मोबाइल में बेटे की तस्वीर देख 5 महीने तक घर से दूर रहे मंजीत, कर्ज के पैसे से ट्रेनिंग कर जीता गोल्ड
नई दिल्ली। एक खिलाड़ी बनने के लिए सपनों से, उम्मीदों से प्रेम से अपनों से उस हर चीज से समझौता करना पड़ता है जो आपकी राह में थोड़ी सी भी मुश्किल पैदा करते हों। त्याग की जब इस पराकाष्ठा को कोई खिलाड़ी जीता है तब उसका एक खिलाड़ी के तौर पर सपना पूरा होता है। वहीं जब आपकी प्रतिभा का असर दुनिया की नजरों में दिखने लगता है तो आप का प्रभाव भी कुछ इस कदर बढ़ता है कि लोग आपकी इस विशेषता को नौकरी, पद और पुरस्कार से नवाजने की कोशिश करते हैं लेकिन अगर आप का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता तो वहीं नजरें आपको दरकिनार भी करती हैं। एक खिलाड़ी के तौर पर उसके जीवन का यह सबसे कड़वा सच है। जब उसका जादू असर करता है तो सरकारें, बड़ी-बड़ी कंपनियों का विज्ञापन और लोकप्रियता उसके कदम चूमती हैं लेकिन जब वही खिलाड़ी फीका प्रदर्शन करता है तो यही संस्थाएं आपको तवज्जो देने में हिचकिचाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है इंडोनेशिया में चल रहे 18वें एशियन गेम्स में भारत को गोल्ड जिताने वाले मंजीत सिंह की भी।
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पिता होकर भी नहीं देखी है बेटे की शक्लः
एक खिलाड़ी का जीवन त्याग की कहानी बयां करता है, बहुत कुछ खोकर एक खिलाड़ी अपने देश को दुनिया के सामने नंबर वन बनाता है लेकिन इस दौरान वो बहुत कुछ खोता है। एक व्यक्ति के जीवन में पुत्र मोह को सबसे बड़ा प्रेम माना गया है लेकिन इस खिलाड़ी ने अपने देश का नाम बढ़ाने के लिए इस मोह का भी त्याग किया है। दरअसल ट्रेनिंग के सिलसिले में पिछले 5 महीने से मंजीत घर से बाहर हैं.। इस दौरान वह पिता भी बने लेकिन अबतक अपने बेटे की शक्ल तक नहीं देख सके हैं। ऐसे में अब उम्मीद है कि शायद उनके इस प्रदर्शन से अब उनकी किस्मत भी बदल जाए।

जब ओएनजीसी ने दी हुई नौकरी भी छीनीः
दरअसल हरियाणा के जींद के रहने वाले मंजीत ने खेल के 10वें दिन भारत को 800 मीटर की दौड़ में गोल्ड जिताकर न सिर्फ भारत को 9वां स्वर्ण पदक दिलाया बल्कि एशियन गेम्स में एक इतिहास भी रचा। बता दें कि उनकी प्रतिभा का कायल होकर कुछ साल पहले ओएनजीसी ने उन्हें नौकरी तो दी लेकिन वह नौकरी कॉन्ट्रेक्चुअल थी। वहीं जब मंजीत 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों में कोई मेडल नहीं जीत सके तो उनको इसका खामियाजा अपनी नौकरी गंवाकर चुकानी पड़ी औऱ ओएनजीसी ने उनका कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया। ऐसे में उन्होंने उधारी के पैसों से अपनी ट्रेनिंग जारी रखी जिसमें कई बार उनके हालात ने उनके हौसलों को तोड़ने का भी प्रयास किया।

कुछ इस तरह रचा था इतिहासः
दरअसल 800 मीटर की रेस में भारत को किसी खास पदक की उम्मीद नहीं थी लेकिन जब मंजीत ने ट्रैक पर रफ्तार भरी तो हर कोई अचंभित रह गया जब वो रफ्तार में थे तो सभी की सांसे अटकी हुईं थी लेकिन सपनों की रफ्तार में मंजीत कुछ इस कदर खोए थे कि जब पांव थमे तो देश गोल्ड जीत चुका था। उन्होंने इस मुकाम को हासिल करने के लिए केवल 1.46.15 मिनट का समय लिया और साथ ही साथ जिनसन जॉनसन ने भी सिल्वर जीतकर इतिहास रच दिया।

नौकरी की भी रेस है जारीः
पूरे हिंदुस्तान को अपनी रेस से चौंकाकर झोली में गोल्ड डालने वाले मंजीत सिंह भले ही एशियन गेम्स की इस रेस में गोल्ड जीत गए हों लेकिन अभी नौकरी की रेस उऩकी जारी है। बता दें कि वो इससे इतने निराश हो गए थे कि उन्होंने एक वक्त तो ऐसा भी मन बना लिया ता कि अब वह एथलेटिक्स को छोड़ देंगे। हालांकि कोच के समझाने के बाद वह वापस ट्रैक पर लौटे और आज इतिहास रच दिया।
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