गोलकीपर सविता पुनिया के पिता ने कहा, 'उन लड़कों के मुंह पर तमाचा है मेरी बेटी का प्रदर्शन'
नई दिल्लीः भारतीय महिला हॉकी टीम की गोलकीपर सविता पूनिया ने कांस्य पदक मुकाबले में ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ कई शानदार बचाव किए। वे किसी दीवार की तरह भारतीय गोल और ब्रिटेन की अटैकिंग टीम के बीच में खड़ी रही। भारत बहुत ही मेहनत से लड़ा हुआ यह मैच 3-4 से हार गया तो सविता की आंखों में आंसू थे। भारतीय महिला हॉकी टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए अंतिम क्षणों तक ग्रेट ब्रिटेन को चैन की सांस नहीं लेने दी। आपको बता दें ग्रेट ब्रिटेन वही टीम है जिसने रियो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता था।

सविता पुनिया- महिला हॉकी की 'दीवार'
भारतीय गोलकीपर ने कम से कम एक दर्जन के करीब बचाव किए होंगे, लेकिन यह महिला टीम के लिए पहला मेडल दिलाने के लिए काफी नहीं था। हरियाणा के सिरसा से आने वाली सविता 31 साल की हैं और इस समय दुनिया की सबसे बेहतरीन गोलकीपर में एक हैं, उनकी यात्रा अविश्वसनीय है।
सविता से पहले उनके परिवार में किसी ने भी खेल में कैरियर नहीं बनाया था। यह सब तब शुरू हुआ जब सविता के दादाजी रंजीत पुनिया ने दिल्ली में एक हॉकी मैच देखा और तुरंत ही उनको यह खेल पसंद आ गया। जब वे अपने गांव वापस पहुंचे तो उन्होंने पोती को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। इंडिया टुडे के साथ एक इंटरव्यू में सविता के पिता मोहिंदर पूनिया बताते हैं शुरुआत में कविता को हॉकी पसंद नहीं थी क्योंकि बहुत ज्यादा यात्राएं करनी पड़ती थी।
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बड़ी परेशानी झेलकर हॉकी सीखी-
वे कहते हैं, "हमारे घर से एकेडमी के लिए आना जाना इतना आसान नहीं था। सविता को अपने गांव से 30 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी। तब जाकर सिरसा कस्बे में हफ्ते में छह बार अपनी हॉकी की प्रैक्टिस कर पाती थी।" उनके गांव के पास सबसे करीब में यही जगह मौजूद थी जहां पर हॉकी के लिए सुविधाएं थी और हॉकी कोच भी था, और यह जगह थी सिरसा में महाराजा अग्रसेन गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल।
मोहिंदर याद करते हैं, "सविता को बस में कंडक्टर किट बैग ले जाने की छूट नहीं देता था और वह कहता था अपने किट बैग को बस की छत पर रख दीजिए लेकिन कविता अपने सामान को लेकर बहुत सचेत थी। कई बार तो ऐसा हुआ कि उसको अपने किट बैग के चलते बस की छत पर ही यात्रा करनी पड़ी।"

शुरुआती दौर में बस में छेड़ते थे लड़के-
भारतीय गांव क्षेत्रों में नियमित तौर पर यात्रा करने के दौरान लड़कियों को छेड़ने की घटनाएं दिल दुखाती है और सविता ने भी इस चीज को झेला है। अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने अपने पिता से शिकायत भी की थी कि पापा बस में लड़के छेड़ते हैं। लेकिन इस चीज ने सविता को और मजबूत ही बनाया। उनके पिता कहते हैं, "मेरी बेटी का देश के लिए परफॉर्मेंस उन लड़कों के मुंह पर एक थप्पड़ है।"
2007 में सविता को पहली बार लखनऊ में नेशनल कैंप में चुना गया था। फिर भारतीय टीम में उनकी कॉल 2008 में हुई। हालांकि पहला मुकाबला देश के लिए खेलने में थोड़ा इंतजार करना पड़ा क्योंकि वह 2011 में ही खेलने को मिला। 2014के एशियाड में उन्होंने बेहतरीन परफॉर्मेंस करते हुए अपना नाम बनाया और भारत को ब्रांज मेडल भी जिताया। गोल पोस्ट के पास उनकी चट्टानी परफॉर्मेंस ने भारत को हाल ही में कई यादगार जीत दिलाई है।

सविता के प्रदर्शन ने हाल में कई मैच जिताए-
2017 के एशिया कप में सविता गोलकीपर ऑफ द टूर्नामेंट रही। भारत ने 13 साल बाद चीन को हराने में कामयाबी हासिल की थी और यह कविता के दम पर ही हुआ था क्योंकि यह मुकाबला पेनल्टी शूटआउट में चला जहां टीम इंडिया को 5-4 से जीत मिली।
भारतीय हॉकी के लिए टोक्यो ओलंपिक एक वरदान के तौर पर आया है और इसने इस खेल को अपने देश में संजीवनी बूटी दी है। पुरुष हॉकी टीम की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है क्योंकि उन्होंने 41 साल बाद अपने राष्ट्रीय खेल में मेडल हासिल कर कर दिखा दिया और फिर महिला हॉकी टीम ने अपने पूरे इतिहास में पहली बार ओलंपिक के सेमीफाइनल में जगह बनाई। वे ग्रेट ब्रिटेन को टक्कर देकर मेडल के बहुत करीब पहुंच चुकी थी।

टोक्यो ओलंपिक को शुक्रिया कहना चाहेगी भारतीय हॉकी-
यह एक ऐसा प्रदर्शन है जो भारत आने वाले समय में लंबे समय तक याद रखेगा और इन खेलों में लाजवाब उपलब्धियों पर एक बेहतरीन इमारत खड़ी होनी चाहिए, जिस पर हॉकी भी उतनी ही चर्चित हो पाए जैसे कि आज क्रिकेट का डंका बजता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हॉकी में भारत ने क्रिकेट से कहीं अधिक उपलब्धियां हासिल की है और एक बार फिर से अगर यह देश अपने गौरव की ओर वापस लौटता है तो करोड़ों देशवासियों के लिए अपने इतिहास को फिर से जीने के पल आएंगे, जब जादूगर ध्यानचंद की हॉकी से सीधा गोल्ड मेडल ही निकलता था।
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