विंध्यवासिनी के पास न तो नौकरी है और न ही घर के पालन पोषण के लिये पैसा। विंध्यावासिनी उस टीम की सदस्य रही है, जिसने 4 मार्च 2012 को विश्व कप के फाइनल मैच में 25-19 से हराया था। भारत की जीत में विंध्यवासिनी की भूमिका काफी अहम थी। पिछले दिनों मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने विंध्यवासिनी को 10 लाख रुपए और नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन वादा आज तक पूरा नहीं किया।
मैडल बेचने तक की नौबत आ गई है
झारखंड में खेल की तमाम प्रतिभाएं हैं। यहां के तमाम खिलाड़ियों ने देश का नाम रौशन किया है। फिर चाहे वो क्रिकेट हो या हॉकी या फिर कबड्डी। लेकिन खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने की बात आती है, तो सरकार कुछ नहीं कर रही है।
अपने माता-पिता की तीसरी संतान 24 वर्षीय विंध्यवासिनी के पिता का 2012 में निधन हो गया था। उनके बाद से विंध्यवासिनी पर अपने परिवार के लालन-पालन की जिम्मेदारी आ गई। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयानीय हो चुकी है। खास बात यह है कि बोकारो डीसी ने 10 हजार रुपए के पुरस्कार का ऐलान किया था, वो भी अब तक विंध्यवासिनी को नहीं मिला। परिस्थितियों से बुरी तरह टूट चुकी विंध्यवासिनी का कहना है कि वो सिक्योरिटी गार्ड, आया, पियोन, आदि तक की नौकरी तक करने को तैयार है।