कोहली, पुजारा, रहाणे से आगे सोचना ही भविष्य है, भारत के लिए टेस्ट ट्रांजिशन का समय
नई दिल्लीः क्रिकेट में कभी ना कभी किसी टीम के सामने ऐसा दौर आता है जब उसके पास एक ही समय में कई सारे तगड़े खिलाड़ी मौजूद रहते हैं। लेकिन समय बड़ा बलवान है क्योंकि अगले ही क्षण आपके पास कुछ भी नहीं होता, इसलिए हर दौर को समझते हुए तैयारियां अहम हैं। इस बात को विंडीज से बेहतर कौन समझ सकता है जिसकी एक समय तूती दुनिया के क्रिकेट में बोलती थी लेकिन उन लोगों को अगली पीढ़ी में इतने साधारण खिलाड़ी मिले कि कैरेबियाई क्रिकेट धीरे-धीरे पटरी से उतर गया। आज वेस्टइंडीज की हालत 90 के दशक से भी बुरी है। यह टीम टेस्ट मैचों में फिसड्डी बनकर रह गई है।
अगर आप भारतीय टीम पर गौर करेंगे तो पाएंगे यहां पर भी अधिककर बड़े खिलाड़ी की उम्र 30 पार जा चुकी है और वे अधिक समय नेशनल लेवल तक क्रिकेट में देश को सेवाए नहीं दे पाएंगे।

ये अब ट्रांजिशन को सही तरह से लागू करने का टाइम है-
ऐसे में समझदार लोग ट्रांजिशन की प्रकिया पर ध्यान देते हैं। ट्रांजिशन, यानी की एक दौर से दूसरे दौरे में स्मूद तरीके से निकल जाना। यह सबसे चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है क्योंकि बहुत ही कम मौके ऐसे आए हैं जब कोई टीम सफलतापूर्वक ट्रांजिशन के दौर से गुजर गई हो। आप ऑस्ट्रेलिया को ही ले लीजिए जिन्होंने 90 और 2000 के दशक में राज किया और फिर अचानक जबरदस्त गिरावट आ गई। हैंसी क्रोनिए की साउथ अफ्रीका के साथ यही हुआ था। हालांकि भारतीय टीम ने 2000 के दशक से अब तक बेहतरीन ट्रांजिशन दिखाया है। अब एक बार फिर से इसी प्रक्रिया पर टीम इंडिया को गौर करने की जरूरत है।
हर देश आमतौर पर वनडे और टी20 वर्ल्ड कप को ध्यान में रखते हुए एक टीम की योजना बनाता है। भारतीय टीम अब एक ऐसी स्थिति में आ गई है जहां वह उन खिलाड़ियों की पहचान करना चाहती है जो अगले दो साल के डब्ल्यूटीसी चक्र के अंत में टीम के पास हो सकते हैं।
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हमें टेस्ट क्रिकेट में खिलाड़ियों का पूल बनाने पर काम करना होगा-
भारत के कप्तान विराट कोहली ने बुधवार को डब्ल्यूटीसी फाइनल में हारने के बाद ट्रांजिशन के बारे में बात की थी। साउथेम्प्टन में उन्होंने कहा, "हम अपनी टीम को मजबूत करने के लिए आवश्यक चीजों पर फिर से मूल्यांकन और बातचीत करना जारी रखेंगे। हमें यह समझने की जरूरत है कि टीम के लिए क्या चीज काम करती है, फिर हमें सही लोगों को सही मानसिकता के साथ टीम में लाना है।"
कोहली ने यह भी चेतावनी दी कि कोई ये ना समझे एक निश्चित पैटर्न पर ही टीम चलती रहेगी। 2012 में जब भारत के फेमस टेस्ट मीडिल ऑर्डर ने टीम को छोड़ दिया तब से कोहली, चेतेश्वर पुजारा और अजिंक्य रहाणे मुख्य आधार रहे हैं।

कोहली, पुजारा, रहाणे से आगे सोचना ही भविष्य है-
यहां पर टीम को यह भी देखना होगा कि क्या हमें चेतेश्वर पुजारा जैसे खिलाड़ी की वास्तव में जरूरत है। चेतेश्वर पुजारा ने पिछले 18 टेस्ट मैचों में कोई भी शतक नहीं लगाया है और रहाणे भी इस दौरान कभी चले हैं और कभी फ्लॉप हुए हैं। ऐसी स्थिति में टीम मैनेजमेंट युवा खिलाड़ियों को मौका देना चाहेगा। चेतेश्वर पुजारा का धीमा स्ट्राइक रेट एक बड़ी चिंता का विषय रहा है क्योंकि परिस्थितियां कैसी भी हो लेकिन पुजारा के खेल में धीमापन ही बरकरार रहता है। कई बार मुश्किल हालातों में अटैक ही बेस्ट डिफेंस होता है लेकिन चेतेश्वर पुजारा ने जरूरत से ज्यादा टुक-टुक करके करके टीम को बैकफुट पर धकेला है।
समस्या यह है कि पुजारा कईं गेंदे खेलने के बाद भी सस्ते में आउट हो जाते हैं जबकि धीमे बल्लेबाजों से यही अपेक्षा की जाती है कि वह जो गेंद बर्बाद करते हैं बाद में रन बनाकर टीम को भरपाई भी दें लेकिन पुजारा के साथ कई बार ऐसा नहीं होता। हम यह नहीं कहते कि टीम को ऐसे बल्लेबाजों की जरूरत है जो आते ही गेंदबाजी आक्रमण पर टूट पड़े बल्कि आशय यह है कि हर 7-8 गेंद पर टेस्ट मैचों में स्ट्राइक का बदलना सही होता है। आप देख सकते हैं चेतेश्वर पुजारा ने पहली पारी में अपना खाता खोलने में ही 35 गेंद ले ली थी।
विराट कोहली भी साउथहैंपटन जैसी मुश्किल परिस्थितियों में विपक्षी खेमे के गेंदबाजों में खलबली मचाने में नाकाम रहते हैं। भारत उनसे उम्मीद करता है कि वह विरोधी गेंदबाजों की लाइन और लेंथ सेट ना होने दें पर अहम मौकों पर पिछले कुछ समय से कोहली के बल्ले ने निराश ही किया है। इसके अलावा विराट कोहली ने इस बात की भी जरूरत समझी है कि टेस्ट क्रिकेट में भी उतनी ही डेप्थ होनी चाहिए जितनी भारतीय सफेद गेंद क्रिकेट टीम में है।

टेस्ट में डेप्थ यानी मीडिल ऑर्डर में धांसू बल्लेबाजों को तराशना है-
अब भारतीय टीम की चुनौती टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजों का एक पुल तैयार करना है क्योंकि हनुमा विहारी को छोड़कर अधिकतर खिलाड़ियों का पूल ओपनिंग का काम करता है। पृथ्वी शा, मयंक अग्रवाल, देवदत्त पडिकल, यहां तक कि केएल राहुल भी अधिकतर ओपनिंग में ही आते हैं। शुभमन गिल भी ओपनिंग कर रहे हैं। टेस्ट क्रिकेट में खिलाड़ियों को तैयार करना चैलेंजिंग इसलिए भी है क्योंकि भारतीय टीम सीमित ओवरों के क्रिकेट की तुलना में टेस्ट मैच काफी कम खेलती है। भारत आमतौर पर 10 के करीब टेस्ट मैच खेलता है और ऐसे में टीम को उन्ही पुराने खिलाड़ियों के साथ बने रहना पड़ता है जबकि प्रयोग करने का सिलसिला सफेद गेंद क्रिकेट में जारी रहता है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार भारत के पूर्व विकेटकीपर दीप दासगुप्ता का नजरिया यह है की, हमें अपने रिसोर्स को सही तरीके से आजमाने की जरूरत होगी। अगर हमारे पास ओपनिंग बल्लेबाज ज्यादा है तो हमें अपने बैटिंग ऑर्डर को उपर नीचे करना होगा ताकि शुभमन गिल और केएल राहुल जैसे बल्लेबाजों को मध्यक्रम में कहीं फिट किया जा सके।
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