फ्रंट फ़ुट यानी आगे के पांव को बाहर निकालें और गेंद की लाइन में आकर बल्ले के बीच के हिस्से से गेंद को ड्राइव करें और तेज़ और सूखी आउटफ़ील्ड पर गेंद तेज़ी से सीमा रेखा के पार चली जाए.

साथ ही पिच को जानबूझ कर सूखा रखा जाता और उस पर पानी नहीं डाला जाता ताकि वह कुछ ओवर की गेंदबाज़ी के बाद टूटने लगे और फिर स्पिनरों को गेंदबाज़ी पर लगा दिया जाए.

उन्हें ज़्यादा कोशिश नहीं करनी पड़ती, बल्लेबाज़ों के आउट करने के लिए उन्हें ललचाने के लिए गेंद को फ़्लाइट देने की कोई ज़्यादा कोशिश नहीं करनी पड़ती, बस गेंद डालनी होती और वह गिर कर बाहर की तरफ निकलती और बल्लेबाज़ आउट होते जाते.

पिच ही उनके लिए सारे काम करती और उन्हें बल्लेबाज़ों को छकाने के लिए गेंद को हवा में टॉस करके लूप हासिल करने का अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता.

उन्हें बस इतनी ही कोशिश करनी होती कि वे गेंद को सही जगह पर गिराएं और वे गेंद में फ़्लाइट इसलिए नहीं देते कि आज के वज़नी बैट से खेलने वाला कोई भी बल्लेबाज़ ग़लती से उसे स्टैंड में छक्के के लिए न रवाना कर दे.

कोई गेंदबाज़ आख़िर गेंद को फ़्लाइट देकर अपना एकॉनोमी रेट क्यों बरबाद करना चाहेगा और बल्लेबाज़ को क्रीज़ से बाहर निकल कर मारने का अधिक मौक़ा क्यों देना चाहेगा.

जब पिच के एक तरफ़ा होने और सिर्फ़ बल्लेबाज़ों या स्पिनरों की सहायता करने वाली होने पर शोर मचाया जाता है तो कुछ लोगों के दिमाग़ में स्पोर्टिंग पिच का विचार आता है.

सामान्य रूप से भारत में स्पोर्टिंग पिच का मतलब है जहां ज़्यादा घास छोड़ दी गई हो और गेंद किसी भी दिशा में फिसल कर निकल जाए.

इस प्रकार की पिच पर होने वाले ज़्यादातर मैच दो ही दिनों में ख़त्म हो जाते हैं. पहले जहां सपाट पिचों पर बल्लेबाज़ रनों की लूट मचा दिया करते थे इस प्रकार की पिचों पर उनके अहंकार को कुछ ठेस लगती है.

जो टीमें इस प्रकार की पिचों, चाहे वह घास वाली हों या टूटने वाली हों, को मेज़बान टीम के हक़ में जायज़ क़रार देते हैं उस वक़्त वो ये भूल जाते हैं कि बल्ले और गेंद में बराबर का मुक़ाबला होना चाहिए.

चूंकि घास वाली पिचें कभी कभी ही बनाई जाती हैं इसलिए उस पर ज़्यादा शोर नहीं मचाया जाता. सच्चाई तो यह है कि हमारे यहां ऐसे लोग ज़्यादा नहीं हैं जिन्हें ये मालूम हो कि पिच कैसे बनाई जाती है ताकि इसमें खेल के हर विभाग के लिए कुछ न कुछ हो.

पिछले कुछ महीनों में साबित हुआ है कि देश में हैदराबाद, नागपुर और बंगलौर की पिचें बेहतर हैं जहां सीम गेंदबाज़ भी अपना हुनर दिखा सकता है.

तेज़ गेंदबाज़ों के लिए भी इसमें इनाम है अगर वह थोड़ी ज़्यादा कोशिश करें और गेंद में उछाल पैदा करें तो.

आईपीएल टूर्नामेंट जो इन पिचों पर खेला जा रहा है अगर वह कुछ कहता है तो यही कि अगर युवा भारतीय स्टार को टेस्ट स्तर पर सफल होना है तो उन्हें अपनी तकनीक को सुधारना होगा क्योंकि जब भी उन्हें शॉर्ट गेंदों का सामना हुआ है तो वे असहाय नज़र आए हैं.

जितने बल्लेबाज़ शॉर्ट गेंदों को हुक करने या उन्हें रोकने में आउट हुए हैं उनकी संख्या काफ़ी है और यह उनके भविष्य के लिए अच्छा नहीं है.

ऐसे सारे खिलाड़ी की बेजान पिचों पर तैयार हुए हैं जहां गेंद मुश्किल से ही कभी कमर की ऊंचाई से ऊपर उठती है और वे फ़्रंट फ़ुट के खिलाड़ी बन जाते हैं और बैकफ़ुट पर उनकी खेलने की तकनीक कहीं गुम होती जाती है. वे बैकफ़ुट पर उसी वक़्त जाते हैं जब उन्हें स्क्वायर कट करना होता है.

डेल स्टेन, शॉन टेट यहां तक कि ज़हीर ख़ान ने भी शॉर्ट पिच गेंदों को खेलने की उनकी तकनीक की क़लई खोल कर रख दी है.

आम तौर पर ये बल्लेबाज़ फ़्रंटफ़ुट पर खेलने के लिए पहले से ही इस क़दर बाध्य होते हैं कि इस प्रकार की शॉर्ट गेंद आ जाने पर उनका बैक़फ़ुट पर आना तो दूर की बात वे पिछले क़दमों पर अपना बोझ भी शिफ़्ट नहीं कर सकते.

उनकी परेशानी स्पष्ट है हालांकि वे रन बनाने में सफल हो जाते हैं लेकिन इसका कारण एक ओवर में शॉर्ट गेंद फेंकने की संख्या सीमित है और दूसरी बात ये भी है कि गर्म मौसम गेंदबाज़ों को ज़्यादा शॉर्ट गेंदें फेंकने में हतोत्साहित करता है.

फिर भी बल्लेबाज़ों का शॉर्ट गेंदों को न खेल पाना आने वाले मुक़ाबलों और अंतरराष्ट्रीय मैचों में नज़र में रहेगा.

आईपीएल ने यह भी दिखा दिया है कि आशा के विपरीत स्पिनरों ने ज़्यादा विकेट हासिल किए हैं और वे रन देने के मामले में भी काफ़ी किफ़ायती रहे हैं. गेंद जितनी आहिस्ता बल्ले पर आती है बल्लेबाज़ों को उसमें गति पैदा करने के लिए उतना ही ज़ोर लगाना पड़ता है.

इसलिए देखा गया है कि स्पिनरों की गेंद पर उन्हें छक्का मारने के लिए ज़्यादा ताक़त लगानी पड़ती है और इस क्रम में वह बल्लेबाज़ की टाइमिंग भी ग़लत हो सकती है.

पिच के सूखे होने से स्पिनरों की पकड़ भी गेंद पर काफ़ी अच्छी होती है और वह गेंद को ज़्यादा घुमाने में भी सफल रहते हैं, और लॉंग बॉल को मारने के बल्लेबाज़ का प्रयास भी विफल होता है.

जब तक यह प्रकाशित होगा आईपीएल के सेमीफ़ाइनल में पहुंचने वाली सारी टीमें तय हो चुकी होंगी और जो इस मुक़ाबलों से बाहर निकल गए हैं, उन्हें यह विचार करने का मौक़ा मिल जाएगा कि ग़लती कहाँ थी.

एक ही सांत्वना है कि इस प्रकार के फ़ॉरमैट में किताबी फ़ॉर्म की कम अहमियत है और जो अपने आपको इस तीन घंटे में जोड़ लेता है वही उस दिन जीत हासिल करता है.

(प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट ग्रुप के सौजन्य से)

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:34 [IST]
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