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फिर दिल दिया हॉकी को

प्रदीप मैगज़ीन

वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए विशेष

कुछ हफ्तों पहले टेलीविज़न पर प्रसारित एक विज्ञापन अभियान में फ़िल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और क्रिकेट खिलाड़ी वीरेंदर सहवाग लोगों से “फिर दिल दो हॉकी को” कहते दिखे थे. इनलोगों के बार-बार अनुरोध पर उत्साहित होकर हज़ारों खेलप्रेमी हॉकी वर्ल्ड कप में भारतीय हॉकी टीम का हौसला बढ़ाने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम पहुंचे.

भारतीय टीम ने भी इन्हें निराश नहीं किया और पाकिस्तान की टीम को हराकर खेलप्रेमियों के उम्मीद पर खरे उतरे.

लेकिन अफ़सोस.....इस जीत के बाद लगातार दोनों मैच में भारतीय टीम हारती रही. लगातार हो रही हार ने खेलप्रेमियों को निराश कर दिया. भोलेभाले दर्शकों को इस खेल की बारीक़ी के बारे में पता नहीं है, लेकिन वो एक ही बात चाहते हैं कि भारत की जीत हो.

दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में मैच देखने वालों का कहना है कि सुरक्षा कारणों से जो भी जाँच-परख करनी थी वो समय रहते सभ्य तरीके से पहले ही कर लिए गए.

अंदर स्टेडियम भी बहुत ख़ूबसूरत था और कहीं से भी मैदान को साफ-साफ देखा जा सकता था. दर्शकों के लिए इलेक्ट्रॉनिक स्कोरबोर्ड और बड़ी स्क्रीन ने खेल का मज़ा और भी बढ़ा दिया. इसके लिए आयोजकों को धन्यवाद देना चाहिए.

इस खेल के दौरान स्टेडियम के अंदर का वतावरण तो मानो रोमांच से भरा था. मैच में पाकिस्तान के ख़िलाफ किसी भी दर्शक ने असभ्य नारा या गाली-गलौज नहीं किया. इस मैच को देखकर हम कह सकते थे कि दर्शक इस मैच को खेल भावना से देख रहे थे.

निराश हुए खेलप्रेमी

इस मैच को देखकर पुराने दिनों की याद आ रही थी. ऐसा लग रहा था मानो भारत निर्विवाद रुप से विश्व चैंपियन था और यहां हॉकी का रोमांच अब भी मौजूद है.

लेकिन दो मैचों हार के बाद ये वही दर्शक हैं जिसे लगता है कि भारतीय हॉकी टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुक़ाबला करने के क़ाबिल नहीं है. इस हार ने टीम की क़लई खोल दी है. ऐसा लगता है भारतीय टीम में ना खिलाड़ी फ़िट है ना कुशल चतुरता है और ना रक्षात्मक खेल.

लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये दर्शक फिर से टीम के समर्थन में आएंगे या फिर ये ‘छोटी सी लव स्टोरी’ यहीं खत्म हो जाएगी.

कुछ भी हो इस मैच से ये ज़ाहिर हो गया कि कोई भी टीम मीडिया के प्रचार या दर्शकों के समर्थन मात्र से नहीं जीतती है.

इससे यह कहा जा सकता है टीम में कुछ अंदरुनी समस्या तो है. क्योंकि जिस समय टीम को मैच की तैयारी करनी चाहिए उस समय वो फ़ेडेरेशन से लेन-देन का हिसाब माँग रहे थे.

कुछ हमारी भी ग़लती है क्योंकि ज़्यादार समय हम खेल की परवाह नहीं करते हैं और अचानक से इस खेल के प्रति राष्ट्रीय भावना जाग जाती है और ये पूरा हो ऐसा चाहने लगते हैं.

ज़मीनी स्तर पर हो रही ग़लतियां, धन की कमी और अकुशल प्रबंधन ने खेल का कबाड़ा तो कर ही दिया है. इस खेल को पटरी पर लाने के लिए केवल दिल देने की ज़रुरत नहीं है बल्कि दिल से अधिक कुछ और देने की ज़रुरत है.

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:16 [IST]
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