बीबीसी संवाददाता, जोहानेसबर्ग से
हर बड़े शहर की तरह जोहानेसबर्ग में ट्रेफ़िक रेड लाइट्स पर कई लोग सामान बेचने के लिए खड़े होते हैं. इनमें से एक की आजकल चाँदी ही चाँदी है. विश्व कप का मौसम जो है. अब कोई ऐरा-ग़ैरा आयोजन तो है नहीं, और टीमें एक नहीं, दो नहीं, 20 नहीं पूरी 32 टीमें हैं....तो इन टीमों का झंडा बेचकर चाँदी कमाने वालों की कमी नहीं है.
एक झंडा 20 रैंड का, यानी काफ़ी महंगा. फिर भी इनकी ख़ूब बिक्री हो रही है. ज़ाहिर है सबसे ज़्यादा दक्षिण अफ़्रीका के झंडे बिक रहे हैं...तो ब्राज़ील...इटली और अर्जेंटीना भी उसे कड़ी टक्कर दे रहे हैं. अब तो मैदान में होने वाली टक्कर भी जल्द ही शुरू होने वाली है.
घबराइए मत..ये बॉलीवुड का चरित्र नहीं, बल्कि दीदी माँ हैं. दक्षिण अफ़्रीका में कई भाषाएँ बोली जाती हैं. इनकी संख्या 11 से भी ज़्यादा हैं. इन्हीं में से एक ज़ुलू भाषा है, जो काफ़ी लोकप्रिय है. इसी भाषा में दादी को गोगो कहा जाता है. लेकिन ख़ास बात ये है कि सरकारी नियमों के तहत बुज़ुर्गों को मिलने वाले पेंशन के तहत बड़ी संख्या में दादी माँओं को पेंशन मिलती है.
चिंता की बात ये है कि दक्षिण अफ़्रीका में बढ़ती बेरोज़गारी के बीच इन दादी माँओं के पेंशन से कई घर चलते हैं. सही मायने में गोगो की कमाई ही कई परिवारों का पेट पालती है. अब बेरोज़गारी की बात आई है तो जोहानेसबर्ग के एक और चेहरे से आपको रु-ब-रू कराते हैं. इस शहर में अपराध काफ़ी है और लोग सतर्कता भी बरतते हैं. दिनों-दिन पुलिस इनके ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई भी तेज़ कर रही है. विश्व कप जो हो रहा है.
पिछले दिनों शहर से गुज़रते हुए मुझे कई रेड लाइट्स पर हाथ में प्लास्टिक का थैला लिए युवक दिखे. ये काले युवक देखने से ही ग़रीब लग रहे थे. पूछा तो पता चला वे रेड लाइट पर रुकने वाली गाड़ियों के पास जाकर कूड़ा मांगते हैं और बदले में लोग उन्हें पैसे देते हैं.
यानी इन लोगों का काम रेड लाइट पर रुकने वाली गाड़ियों से कूड़ा इकट्ठा करके फेंकना है. अब हर कार में तो कूड़ा मिलने से रहा. तो वे करें क्या...उनके आगे हाथ भी फैला लेते हैं. शायद किसी को दया आ जाए और उन्हें कुछ मिल जाए.