नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) यूं तो पंजाब और भारतीय हाकी का चोली-दामन का साथ रहा है, पर अगर हम भारतीय भारतीय हाकी की बात करते हुए संसारपुर का जिक्र ना करें तो बात नहीं बनेगी।
जालंधर शहर से चंदेक मील की दूरी पर संसारपुर। कहने वाले कहते हैं कि गांव करीब 300 बरस पुराना है। इस गांव ने भारत को एक दर्जन से ज्यादा हाकी खिलाड़ी दिए हैं। सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि केनिया और कनाडा के भी कई खिलाड़ी इस गांव से संबंध रखते रहे हैं।
भारतीय हाकी की जान
शायद ही दुनिया में कोई गांव होगा जिसने इतने ओलंपिक खिलाड़ी दिए हो। सीनियर स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट संदीप नकई मानते हैं कि भारतीय हाकी की जान है संसारपुर। पर जब से इधर के नौजवानों ने हाकी की स्टिक को पकड़ना बंद किया है, बस तब ही से भारतीय हाकी के बुरे दिन चालू हो गए।
कौन-कौन संसारपुर से
संसारपुर से बलबीर सिंह (रेलवे), गुरजीत सिंह, गुरुदेव सिंह, उधम सिंह, बलबीर सिंह( सेना), हरदयाल सिंह, तरसेम सिंह,अजीतपाल सिंह, दर्शन सिंह वगैरह ने भारतीय टीम की ओलंपिक या एशियाई खेलों में नुमाइंदगी की है।
कुलार जाति से
संयोग देखिए कि ये सभी खिलाड़ी जाट सिखों की कुलार जाति से संबंध रखते हैं। संसारपुर से सबसे पहले कर्नल गुरमीत सिंह ने 1932 के लास एजेंल्स ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम की नुमाइंदगी की। उसके बाद तो लगातार इस गांव से संबंध रखने वाले खिलाड़ी भारतीय टीम में आने लगे।
संदीप नकई ने कहा कि इस गांव में एक हाकी का मैदान है बीते दशकों से। इधर के बच्चे इसमें हाकी की प्रैक्टिस करते थे। वे ही आगे चलकर पंजाब और भारत से खेले। केनिया के महान हाकी खिलाड़ी अवतार सिंह के पुरखे भी इसी गांव से आते थे। उन्हें तारी भी कहते हैं। वे चार बार केनिया की टीम से ओलंपिक खेलों में खेले। बिंदी कुलार ने कनाड़ा की टीम की तरफ कई बार खेलने का गौरव हासिल किया। वे संसारपुर से ही आते थे।