तेंदुलकर की राह चले वीरेंद्र सहवाग
नई दिल्ली, 21 सितम्बर (आईएएनएस)। भारतीय टीम के विस्फोटक सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने दिल्ली डेयर डेविल्स टीम की कप्तानी ठुकराकर एक मिसाल कायम की है। यह ठीक वैसी ही मिसाल है जैसा वर्षो पहले सचिन तेंदुलकर ने भारतीय टीम की कप्तानी ठुकराकर कायम की थी।
कई मायनों में सहवाग अपने प्रेरणास्रोत तेंदुलकर की राह पर चलते नजर आ रहे हैं। भारतीय क्रिकेट जगत में सहवाग का कद उतना बड़ा नहीं जितना कि तेंदुलकर का है लेकिन यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि आज की तारीख में वह तेंदुलकर के बाद भारत के सबसे बड़े सितारे हैं। महेंद्र सिंह धौनी और राहुल द्रविड़ कद और शोहरत के लिहाज से उनके करीब नजर आते हैं लेकिन धौनी अनुभव के मामले में उनसे पीछे छूट जाते हैं जबकि द्रविड़ का करियर अवसान पर है।
दिल्ली के क्रिकेट खेमे में सहवाग का कद इतना बड़ा है कि उनकी 'बगावत' को लेकर पूरा दिल्ली व जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) हिल गया था और उनकी नाराजगी दूर करने के लिए खुद डीडीसीए प्रमुख अरुण जेटली को सामने आना पड़ा। दिल्ली में सहवाग किसी भी मायने में तेंदुलकर से कम हैसियत नहीं रखते। वैसे उनकी हैसियत का ग्राफ पूरे देश में एक जैसा है लेकिन दिल्ली के खिलाड़ियों के लिए वह मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत, दोस्त, शुभचिंतक और गुरु सरीखे हैं।
दिल्ली क्रिकेट खेमे में सहवाग के बाद सबसे बड़ा कद रखने वाले गौतम गंभीर इस बात को ज्यादा अच्छी तरह जानते हैं और यही कारण है कि डेयर डेविल्स टीम की कप्तानी मिलने के बाद उन्होंने इसे सहवाग का बड़प्पन बताया। तेंदुलकर की ही तरह सहवाग का हालिया करियर चोट से ग्रसित रहा है। इससे उबरने के लिए वह काफी मेहनत कर रहे हैं और चैंपियंस लीग के माध्यम से प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में वापसी भी करेंगे लेकिन कप्तानी त्यागकर उन्होंने यह साबित किया है कि उन्हें पद का लोभ नहीं।
सहवाग उन खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिसने कभी भी कप्तानी का मोह नहीं किया। वह अपने खेल और टीम के हित के बारे में सोचते रहे। सहवाग ने कभी भी टीम में स्थान पक्का करने के लिए कोई पारी नहीं खेली। यही कारण है कि कई बार उन्हें अपने 'स्वाभाविक' खेल के कारण ही टीम से स्थान गंवाना पड़ा।
आज सहवाग का करियर शिखर पर है। वह टेस्ट और एकदिवसीय मैचों के साथ-साथ ट्वेंटी-20 क्रिकेट के बेहद सफल खिलाड़ी हैं। वह करियर के ऐसे मुकाम पर हैं, जहां उन्हें धन या शोहरत की नहीं बल्कि टीम के लिए खेलने की जरूरत है और ऐसा तभी हो सकता है जब वह निश्चिंत होकर खेलें।
इसके लिए सबसे जरूरी है कि वह कप्तानी के अनावश्यक बोझ को अपने से दूर ही रखें। तेंदुलकर पिछले कई वर्षो से ऐसा करते आ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि कप्तान नहीं होने के कारण टीम में तेंदुलकर की बात नहीं सुनी जाती। आज भी टीम के 40 फीसदी फैसले वही करते हैं।
दिल्ली या डेयर डेविल्स टीम में सहवाग की यही हैसियत है। वह कप्तान न होकर भी कप्तान रहेंगे क्योंकि गंभीर उनके बगैर एक कदम भी नहीं उठा सकते। यह गंभीर की मजबूरी नहीं बल्कि सहवाग के प्रति उनका सम्मान है। यह सम्मान एक ऐसे खिलाड़ी के प्रति है, जो भारतीय क्रिकेट का सुपरस्टार है। ठीक वैसे ही जैसे तेंदुलकर हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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