'आईएचएफ की मान्यता समाप्त करने का आदेश अवैध' (लीड-1)
इसके साथ ही न्यायालय ने सरकार और भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने अपने फैसले में कहा, "आईएचएफ की मान्यता रद्द करने के संबंध में भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) द्वारा पेश की गई दलीलें न्यायालय को बेबुनियाद लगीं। इस संबंध में दिए गए आदेश से आईएचएफ के साथ नाइंसाफी हुई है क्योंकि उसे इस संबंध में कोई कारण बताओ नोटिस भी नहीं दिया गया था। यह प्राकृतिक न्याय के कानून का उल्लंघन है।"
उल्लेखनीय है कि आईओए ने अप्रैल 2008 में आईएचएफ की मान्यता रद्द कर दी थी। बाद में खेल मंत्रालय भी इस फैसले में आईओए के साथ दिखा। इसके बाद आईओए ने हॉकी इंडिया (एचआई) नाम की एक अलग संस्था का गठन किया जो भारत में हॉकी को नियंत्रित करने वाली अंतरिम इकाई के तौर पर काम कर रही है।
न्यायालय ने आईएचएफ की मान्यता रद्द करने को अवैध करार देते हुए कहा, "खेल महासंघों के पास एक स्तर तक स्वायत्तता होनी चाहिए और सरकार को इस दिशा में नियंत्रक का काम करना चाहिए। अगर खेल संघों से जुड़े लोग खेलों के विकास के लिए वाकई चिंतित हैं और अच्छे तरीके से काम कर रहे हैं तो संघों को लोकतांत्रिक तरीके से काम करने देना चाहिए।"
"अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में हार और जीत लगी रहती है। इस पर किसी का नियंत्रण नहीं। इसके लिए किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाना देश में खेल के विकास के लिए ठीक नहीं। भारतीय हॉकी टीम के खराब प्रदर्शन की तह में जाने के लिए जांच होनी चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि आईएचएफ पर लगाया गया प्रतिबंध हटाया जाए। बीते को बिसारकर भविष्य की ओर देखने का वक्त आ गया है।"
सरकार ने यह कहते हुए न्यायालय से इस मामले में अपने हक में फैसला सुनाने का आग्रह किया था कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में काफी कम वक्त रह गया है और ऐसी स्थिति में अगर आईएचएफ की मान्यता बहाल कर दी जाएगी तब भारतीय हॉकी एक बार फिर अधर में चली जाएगी।
सरकार के मुताबिक उसने महिला और पुरुष हॉकी को संचालित करने के लिए हॉकी इंडिया का गठन किया है और आईएचएफ को फिर से मान्यता मिलने की सूरत में नई संस्था बेमानी हो जाएगी। इस कारण उसका काम-धाम फिर से शिफर तक पहुंच जाएगा।
सरकार की इस दलील पर न्यायालय ने कहा "आईओए और सरकार ने इस संबंध में बहुत पहले न्यायालय को बताया था। देश में होने वाले कुछ प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के मदद्ेनजर न्यायालय ने अपने अंतरिम फैसले पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी थी। यही कारण है कि पुरुष हॉकी विश्व कप की समाप्ति तक इस मामले को लेकर कोई सुनवाई नहीं की गई।"
"याचिकाकर्ता आईएचएफ ने हमारे सामने जो दलीलें पेश की थीं, वे सही लफ्जों में यह बता रही थीं कि उसके साथ नाइंसाफी हुई है और उसे निलंबित किया जाना बिल्कुल गलत है। दो वर्षो तक उसकी याचिका पर सुनवाई नहीं किया जा सका क्योंकि उस दौरान भारत को कई अंतर्राष्ट्रीय आयोजन करने थे। दुख की बात यह है कि दो वर्ष बीत जाने के बाद भी आईएचएफ को अवैध ढंग से हॉकी जमात से बाहर रखा गया। इस स्थिति में बदलाव की जरूरत थी।"
अपना फैसला सुनाने के बाद न्यायालय ने सभी पक्षों (आएचएएफ, सरकार और आईओए) से कहा कि वे मिलकर भारतीय हॉकी की बेहतरी के लिए काम करें। साथ ही न्यायालय ने सभी पक्षों से इस संबंध में राय भी मांगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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