'कपिल की पारी ने टॉनिक का काम किया था'
वो तस्वीर ज़हन में घूमती है कि लॉर्डस मैदान पर हज़ारों लोग हैं, भारतीय झंडे पकड़े हुए हैं, पूरी टीम बालकनी में है और शैम्पेन खोली हुई है, जश्न चल रहा है.
1983 में टीम जब विश्व कप खेलने गई तो ऐसी कोई उम्मीदें लेकर तो नहीं गए थे लेकिन ये ज़रूर है कि तैयारी बहुत अच्छी थी.
1975 के वर्ल्ड कप के मुकाबले हम लोग काफ़ी वनडे क्रिकेट खेल चुके थे. टीम भी काफ़ी अच्छी थी. इंग्लैंड की कंडिशन भी अच्छी थी. फिर यही है कि अगर सही वक़्त पर टीम क्लिक जाए हो जाए तो वो सही टीम साबित होती है.
विश्व के शुरु में ही भारत ने वेस्टइंडीज़ को हरा दिया लेकिन फिर हम ऑस्ट्रेलिया हारे 162 रन से. लेकिन फिर ऑस्ट्रेलिया और ज़िम्बाब्वे को हराया. दरअसल ज़िम्बाब्वे और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ दो मैच हमारे लिए बहुत अहम थे. जब ये दोनों मैच भारत ने जीत लिए और आख़िरी चार में पहुँच गए तब हमें लगने लगा कि अब कुछ भी कर सकते हैं. वहीं से उम्मीदें जागी.
( मोहिंदर अमरनाथ 1983 विश्व कप में सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल में मैन ऑफ़ द मैच थे.)
ऐसी पारी देखी न सुनी
ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ मैच में कपिल देव ने बेहतरीन पारी खेली थी. ऐसी पारी कभी-कभी ही कोई इंसान खेलता है अपने करियर में. उससे टीम का उत्साह बढ़ा. वो पारी टीम के लिए टॉनिक साबित हुई.
वो ऐसा वक़्त था जब लगने लगा था कि अब कुछ नहीं कर पाएँगे. लेकिन मैच जीतने के बाद ड्रेसिंग रूम में आए तो हमें वाकई लगा कि यहाँ से टीम की किस्मत बदल रही है.
सेमीफ़ाइनल इंग्लैंड के साथ था. बड़ा दिन था यहाँ जीतने का मतलब फ़ाइनल में. हम ये सोचकर मैदान पर उतरे थे कि हमारे पास जो भी असला मौजूद था उसे इस्तेमाल किया जाए. जब विकेट गिरते रहें तो दुनिया की कोई भी टीम दबाव में आ जाएगी. जब भारत ने इंग्लैंड को 213 रन पर आउट कर दिया तो हमें पता था कि ये लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.
टीम के कप्तान कपिल देव बेफ़िक्र इंसान थे वो, उनका खेलने का अंदाज़ आक्रामक था और कप्तानी भी वैसे ही करते थे.
फ़ाइनल मैच में सबने सोचा कि जो भी होगा देखा जाएगा. बस उस दिन जाकर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देना है. सबसे अहम चीज़ थी हिंदुस्तान फ़ाइनल में था.
फ़ाइनल में तो भारत का स्कोर केवल 183 रन ही था. लेकिन फिर भी जब गेंदबाज़ी करने उतरे तो सोच यही थी कि वेस्टइंडीज़ को अभी 183 रन बनाने हैं. गेंदबाज़ी के लिए हालात अच्छे थे. हमें पता था कि मूविंग गेंद के कारण वेस्टइंडीज़ की टीम परेशानी में आ जाती है.
भारतीय टीम बहुत हैप्पी-गो लकी किस्म की टीम थी. अनुभवी और युवा दोनों तरह के खिलाड़ी मौजूद थे. मैदान पर खेलते थे जो पूरी लगन के साथ और बाहर हैं तो ख़ूब मौज मस्ती.
मैदान पर मिलजुल कर इंसान कुछ भी करे तो ताक़त और भी बढ़ जाती है. फ़ाइनल में हर एक विकेट अहम था. बलविंदर सिंह संधू, रॉजर बिन्नी, कपिल देव, मदन लाल सबने कमाल दिखाया. सबने अपना संयम और धैर्य बनाए रखा. जब उनके आठ विकेट गिर गए थो हमें लग गया था कि वर्ल्ड कप हमारे क़ब्ज़े में आ चुका है.
'ऐसी जीत का नशा ही दूसरा होता है'
जब आख़िरी विकेट बचे थे तो हमें था कि बस जल्दी-जल्दी औपचारिकता पूरी करें. अंतिम विकेट लेते ही हम सब ड्रेसिंग रूम की ओर दौड़े और जश्न शुरू हो गया.
हर खिलाड़ी की उन दिनों तमन्ना होती थी कि लॉर्डस पर खेले, फ़ाइनल में खेले...उस दिन सब कुछ वहाँ मिल गया. उम्मीद के विपरीत कोई जीत मिल जाए तो उसका नशा और ही होता है.
कुछ उपलब्धियाँ ऐसी होती हैं जो हमेशा याद रहती हैं. घर में उस दिन सबको बहुत खुशी थी. पिताजी चाहते थे कि बेटा क्रिकेट में कुछ ऐसा हासिल करे जैसा उन्होंने किया. विश्व कप जीतना मेरे करियर का सबसे ख़ुशनुमा लम्हा है.
उस दिन तो पूरा मु्ल्क जश्न मना रहा था. हिंदुस्तान में वैसे भी हमेशा क्रिकेट का बुख़ार रहा है. जब भारत ने विश्व कप जीता तो ये एक अनहोनी चीज़ थी और पूरा देश खुशी से झूम उठा था. दुनिया भर में जहाँ भी हिंदुस्तानी थे उन्हें लगा था कि जैसे उन्होंने ही विश्व कप जीत लिया हो. हिंदुस्तान में आज जो क्रिकेट है उसकी शुरुआत 25 साल पहले 1983 में हुई थी.
1983 की टीम में सबसे बड़ा जादू ये था कि वो टीम ख़ुद पर बहुत निर्भर करती थी, हर खिलाड़ी को पता था कि उसे क्या करना है. ऐसा नहीं है कि आज की टीम अच्छी नहीं है लेकिन 1983 की टीम बहुत अनुभवी थी और बेहतरीन ऑलराउंडर थे टीम के अंदर. जिस टीम के पास ऑलराउंडर होंगे वो हमेशा अच्छा प्रदर्शन करेगी.
(ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से मोहिंदर अमरनाथ की बात पर आधारित है)
1983 में टीम जब विश्व कप खेलने गई तो ऐसी कोई उम्मीदें लेकर तो नहीं गए थे लेकिन ये ज़रूर है कि तैयारी बहुत अच्छी थी.
1975 के वर्ल्ड कप के मुकाबले हम लोग काफ़ी वनडे क्रिकेट खेल चुके थे. टीम भी काफ़ी अच्छी थी. इंग्लैंड की कंडिशन भी अच्छी थी. फिर यही है कि अगर सही वक़्त पर टीम क्लिक जाए हो जाए तो वो सही टीम साबित होती है.
विश्व के शुरु में ही भारत ने वेस्टइंडीज़ को हरा दिया लेकिन फिर हम ऑस्ट्रेलिया हारे 162 रन से. लेकिन फिर ऑस्ट्रेलिया और ज़िम्बाब्वे को हराया. दरअसल ज़िम्बाब्वे और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ दो मैच हमारे लिए बहुत अहम थे. जब ये दोनों मैच भारत ने जीत लिए और आख़िरी चार में पहुँच गए तब हमें लगने लगा कि अब कुछ भी कर सकते हैं. वहीं से उम्मीदें जागी.
( मोहिंदर अमरनाथ 1983 विश्व कप में सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल में मैन ऑफ़ द मैच थे.)
ऐसी पारी देखी न सुनी
ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ मैच में कपिल देव ने बेहतरीन पारी खेली थी. ऐसी पारी कभी-कभी ही कोई इंसान खेलता है अपने करियर में. उससे टीम का उत्साह बढ़ा. वो पारी टीम के लिए टॉनिक साबित हुई.
वो ऐसा वक़्त था जब लगने लगा था कि अब कुछ नहीं कर पाएँगे. लेकिन मैच जीतने के बाद ड्रेसिंग रूम में आए तो हमें वाकई लगा कि यहाँ से टीम की किस्मत बदल रही है.
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टीम के कप्तान कपिल देव बेफ़िक्र इंसान थे वो, उनका खेलने का अंदाज़ आक्रामक था और कप्तानी भी वैसे ही करते थे.
फ़ाइनल मैच में सबने सोचा कि जो भी होगा देखा जाएगा. बस उस दिन जाकर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देना है. सबसे अहम चीज़ थी हिंदुस्तान फ़ाइनल में था.
फ़ाइनल में तो भारत का स्कोर केवल 183 रन ही था. लेकिन फिर भी जब गेंदबाज़ी करने उतरे तो सोच यही थी कि वेस्टइंडीज़ को अभी 183 रन बनाने हैं. गेंदबाज़ी के लिए हालात अच्छे थे. हमें पता था कि मूविंग गेंद के कारण वेस्टइंडीज़ की टीम परेशानी में आ जाती है.
भारतीय टीम बहुत हैप्पी-गो लकी किस्म की टीम थी. अनुभवी और युवा दोनों तरह के खिलाड़ी मौजूद थे. मैदान पर खेलते थे जो पूरी लगन के साथ और बाहर हैं तो ख़ूब मौज मस्ती.
मैदान पर मिलजुल कर इंसान कुछ भी करे तो ताक़त और भी बढ़ जाती है. फ़ाइनल में हर एक विकेट अहम था. बलविंदर सिंह संधू, रॉजर बिन्नी, कपिल देव, मदन लाल सबने कमाल दिखाया. सबने अपना संयम और धैर्य बनाए रखा. जब उनके आठ विकेट गिर गए थो हमें लग गया था कि वर्ल्ड कप हमारे क़ब्ज़े में आ चुका है.
'ऐसी जीत का नशा ही दूसरा होता है'
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हर खिलाड़ी की उन दिनों तमन्ना होती थी कि लॉर्डस पर खेले, फ़ाइनल में खेले...उस दिन सब कुछ वहाँ मिल गया. उम्मीद के विपरीत कोई जीत मिल जाए तो उसका नशा और ही होता है.
कुछ उपलब्धियाँ ऐसी होती हैं जो हमेशा याद रहती हैं. घर में उस दिन सबको बहुत खुशी थी. पिताजी चाहते थे कि बेटा क्रिकेट में कुछ ऐसा हासिल करे जैसा उन्होंने किया. विश्व कप जीतना मेरे करियर का सबसे ख़ुशनुमा लम्हा है.
उस दिन तो पूरा मु्ल्क जश्न मना रहा था. हिंदुस्तान में वैसे भी हमेशा क्रिकेट का बुख़ार रहा है. जब भारत ने विश्व कप जीता तो ये एक अनहोनी चीज़ थी और पूरा देश खुशी से झूम उठा था. दुनिया भर में जहाँ भी हिंदुस्तानी थे उन्हें लगा था कि जैसे उन्होंने ही विश्व कप जीत लिया हो. हिंदुस्तान में आज जो क्रिकेट है उसकी शुरुआत 25 साल पहले 1983 में हुई थी.
1983 की टीम में सबसे बड़ा जादू ये था कि वो टीम ख़ुद पर बहुत निर्भर करती थी, हर खिलाड़ी को पता था कि उसे क्या करना है. ऐसा नहीं है कि आज की टीम अच्छी नहीं है लेकिन 1983 की टीम बहुत अनुभवी थी और बेहतरीन ऑलराउंडर थे टीम के अंदर. जिस टीम के पास ऑलराउंडर होंगे वो हमेशा अच्छा प्रदर्शन करेगी.
(ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से मोहिंदर अमरनाथ की बात पर आधारित है)
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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