भारत में तैराकी में प्रतिभावान लोग नहीं आते
29 अगस्त 1991 को कोल्हापुर, महाराष्ट्र, में जन्मे वीरधवल खाड़े भारत के चोटी के तैराकों में से एक हैं. उनसे उम्मीद की जा रही है कि वो भारत को राष्ट्रमंडल खेलों में तैराकी का पहला पदक दिलाएं.
वीरधवल को तैराकी अपनाने के लिए उनके पिता ने प्रेरित किया क्योंकि उनका मानना था कि टीम खेल में किसी एक खिलाड़ी की ग़लती से हार हो सकती है जबकि तैराकी जैसे व्यक्तिगत खेल में सबकुछ व्यक्ति की ख़ुद की मेहनत पर निर्भर करता है.
2001 में जूनियर नेशनल्स में वीरधवल को पहला मेडल मिला जिसके बाद वो खेल के प्रति गंभीर हो गए. आज वीरधवल पचास और सौ मीटर फ़्रीस्टाइल और पचास और सौ मीटर बटरफ़्लाई वर्गों में राष्ट्रीय चैंपियन हैं. इसके अलावा उनके नाम कुछ राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी हैं.
सुनिए : वीरधवल खाडे का परिचय
वीरधवल पिछले कुछ सालों से विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग ले रहे हैं. उन्होंने एशियन स्विमिंग, एशियन इनडोर, एशियन एज ग्रुप जैसी प्रतियोगिताओं में पदक भी जीते हैं.
पंद्रह साल की उम्र में वीरधवल, ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफ़ाई करने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के तैराक बने. 2008 बीजिंग ओलंपिक्स में पचास, सौ और दो सौ मीटर फ़्रीस्टाइल वर्गों में भारत का प्रतिनिधित्व किया.दो से ज़्यादा वर्गों में भाग लेने वाले वो पहले भारतीय तैराक बने.
2008 में ही पुणे में हुए राष्ट्रमंडल युवा खेलों में वीरधवल ने तीन स्वर्ण और तीन रजत पदक जीते जो किसी भी भारतीय खिलाड़ी द्वारा जीते गए सबसे ज़्यादा पदक थे.
उसी साल वो अंतरराष्ट्रीय रैंकिग में शीर्ष सौ में जगह बनाने वाले पहले भारतीय तैराक बने जबकि 2009 में वो शीर्ष साठ में पहुंचे.
इन दिनों वीरधवल बैंगलोर में कोच निहार अमीन की देख-रेख में 2010 राष्ट्रमंडल खेलों के लिए तैयारी कर रहे हैं.
वो पचास और सौ मीटर फ्रीस्टाइल और पचास और सौ मीटर बटरफ़्लाई वर्गों में हिस्सा लेंगे.
वो अपनी अब तक की तैयारियों से काफ़ी संतुष्ट हैं. वो कहते हैं कि इसके लिए उन्होंने दो महीने यूरोप में भी तैयारी की है और उन्हें अच्छे नतीजों की उम्मीद है.
राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने आज तक तैराकी में कोई भी पदक नहीं जीता हैं. प्रतिस्पर्धा ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ़्रीका जैसी विश्वस्तरीय टीमों से है जिनमें कई ओलंपिक और विश्व रिकॉर्ड धारक भी हैं.
वीरधवल कहते हैं कि मुक़ाबला कठिन होगा लेकिन वो मानते हैं कि पिछले कुछ समय में उनके प्रदर्शन में भी सुधार हुआ है. इसलिए उन्हें पदक पाने की काफ़ी उम्मीद है.
भारत में तैराकी के लिए सुविधाओं के बारे में वीरधवल कहते हैं कि विदेश की तुलना में भारत में फ़िज़ियो और बायोमकेनिक्स जैसी सुविधाओं की कमी है. साथ ही वो कहते हैं कि भारत में तैराकी में प्रतिभावान लोग नहीं आते इसलिए प्रतियोगिता का स्तर उतना ऊंचा नहीं है.
लेकिन वो कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में सरकार की तरफ़ से मदद मिली है और खेल को बढ़ावा देने के लिए कॉरपोरेट जगत को भी आगे आना चाहिए.
वीरधवल खाड़े अपने पिता और कोच निहार अमीन को अपना आदर्श मानते हैं और सफलता का श्रेय इन दोंनो को देते हैं.
वो मानते हैं कि तैराकी एक मंहगा खेल है और विदेश की तुलना में भारत में इसके लिए बहुत कम सुविधाएं हैं. वो मानते हैं कि अगर वो विदेश में होते तो शायद बेहतर सुविधाओं के चलते वो बेहतर परफ़ोर्म कर सकते थे.
लेकिन वो कहते हैं कि भारत में रहने के भी कई फ़ायदे हैं. वो कहते हैं कि विदेश में अपने वर्ग में उनकी प्रतिस्पर्धा बहुत से और खिलाड़ियों से होती लेकिन भारत में वो शीर्ष तैराक हैं. इसलिए जब भी पदक जीत कर आते हैं तो जिस तरह का मान-सम्मान उन्हें भारत में मिलता है वैसा शायद विदेश में नहीं मिलता.
वीरधवल कहते हैं कि तैराकी को लोकप्रिय बनाने के लिए मीडिया का भी अहम रोल है. वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि मीडिया को दूसरे खेलों को भी कवर करना चाहिए. जब सानिया मिर्ज़ा दस स्थान गिर भी जाती है तो उसको बहुत बड़ी हेडलाइन बनाते हैं. लेकिन जब मैं और संदीप सेजवाल विश्व रैंकिंग में शीर्ष साठ में जगह बनाते हैं तो उसे नोटिस नहीं किया जाता. इसलिए मीडिया को बाकी खेलों पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे इन खेलों को बढ़ावा मिलेगा."
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