तीन से सात अगस्त तक अमरीका में तीरंदाज़ी विश्व कप स्टेज थ्री का आयोजन हुआ जहाँ टीम रिकर्व वर्ग में डोला बनर्जी, बोम्बेला देवी और दीपिका कुमारी की भारतीय टीम ने रजत पदक जीता. ये पहला मौका है जब भारतीय टीम फ़ाइनल में पहुँची और रजत पदक जीता.
भारतीय टीम ने सेमीफ़ाइनल में चीन को हराया लेकिन फ़ाइनल में वो कोरिया से हार गई. डोला बनर्जी ने बीबीसी को बताया कि ये अनुभव बहुत ही बढ़िया रहा और इसका फ़ायदा आने वाले राष्ट्रमंडल खेलों में मिलेगा. डोला कहती हैं, "इस जीत से हमारे आत्मविश्वास पर ज़रुर असर पड़ेगा क्योंकि हमने चीन जैसी विश्वस्तरीय टीम को हराया है. चीन और कोरिया राष्ट्रमंडल का हिस्सा नहीं हैं. ऐसी टीमों को हराने का फ़ायदा हमें राष्ट्रमंडल खेलों में मिलेगा क्योंकि इन खेलों में टक्कर इंग्लैंड, न्यूज़ीलैंड, मलेशिया जैसे देशों से हैं जो चीन और कोरिया के मुक़ाबले कम स्कोर करते हैं."
सुनिए डोला बनर्जी की तैयारियों के बारे में
अब डोला की नज़र इकत्तीस अगस्त से शंघाई में शुरु हो रहे विश्व कप स्टेज फ़ोर पर है. वह कहती हैं कि अगर शंघाई में भी वो ख़ुद और टीम अपना प्रदर्शन बरक़रार रख पाए तो इसका फ़ायदा अक्तूबर में राष्ट्रमंडल खेलों में ज़रुर मिलेगा. लेकिन तैयारियों के लिए ज़रुरी उपकरण और बाकी सुविधाएँ अब भी पूरी तरह से इन खिलाड़ियों की पहुँच से बाहर हैं.
डोला कहती हैं कि पहले खेल के उपकरणों की गुणवत्ता को लेकर दिक्कतें थीं लेकिन अब उन्हें भी विश्व स्तरीय उपकरण मिलते हैं. लेकिन वो कहती हैं कि तीर और धनुष अब भी ज़रुरत के हिसाब से कम हैं. जहाँ साल में तीन से चार दर्जन तीरों की ज़रुरत होती है, वहाँ सिर्फ़ एक दर्जन ही मिलते हैं.
इस सब के बावजूद डोला को उम्मीद है कि कुल आठ में से भारत कम से कम चार स्वर्ण पदक जीतेगा. भारतीय टीम के कोच लिम्बा राम को भी डोला बनर्जी से बहुत उम्मीदें हैं. वो कहते हैं, "डोला बनर्जी में आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा है. मुझे विश्वास है कि 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में वो ज़रुर स्वर्ण पदक जीतेंगी."
लिम्बा राम इन खेलों के लिए चल रही तैयारियों से भी संतुष्ट हैं. वो मानते हैं कि शारीरिक प्रशिक्षण के साथ ही मानसिक प्रशिक्षण भी ज़रुरी है. वो कहते हैं, "मानसिक प्रशिक्षण के लिए खिला़ड़ी अमेज़ोनियन शूटिंग और योग करते हैं. लेकिन अब हमारा ध्यान शारीरिक प्रशिक्षण पर ज़्यादा है ताकि उनका निशाना ज़्यादा से ज़्यादा बेहतर हो सके."
टीम की एक और सदस्य बोम्बेला देवी कहती हैं कि उन्हें कोच के साथ ही डोला बनर्जी जैसी वरिष्ठ खिलाड़ी से भी मदद मिल रही है. बोम्बेला देवी कहती हैं, "डोला तो हमसे बहुत सीनियर हैं और ज़्यादा अनुभव है. वो अपने अनुभव हमारे साथ बाँटती हैं."
1982 में ब्रिस्बेन के बाद ये दूसरा मौका है जब तीरंदाज़ी को राष्ट्रमंडल खेलों में शामिल किया गया है. कोलकाता के क़रीब बड़ानगर में दो जून 1980 को पैदा हुई डोला बनर्जी ने तीरंदाज़ी में नौ साल की उम्र में क़दम रखा. उनके घर के सामने बड़ानगर आर्चरी क्लब था जहाँ उनके माता-पिता उन्हें रोज़ खेलने के लिए लेकर जाते थे.
वहाँ के कोच ने डोला के माता-पिता को सलाह दी कि वे अपनी बेटी को तीरंदाज़ी सिखाएं. शुरुआत में तो डोला को रूटीन और प्रशिक्षण की नियमितता उबाऊ लगी लेकिन 1990 से पहले राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर पर पदक मिलने के साथ ही उनमें खेल के प्रति लगाव बढ़ने लगा.
डोला बनर्जी का परिचय
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1996 में डोला ने जूनियर विश्व कप में हिस्सा लिया. उसके बाद उन्होंने विभिन्न एशियाई चैंपियनशिप, एशियन गेम्स, विश्व कप और ओलंपिक खेलों में भाग लिया और पदक भी जीते. डोला बनर्जी ने 2007 में डोवर में विश्व कप में रिकर्व व्यक्तिगत वर्ग में पहला स्थान हासिल किया.
उसी साल दुबई में वो विश्व कप के फ़ाइनल में स्वर्ण पदक जीतकर विश्व चैंपियन बनीं. डोला बनर्जी अर्जुन पुरस्कार पाने वाली पहली महिला तीरंदाज़ हैं.