जब कैरेबियाई धरती पर टूटा सब्र, गावस्कर ने कहा- मैं यहां नहीं मरना चाहता, मुझे बेटे को देखना है

नई दिल्लीः भारतीय क्रिकेट के कप्तान विराट कोहली और अनुष्का शर्मा का प्रेम क्रिकेट की गलियों में भी रूमानी कहानी की तरह गूंजता है। अगर क्रिकेट में ग्लैमर का इतना घालमेल ना होता और सोशल मीडिया पर पॉवर कपल की अवधारणा ने जन्म ना लिया होता तो यह जोड़ी भी इस समय आराम से अपना व्यक्तिगत जीवन जी रही होती। लेकिन इस समय यह दंपति अजीब कारणों से क्रिकेट में चर्चा में है और एक बार फिर मुखर भारतीय कप्तान इसके पीछे जाने-अनजाने में वजह बने हैं।

कप्तान कोहली के जाने पर चर्चा अभी चलती रहेगी-

कप्तान कोहली के जाने पर चर्चा अभी चलती रहेगी-

कोहली ने एक कप्तान और वरिष्ठ खिलाड़ी होने के कर्तव्य को तुरंत ताक पर रखकर एक पति और पिता होने को बहुत ज्यादा तवज्जों दी जिसका समर्थन बीसीसीआई ने भी किया है और उनको पहले बेटे के आगमन के लिए पत्नी के पास होने के लिए जो छुट्टी दी गई है उसकी कीमत ऑस्ट्रेलियाई जमीन पर खेले जाने वाले तीन टेस्ट मैच हैं।

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जाहिर है यह किसी भी खेल हस्ती के लिए परिवार के नाम पर कर्तव्य से चूकने के चरम उदाहरण में से एक है लेकिन यहां कोहली की परेशानी और पेशोपश दोनों समझी जा सकती है। अगर क्वारेंटाइन टाइम और कोरोनाकाल ना होता तो कोहली को केवल एक ही टेस्ट का त्याग करना होता और वे रोहित शर्मा की तरह तुरंत घर आते और फिर वापस ऑस्ट्रेलिया लेकिन अब ऐसा संभव नहीं है कि एक बार भारत गए और अगले मैच में आ गए।

कोहली की चॉइस का सम्मान करने के अलावा विकल्प ही क्या है-

कोहली की चॉइस का सम्मान करने के अलावा विकल्प ही क्या है-

हां, इतना जरूर है ऑस्ट्रेलिया दौरा किसी भी मायने में किसी बच्चे के जन्म से कम महत्वपूर्ण नहीं है और यह किसी भी भारतीय क्रिकेटर के लिए करियर परिभाषित क्षण पैदा कर सकता है। कोहली ने वर्ल्ड कप नहीं जीता है लेकिन उनको जीवन भर 2018-19 के ऑस्ट्रेलिया दौरे के विजेता कप्तान के तौर पर याद किया जाएगा। ये बात खुद कोहली भी जानते हैं। हम इस समय केवल कोहली के फैसले का सम्मान कर सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा आह भर सकते हैं कि कप्तान चाहते तो अधिक उच्च चॉइस चुन सकते थे और अपने बच्चे की जगह पूरे देश के लिए खेल सकते थे। कंगारू जमीं पर जीतने के मौके विश्व कप से भी दुर्लभ होते हैं और इसी बात को इसी से समझा जा सकता है कि भारत ने तीन बार विश्व कप (दो बार वनडे और एक बार टी20) जीता है लेकिन केवल एक ही ऑस्ट्रेलिया को उसकी धरती पर टेस्ट में मात दी है। ये पूरे भारत का सिर फख्र से ऊंचा करने वाला क्षण होता है।

1976 में गावस्कर के साथ हुआ था एक ऐसा ही वाकया-

1976 में गावस्कर के साथ हुआ था एक ऐसा ही वाकया-

इसी बीच महानतम भारतीय ऑलराउंडर कपिल देव ने पुराना किस्सा याद करते हुए बताया है कैसे 1976 में गावस्कर तब अपने बेटे से नहीं मिल पाए थे जब वे टीम इंडिया के साथ कैरेबियाई दौरे पर थे। उस समय रोहण गावस्कर का जन्म हुआ था।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गावस्कर परेशान नहीं हुए थे। भारतीय टीम के कोच रहे पूर्व क्रिकेटर अंशुमन गायकवाड़ ने सुनील गावस्कर के इस किस्से के बारे में बताया है कि किस तरह नवजात रोहण से नहीं मिल पाने के कारण वह परेशान हो रहे थे।

'मुझे बेटे को देखना है, यहां नहीं मरना चाहता मैं'

'मुझे बेटे को देखना है, यहां नहीं मरना चाहता मैं'

गायकवाड़ के अनुसार अगली सीरीज के लिए दो सप्ताह का गैप था जिसका उपयोग गावस्कर भारत आने के लिए करना चाहते थे लेकिन बीसीसीआई ने छूट नहीं दी। गावस्कर को ढाई महीने लग गए थे अपने बेटे को देखने में और इसका गुस्सा व डिप्रेशन उनके व्यक्तित्व पर हावी रहा था।

डेली गार्डियन में लिखे कॉलम में गायकवाड़ ने बताया है- कैरेबियाई गेंदबाजों की बीमर और बाउंसर्स से पहले ही पांच भारतीय अस्पताल की मरहम पट्टी करवा आए थे लेकिन तूफानी गेंदबाजों की बाउंसर्स कम नहीं हो रही थी। गावस्कर इस पर अंपायर से भी शिकायत करते लेकिन कोई मदद नहीं मिली। ऐसे में उनका गुस्सा और बढ़ गया, मैंने उनसे शांत रहने की अपील की लेकिन सच तो ये है मैंने पहली बार गावस्कर को गुस्से में देखा था।

गायकवाड़ ने आगे कहा- "मुझे गुस्से में गावस्कर ने कहा, मुझे अपने बेटे को देखना है, घर जाना है, मैं भारत जाना चाहता हूं और यहां मरना नहीं चाहता।"

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Story first published: Sunday, November 22, 2020, 15:10 [IST]
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