1 जून 1975 को जन्मी कर्णम मल्लेश्वरी एक सेवानिवृत्त भारतीय भारोत्तोलक हैं। उन्होंने 2000 में ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास रचा। उनकी उपलब्धियों ने उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार दिलाए, जिनमें 1994 में अर्जुन पुरस्कार और 1999 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार शामिल हैं। उन्हें उसी वर्ष पद्म श्री पुरस्कार भी मिला।

| Season | Event | Rank |
|---|---|---|
| 2000 | Women 69kg | B कांस्य |
1995 में, मल्लेश्वरी ने चीन में विश्व चैंपियनशिप में 113 किग्रा का रिकॉर्ड भार उठाया। तब तक, उन्होंने 11 स्वर्ण पदक सहित 29 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीत लिए थे। उनकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सफलता को अर्जुन पुरस्कार और राजीव गांधी खेल रत्न जैसे कई पुरस्कारों से पहचाना गया।
2000 के सिडनी ओलंपिक में, मल्लेश्वरी ने कुल 240 किग्रा का भार उठाया- "स्नैच" श्रेणी में 110 किग्रा और "क्लीन एंड जर्क" श्रेणी में 130 किग्रा। इस उपलब्धि ने उन्हें कांस्य पदक दिलाया, जिससे वह ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं। यह उन खेलों में भारत का एकमात्र पदक भी था।
मल्लेश्वरी का जन्म चंडीगढ़ में एक पंजाबी परिवार में हुआ था और उनकी चार बहनें हैं। उन्होंने 12 साल की उम्र में कोच नीलमशेट्टी अप्पन्ना के नेतृत्व में भारोत्तोलन की शुरुआत की। उनकी क्षमता को पहचानते हुए, वे बेहतर प्रशिक्षण के लिए दिल्ली चली गईं और 1990 में राष्ट्रीय शिविर में शामिल हो गईं। चार साल बाद, वह भारोत्तोलन में विश्व चैंपियन बन गईं।
1997 में, मल्लेश्वरी का विवाह साथी भारोत्तोलक राजेश त्यागी से हुआ। उनका एक बेटा है जो 2001 में पैदा हुआ था। हालांकि उन्होंने 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में प्रतिस्पर्धा में वापसी करने की योजना बनाई थी, लेकिन अपने पिता के निधन के कारण उन्होंने वापस ले लिया। 2004 के ओलंपिक में स्कोर नहीं करने के बाद वह सेवानिवृत्त हो गईं।
वर्तमान में, मल्लेश्वरी अपने परिवार के साथ हरियाणा के यमुनानगर में रहती हैं। वह भारतीय खाद्य निगम में मुख्य महाप्रबंधक (सामान्य प्रशासन) के रूप में काम करती हैं। जून 2021 में, दिल्ली सरकार द्वारा उन्हें खेल विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था।
मल्लेश्वरी के खेलों में योगदान को व्यापक रूप से मान्यता मिली है। उन्हें भारोत्तोलन में उपलब्धियों के लिए 1994 में अर्जुन पुरस्कार मिला। 1999 में, उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उनकी विरासत आज भी भारत भर के कई युवा एथलीटों को प्रेरित करती रहती है। खेल विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में, उनका लक्ष्य भविष्य के खेल प्रतिभाओं को पोषित करना और भारत की खेल सफलता में योगदान देना है।