
बजरंग के पैर पर टेप बंधी थी-
बजरंग पुनिया का पहला मैच उतना प्रभावी नहीं था जहां वे केवल तकनीकी आधार पर जीतने में सफल रहे थे। फिर क्वार्टर फाइनल में एक अच्छा मुकाबला हुआ और वह सेमीफाइनल तक पहुंच गए लेकिन यहां से आगे नहीं बढ़ पाए। ऐसे में भारत की गोल्ड की बड़ी उम्मीद तो यहीं पर ही खत्म हो गई थी लेकिन ब्रोंज मेडल की आस अभी बाकी थी और बजरंग पुनिया के लिए यह जी जान लड़ा देने का अवसर था।
जब ब्रोंज मेडल का मुकाबला हुआ तो बजरंग की टांग पर कोई टेप नहीं बंधी थी। इस मैच में उन्होंने कजाकिस्तान के 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप सिल्वर मेडलिस्ट को 8-0 से हराया। बजरंग इस मैच में ऐसे उतरे मानों उनको कोई नहीं हरा सकता और वे शुरू से लेकर आखिर तक विपक्षी पर भारी रहे। इस मैच को देखने के बाद साफ लगा कहीं ना कहीं सेमीफाइनल का दिन बजरंग का नहीं था वरना भारत का शायद गोल्ड मेडल भी पक्का था।
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कांस्य पदक मैच में वह टेप हटा दी-
बजरंग 'आज तक' से बात करते हुए बताते हैं, "जब मैं पहले दिन रेसलिंग में उतरा तो मेरी मेरी मूवमेंट्स ठीक से नहीं हो रही थी और इसका कारण टेप थी जो मेरे मेरी टांगों पर बंधी थी। मुझे फिजियो ने कहा था कि मुझे उनको बांध कर रखना है। लेकिन जब अगले दिन मैडल का मैच हुआ तो मैंने तय कर लिया कि कोई टेप नहीं बांधूगा। दरअसल ये पहली बार था जब मुझे इस तरह से खेलना पड़ रहा था क्योंकि मैं इससे पहले कभी किसी प्रतियोगिता में चोटिल हुआ ही नहीं हूं।
"अब डॉक्टर ने मुझे कहा कि इसको बांधना होगा तो मैंने कहा था कि वह बात तो ठीक है, लेकिन ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाएगा कि मैं अपना पैर तोड़ लूंगा और मुझे शायद सर्जरी की जरूरत पड़ जाएगी लेकिन मैं इसमें भी ठीक हूं अगर मेरे पैर में फ्रैक्चर हो जाए और मुझे सर्जरी करवानी पड़ जाए लेकिन मेडल से जरूरी कुछ नहीं है। मेडल ही सबसे महत्वपूर्ण चीज है। मैं मेडल जीतना चाहता था क्योंकि उसके लिए मैंने कठिन मेहनत की थी।"

ओलंपिक से पहले घुटना चोटिल कर लिया था-
बजरंग पुनिया ने ओलंपिक से पहले रूस में हुए टूर्नामेंट के सेमीफाइनल मुकाबले में अपने दाहिने घुटने को चोटिल कर लिया था और यह बात जून की है। ओलंपिक में ये चोट पुनिया के लिए खतरनाक साबित हो सकती थी और वह कहते हैं कि वे नर्वस भी थे। वे बताते हैं ऐसे कई भारतीय एथलीट हैं जो अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाए क्योंकि दबाव होता है।
उन्होंने कहा, "मैंने पूरी कोशिश की कि दबाव न लूं। हालांकि एक मौका ऐसा भी आया जब मुझे पता नहीं चला क्या हो रहा है और शायद मैंने दबाव ले लिया। तब मैंने निश्चय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए अब प्रेशर नहीं लूंगा। हालांकि उनके दिमाग में मेडल लाने का प्रेशर नहीं था, बल्कि यह चोट थी जो दिमाग में थी। वे कहते हैं कि 65 किलोग्राम का भार वर्ग दुनिया में सबसे ज्यादा कॉम्पिटेटिव है लेकिन फिर भी उन्होंने ऐसा नहीं सोचा कि वह मेडल नहीं ला सकते। पुनिया कहते हैं, "65 किलोग्राम में कोई भी साफ तौर पर दावेदार नहीं होता। इसके अलावा हर कैटेगरी में कोई ना कोई दावेदार होता है लेकिन 65 किलोग्राम कैटेगरी में ऐसा मामला नहीं मिलता।"


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