भोपाल के भारत हैवी इलेक्ट्रीकल (भेल) के खाली पड़े मकान में रहकर जीवन चलाने वाले छह से 14 साल तक के चार बच्चों ने पहले तो अपनी बीमार मां राजकुमारी के इलाज की हर संभव कोशिश की। उन्होंने इसके लिए दूसरों के घरों में जाकर बर्तन साफ किए और दीगर काम भी किया। इसके बाद भी वे अपनी मां को नहीं बचा पाए और आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने मकान के बाहर की जगह में मां की लाश को दफनाना बेहतर समझा। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि अंतिम संस्कार के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे।
राजकुमारी ने पिछले कुछ समय पहले पिपलानी के डी सेक्टर स्थित एक खाली मकान में डेरा डाल दिया था। उसका पति राजू साथ छोड़ चुका था और तीन बेटी रानी (14 वर्ष), वर्षा (7 वर्ष), शालू (6 वर्ष) तथा एक बेटा सुनील (12 वर्ष) की उस पर जिम्मेदारी थी। राजकुमारी की तबियत बिगड़ी तो नन्हे बच्चों को काम का बोझ ढोना पड़ा।
ये नादान बच्चे अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी जब अपनी मां की जान नहीं बचा पाए और उन्हें अंतिम संस्कार के लिए भी आर्थिक तंगी नजर आई तो उन्होंने मिल जुलकर घर के बाहर ही छोटा सा गड्ढा खोदकर मां की लाश को दफन कर दिया। यह राज तो बुधवार को तब खुला जब लाश के फूलने पर चेहरा बाहर निकल आया और बदबू फैलने लगी।
गोविन्दपुरा क्षेत्र के नगर पुलिस अधीक्षक एच़ एऩ गुरु ने गुरुवार को आईएएनएस को बताया है कि बुधवार को पुलिस को एक महिला की लाश दफन होने की खबर मिली, लाश राजकुमारी की पाई गई जिसकी मौत बीमारी के चलते हुई थी और उसकी लाश को बच्चों ने ही दफनाया था। बच्चों ने मां की लाश को इसलिए दफनाया था ताकि किसी को भी उसकी मौत की खबर न हो। गुरु मानते है कि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन अगर बच्चे अपनी मां की मौत की खबर पड़ोसियों को देते तो ऐसा संभव नहीं था कि कोई अंतिम संस्कार के लिए मदद करने आगे नहीं आता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।