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खेलों के लिए नियामक संस्था ज़रूरी

इंसान और लालच का यूँ भी चोली-दामन का साथ रहा है. हम जितने ज़्यादा सभ्य होते जाएँगे, दूसरे की ज़रूरतों की क़ीमत पर अपनी जेब भरने के उतने ही तरीक़े हम ईजाद कर लेंगे.

भूमिका बहुत हुई, चलिए अब सीधे मुद्दे पर आते हैं और खेलों की दुनिया में भ्रष्टाचार की बात करते हैं.

मुझे पिछले साल एचटी लीडरशिप सम्मेलन में राहुल द्रविड़ की कही बातें याद आ रही हैं.

उन्होंने कहा था कि युवा और उभरती प्रतिभाओं को एजेंटों के हवाले नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे पैसों की लालच में एक के बाद एक डील करते जाएँगे और ये युवा खिलाड़ियों के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है.

द्रविड़ का मानना था कि युवाओं को खेलों में उतारने के लिए एक ज़िम्मेदार संस्था ज़रूरी है.

समस्या गंभीर

तो, इस गंभीर और समझदारी भरे सुझाव पर भला किसे आपत्ति हो सकती है?

बल्कि इस सुझाव को और आगे बढ़ाते हुए खिलाड़ियों के एजेंटों का खेल बोर्ड में पंजीकरण कराना ज़रूरी कर देना चाहिए.

साथ ही आचार संहिता भी बनाई जानी चाहिए. ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें एजेंट, चयनकर्ताओं और बोर्ड अधिकारियों के बीच घालमेल के आरोप सामने आए हैं.

इन आरोपों में सच्चाई हो भी सकती है और नहीं भी, लेकिन जब आप पाते हैं कि खेल एजेंट बोर्ड के साथ कारोबार कर रहा है तो शक होना लाज़िमी है.

पिछले साल भारतीय क्रिकेट चयन समिति के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप वेंगसरकर से ऐसे एजेंट के लिए अख़बार में कॉलम न लिखने के लिए कहा गया, जो कई शीर्ष भारतीय खिलाड़ियों का काम देख रहा था.

माल्या बैंगलोर की रॉयल चैलेंजर टीम के मालिक हैं

साफ़ कहें तो वेंगसरकर भी वही कर रहे थे जो कई पूर्व क्रिकेटर कर रहे हैं. यहाँ सबसे गंभीर समस्या ये है कि कौन किसे नियंत्रित करेगा.

एक कहावत है कि जिनके घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरे पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए और ये कहावत बोर्ड पर भी लागू होती है.

आईपीएल की संचालन समिति में ऐसे कई खिलाड़ी हैं जो अख़बारों में कॉलम लिख रहे हैं और टेलीविज़न पर कमेंट्री भी कर रहे हैं. तो क्या यहाँ ये हितों का टकराव नहीं है?

अगर मुझे किसी के फ़ायदे के लिए पैसा मिलता है तो क्या मैं उस खिलाड़ी के बारे में सही राय दर्शकों या पाठकों को बता सकूँगा.

ये बीमारी बहुत गंभीर हो गई है. चेन्नई में बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एएस मुथैया ने मौजूदा सचिव एन श्रीनिवासन पर बोर्ड के संविधान का उल्लंघन करने का आरोप लगाया.

उनका आरोप है कि वे आईपीएल की टीम के मालिक हैं और ये बोर्ड के संविधान का उल्लंघन है. इस मामले में लड़ाई अदालत में चल रही है.

ऐसे ही कई और बोर्ड अधिकारियों पर भी आरोप हैं कि उनके हित कई आईपीएल टीमों से जुड़े हैं.

आर्थिक मंदी के दौर में खेलों में आ रहे पैसे में भी कमी आएगी. यूँ भी आईपीएल टीमों के कई मालिकों को अपने कारोबार में घाटा उठाना पड़ा रहा है.

वे इस बात से भी चिंतित हैं कि शायद उन्होंने ट्वेन्टी-20 से मुनाफ़े का कुछ ज़्यादा ही अंदाज़ा लगा लिया था.

कुल मिलाकर खेलों के लिए ये अच्छा समय नहीं है और भारत में क्रिकेट संचालन के लिए एक नियामक संस्था की ज़रूरत है ताकि हम बड़े घोटालों से बच सकें.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:21 [IST]
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