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'देखे हुए उनको बहुत दिन गुजर गए' (3 दिसम्बर, मेजर ध्यान चंद की पुण्यतिथि पर विशेष)

नई दिल्ली, 2 दिसम्बर (आईएएनएस)। 'हॉकी के जादूगर' मेजर ध्यान चंद, जिन्हें लोग प्यार से दद्दा कहकर पुकारते थे, को हमसे विदा हुए 31 वर्ष बीत चुके हैं। आज भारतीय हॉकी की जो दशा है, उसे देखते हुए 'दद्दा' का नहीं होना बहुत खलता है लेकिन भारतीय हॉकी को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाने वाले दद्दा के परिवार को इस बात का मलाल है कि उन्हें जीवित रहते हुए वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वह वाकई हकदार थे।

मेजर ध्यान चंद ने तीन दिसम्बर, 1979 को अंतिम सांस ली थी। उनके परिवार ने देश को सात ओलम्पिक पदक दिए लेकिन इसके बावजूद झांसी के इस परिवार को देश ने अपेक्षित सम्मान नहीं दिया। दद्दा के पिता समेश्वर दत्त सिंह सेना के लिए हॉकी खेला करते थे। उनके भाई रूप सिंह 1932 और 1936 ओलम्पिक में स्वर्ण जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य थे। दद्दा के पुत्र अशोक कुमार सिंह ने 1975 विश्व कप में भारतीय टीम की जीत में एकमात्र गोल किया था।

मेजर ध्यान चंद की 31वीं पुण्यतिथि पर उनके पुत्र अशोक कुमार ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह सच है कि जीवित रहते हुए देश ने दद्दा को अपेक्षित सम्मान नहीं दिया लेकिन असल में दद्दा ने कभी इसकी अपेक्षा भी नहीं की। वह कहा करते थे कि मांगने से मिले तो क्या बात है, जो बिना मांगे मिले उसमें असल मजा है।

दद्दा की बातों में शायरी की झलक मिलती थी। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। कुश्ती उन्हें पसंद थी और गामा उनके पसंदीदा पहलवान थे लेकिन वह खुद कभी अखाड़े में नहीं उतरे। फुर्सत के क्षणों में वह शायरी किया करते थे। उन्होंने एक बार लिखा था-'बेचैनी हो रही है, तरसी हुई हैं निगाहें-देखे हुए उनको बहुत दिन गुजर गए'। इस शेर के माध्यम से दद्दा ने शायद दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि हॉकी की मौजूदा स्थिति देखते हुए आने वाले दिनों में लोगों को उनकी वाकई बहुत याद आएगी।

दद्दा सेना में मेजर थे और एक सैनिक होने के कारण उनके अंदर गजब का रौब था। वह जमीन से जुड़े थे। देशभक्ति और आत्मसम्मान उनके लिए सब कुछ थे। इसी आत्मसम्मान के कारण पूरा जीवन हॉकी को देने के बावजूद दद्दा ने सरकार या फेडरेशन से कुछ नहीं मांगा।

अशोक कुमार कहते हैं, "मांगना उन्हें आता नहीं था और जैसा कि हम जानते हैं सरकार उसे ही देती है, जो मांगता है। इस कारण हमारे परिवार को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। दद्दा का यह गुण मेरे अंदर भी आया और इस कारण मेरे परिवार को भी काफी कुछ भुगतना पड़ा। दद्दा को वह सम्मान देश ने नहीं दिया, जिसके वह हकदार थे। और फिर जीवित रहते हुए तो उन्हें बिल्कुल भी सम्मान नहीं मिला।"

"1936 ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद कप्तान के तौर पर जब दद्दा हिटलर से मिले थे तो उसने मजाक में उनकी हॉकी स्टिक की जांच की थी। यह पूरी दुनिया जानती है। साथ ही हिटलर ने दद्दा को जर्मन सेना में उच्च पद देने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने यह कहते हुए उसे सम्मानपूर्वक ठुकरा दिया था कि वह अपने देश की सेना में उच्च पद पर पहुंचकर ज्यादा सम्मानित महसूस करेंगे। हिटलर से लेकर अंग्रेजों तक ने उन्हें जितना सम्मान दिया, वह न तो उन्हें भारतीय सेना ने दिया और न ही भारत सरकार ने लेकिन उन्हें इसका कभी मलाल नहीं रहा।"

अशोक कुमार मानते हैं कि 1980 तक जो भारतीय हॉकी का स्वर्णिम दौर रहा है, उसमें दद्दा और उनके साथियों द्वारा हासिल की गई सफलताओं को काफी श्रेय जाता है। बकौल अशोक, "1948, 1952, 1956 से लेकर 1975 और 1980 तक भारतीय हॉकी पर दद्दा और उनके साथियों के खेल का असर रहा। 1980 और 1990 के बाद हमें मजबूरन यूरोपीय शैली अपनानी पड़ी लेकिन मेरा मानना है कि उकी जो शैली थी, वह ज्यादा कारगर थी क्योंकि उसमें एक खिलाड़ी अपने बूते सीखता था। बाद के दौर में एक खिलाड़ी के अंदर खुद से सीखने की ललक समाप्त हो गई और उसकी जगह कोच ने ले ली। मोहम्मद शाहिद और यहां तक की काफी हद तक धनराज पिल्लै ने दद्दा की शैली का अनुकरण किया और सफलता पाई। शाहिद को मैं दद्दा का सबसे बड़ा 'फॉलोअर' मानता हूं।"

भारतीय हॉकी में आज के दौर के बारे में पूछे जाने पर अशोक ने कहा कि हमारी हॉकी दिशाहीन है। हम यह कहने की स्थिति में भी नहीं हैं कि हम कहां जा रहे हैं। अशोक ने कहा, "हमारे प्रदर्शन में निरंतरता का अभाव है। तमाम सुविधाएं होने के बावजूद हम मलेशिया जैसी टीम से हारकर (एशियाई खेलों में) अपनी मुसीबत बढ़ा लेते हैं। अब हमारे सामने ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने की मुसीबत खड़ी हो गई है। विश्व कप में हम बेहद खराब खेले और राष्ट्रमंडल खेलों में रजत जीतकर खुश हुए लेकिन हमें यह सोचना होगा कि क्या हम वाकई इससे खुश हैं? क्या इसी के जरिए हम अपना खोया गौरव हासिल करने की बात करते रहते हैं? मैं आज के हालात से बेहद निराश हूं और अगर दद्दा होते तो शायद उनकी आंखें भर आतीं।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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Story first published: Thursday, December 2, 2010, 16:00 [IST]
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