भारत के लिए धड़कता है आनंद का दिल
नई दिल्ली, 24 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय (एचआरडी) ने देश के सबसे ख्यातिलब्ध खिलाड़ियों में से एक शतरंज विश्व चैम्पियन विश्वनाथन आनंद की नागरिकता पर सवाल खड़ा करके उस दिल का अपमान किया है, जो स्पेन में रहने के बावजूद हर पल भारत के लिए धड़कता है।
आनंद शौक से नहीं बल्कि पेशेवर मजबूरियों की वजह से स्पेन में रहते हैं। यूरोप में रहकर वह खुद को अधिक से अधिक मौकों पर पेशेवर आयोजनों से जोड़े रख सकते हैं। भारत में रहकर ऐसा करना संभव नहीं। यह बात आनंद कई बार कह चुके हैं और भारत के एक अन्य मशहूर शतरंज खिलाड़ी पी. हरिकृष्णा ने भी हाल के दिनों में विदेश में बसने की इच्छा जाहिर की थी। यह हरिकृष्णा या आनंद की ही नहीं, हर उस खिलाड़ी की मजबूरी है जो पेशेवर स्तर पर अच्छा करना चाहता है क्योंकि यूरोप ही शतरंज का गढ़ है।
आनंद अकेले खिलाड़ी नहीं जो पेशेवर मजबूरियों की वजह से विदेश में रहते हैं। रविवार को पीजीए टूर खिताब जीतने वाले रहले भारतीय होने का गौरव हासिल करने वाले गोल्फ खिलाड़ी अर्जुन अटवाल और टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। ये दोनों अमेरिका में रहते हैं।
आनंद की तरह अटवाल और पेस भी विदेश में रहकर बेहतर स्थिति में अभ्यास करते हुए अधिक से अधिक पेशेवर स्पर्धाओं में खेलते हैं। इससे देश को ही फायदा होता है क्योंकि यहां खेलों के लिहाज से अब भी वैसी सुविधाएं नहीं, जैसी विदेशों में है।
जहां तक आनंद की बात है तो उनका स्पेन में रहना एक तरह से मजबूरी है क्योंकि यूरोप और खासकर स्पेन में शतरंज की सबसे प्रमुख प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। इसमें कोरस ग्रैंडमास्टर्स शतरंज चैम्पियनशिप सबसे प्रमुख है।
आनंद के माता-पिता चेन्नई में रहते हैं और वह अपने माता-पिता की देखरेख के लिए हमेशा स्वदेश आते रहते हैं। स्वदेश आना आनंद की मजबूरी नहीं बल्कि उस मिट्टी से लगाव है, जहां उनके माता-पिता हैं और उनका जन्म हुआ।
विदेश में रहने के बावजूद आनंद और उनकी पत्नी अरुणा पूरी तरह भारतीय हैं। ऐसे में इस महान खिलाड़ी की नागरिकता पर सवाल खड़ा करके एचआरडी मंत्रालय ने सचमुच देश को शर्मसार करने वाला काम किया है।
एचआरडी मंत्री कपिल सिब्बल ने इसके लिए आनंद से माफ मांग ली है लेकिन इससे आनंद के मन का दुख कम नहीं होगा। जिस खिलाड़ी को 1992 में पहली बार देश का सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से नवाजा गया और जिसने 2007 में पहली बार विश्व चैम्पियन बनकर देश का मान बढ़ाया उसके प्रति देश के नौकरशाहों का यह रवैया बेहद निराशाजनक है।
सिब्बल ने इस निराशाजनक घटनाक्रम को 'प्रक्रिया संबंधी कार्रवाई' का दोष करार दिया लेकिन यह बात समझ से परे है कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाली डॉक्टरेट की मानद उपाधि के लिए आखिरकार नौकरशाहों को उस आनंद की नागरिकता पर सवाल खड़े करने की क्या जरूरत आ पड़ी जिसकी किसी बड़ी सफलता पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद बधाई देता है।
इसे लापरवाही कहा जा सकता है या फिर यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में उन खेल हस्तियों का कोई सम्मान नहीं, जो अपनी मिट्टी से हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी देश के लिए सम्मान अर्जित करते हैं। यह समझने की बात है कि विदेश में रहकर अपनी पेशेवर जरूरतें पूरी करने वाला कोई खिलाड़ी आखिरकार खेलता तो देश के लिए ही है।
आनंद इस पूरे घटनाक्रम से बेहद आहत हैं। उनके पास भारत के साथ-साथ स्पेन की नागरिकता है और अगर वह चाहें तो आने वाले दिनों में स्पेन के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेल सकते हैं। लेकिन ऐसा होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि आनंद उस मिट्टी के बने ही नहीं हैं, जो अपने देश से अलग रहकर सांस ले पाएं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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