स्विट्ज़रलैंड के एक अख़बार के साथ बातचीत में ब्लैटर ने कहा कि इस साल जून में फ़ीफ़ा की गवर्निंग बॉडी की बैठक में वे ये प्रस्ताव रखेंगे. ब्लैटर ने कहा, "ये समिति हमारी विश्वसनीयता को मज़बूत करेगी और पारदर्शिता के मुद्दे पर हमें एक नई छवि देगी. मैं निजी रूप में इसका ख़्याल रखूँगा ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि फ़ीफ़ा में कोई भ्रष्टाचार न हो."
फ़ीफ़ा प्रमुख ने कहा कि इस प्रस्तावित समिति में सात से नौ सदस्य होंगे, जिनका संबंध न सिर्फ़ खेल से बल्कि राजनीति, वित्त, उद्योग और संस्कृति के क्षेत्र से भी होगा. सेप ब्लैटर ने कहा है कि वे इस समिति में ख़ुद नहीं रहेंगे क्योंकि वे इसकी स्वतंत्रता का भरोसा देना चाहते हैं.
लेकिन बीबीसी संवाददाता इमोगेन फ़ोलक्स का कहना है कि जिस संगठन पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हो, उसी की स्वीकृति से बनने वाली समिति शायद ही विवादों को ठंडा कर पाए. उनका ये भी कहना है कि इस समिति का प्रस्ताव ख़ुद ब्लैटर रख रहे हैं, जिन्हें इस साल जून में एक बार फिर प्रमुख के रूप में चुने जाने के लिए मैदान में उतरना है.
पिछले नवंबर में फ़ीफ़ा के आचारसंहिता आयोग ने संगठन की कार्यकारी समिति के दो सदस्यों को निलंबित कर दिया था. इन दोनों सदस्यों पर 2018 और 2022 विश्व कप की मेज़बानी के फ़ैसले के मामले में घूस लेने का आरोप है. आरोप ये है कि एमोस एडामू और रेनाल्ड टेमारी ने 2018 और 2022 के विश्व कप की मेज़बानी तय करने के क्रम में अपने-अपने वोट बेचने की पेशकश की थी. हालाँकि दोनों सदस्य इस आरोप से इनकार करते हैं.
वैसे दिसंबर में मेज़बानी तय करने के लिए हुई वोटिंग में दोनों ने हिस्सा नहीं लिया था और बाक़ी 22 सदस्यों की वोटिंग के बाद 2018 की मेज़बानी रूस को और 2022 के विश्व कप की मेज़बानी क़तर को मिली. फ़ीफ़ा को इन दोनों विश्व कप की मेज़बानी की बोली लगाने की प्रक्रिया के दौरान भी सदस्य एसोसिएशनों और समिति के बीच मिलीभगत की शिकायत मिली थी, जिसकी जाँच भी हुई थी.
दोनों विश्व कप के मेज़बान देश का नाम तय करने के तीन दिनों पहले बीबीसी के चर्चित पैनोरामा कार्यक्रम में ये आरोप लगाया गया था कि 1990 के दशक में तीन फ़ीफ़ा अधिकारियों ने घूस लिए थे.
जिन तीन फ़ीफ़ा अधिकारियों पर आरोप लगे थे, उनमें से एक उपाध्यक्ष इसा हयातू ने पैनोरामा कार्यक्रम के दावों का ज़ोरदार खंडन किया था. फ़ीफ़ा ने भी उस समय कहा था कि ये मामला बंद हो चुका है और फ़ीफ़ा पहले ही इसकी जाँच कर चुकी है. और जाँच में किसी भी फ़ीफ़ा अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया गया.