खोया गौरव पाना है तो दद्दा की तरह आक्रामक होना होगा : धनराज
नई दिल्ली, 2 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारतीय हॉकी को अगर अपना खोया गौरव हासिल करना है तो हमारे खिलाड़ियों को हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यान चंद की तरह आक्रामक खेल दिखाना होगा। यह कहना है भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान धनराज पिल्ले का जिन्हें दद्दा नाम से मशहूर ध्यान चंद के पुत्र अशोक कुमार शैली के मामले में अपने पिता के काफी करीब पाते हैं।
दद्दा की 31वीं पुण्यतिथि (3 दिसम्बर) पर धनराज ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह अशोक जी का बड़प्पन है कि उन्होंने उनका नाम दद्दा के करीब रखा लेकिन सच्चाई यह है कि वह या कोई और खिलाड़ी दद्दा के पैरों की धूल भी नहीं है। धनराज ने हालांकि यह माना कि उन्होंने हमेशा दद्दा की तरह आक्रामक हॉकी खेलने का प्रयास किया क्योंकि इसी की बदौलत भारत ने विश्व हॉकी में अपना स्वर्णिम युग जिया है।
धनराज ने कहा, "जिस इंसान के सम्मान में हिटलर पोडियम से उतर सकता है, उसकी तुलना किसी और से करना बेमानी है। मैं दद्दा को हॉकी का भगवान मानता हूं और भगवान की किसी से तुलना नहीं की जाती। यह दद्दा के खेल का ही तेज है कि मोहम्मद शाहिद, जफर इकबाल और मेरे जैसे न जाने कितने खिलाड़ियों ने देश की सेवा की। मैंने हमेशा माना है कि मैदान में आक्रामक हॉकी खेलने से ही जीत मिलती है। दद्दा भी यही मानते थे। हमने यह गुण दद्दा से ही सीखा है।"
"यह हमारा दुर्भाग्य है कि आज हमारी टीम इसके विपरीत शैली में खेलती है। भारतीय पाले से गेंद छूटने के बाद कई मिनट तक डिफेंडरों और मिडफील्डरों के बीच ही घूमती रहती है। हम भारतीय और यूरोपीय शैली के बीच भटक कर रह गए हैं। यह विदेशी कोचों की देन है। हमें अपने अतीत में लौटना होगा और कम से कम वहां से यह सीखना होगा कि दद्दा ने कभी भी गेंद को विपक्षी पाले से अपने मिडफील्डर को नहीं लौटाई। उन्होंने हमेशा उस पर गोल करने का प्रयास किया है।"
धनराज ने स्पेनी मूल के कोच जोस ब्रासा के स्वदेश वापसी पर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा, "ब्रासा ने डेढ़ साल में भारतीय हॉकी का सर्वनाश कर दिया। अगर हम पदक को खेल में बेहतरी का आधार मानते हैं तो यह हमारी भूल है। हमें यह देखना है कि हमारे पास आज कितने खिलाड़ी हैं, जिनकी गिनती विश्व स्तर पर होती है। गगन अजीत सिंह के बाद आज संदीप सिंह ही है जिसे दुनिया जानती है। गगन अजीत और संदीप किसी विदेशी कोच की देन नहीं बल्कि भारतीय कोचों की देन हैं। संदीप को हरेंद्र ने देश सेवा के लिए तैयार किया है, तो क्या हरेंद्र बाकी खिलाड़ियों को तैयार नहीं कर सकता। ऐसे में हमें भला ब्रासा जैसे विदेशी की क्या जरूरत है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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