निशानेबाज़ी से है सबसे बड़ी उम्मीद
मशहूर कमेंटेटर और खेल पत्रकार जसेदव सिंह नौ ओलंपिक कवर कर चुके हैं. उनका कहना है कि इस बार निशानेबाज़ी से भारत को सबसे ज़्यादा उम्मीद है.
जब भी मैं ओलंपिक कवर करने जाता था, मुझे लगता था कि भारत पदक ज़रूर जीतेगा. इस बार शोर तो बहुत मच रहा है. दावे भी हो रहे हैं.
लेकिन मुझे सबसे अच्छा मौक़ा निशानेबाज़ी में नज़र आ रहा है. दुर्भाग्य से इस बार ओलंपिक में हॉकी तो है ही नहीं. बिना हॉकी के ओलंपिक में भारत का जाना टीम का पंगु जैसा लगता है.
मेरा अपना अनुभव है कि ओलंपिक में भारतीय हॉकी के बिना चर्चा नहीं होती. लेकिन इस बार तो बहुत ग़लत बात हो गई. लेकिन इसके ज़िम्मेदार भी तो हम ही हैं.
हॉकी में हम जीते या हारें, ओलंपिक में रहते तो थे. लेकिन इस बार तो पहली बार ऐसा हुआ कि ओलंपिक में टीम जा ही नहीं रही.
निशानेबाज़ी
जहाँ तक निशानेबाज़ी की बात है, टीम में राज्यवर्धन राठौर हैं, जिन्होंने एथेंस ओलंपिक में रजत पदक जीता था. राज्यवर्धन के अलावा दो-चार अन्य निशानेबाज़ भी अच्छा कर रहे हैं.
मानवजीत सिंह संधू से भी बीजिंग ओलंपिक में काफ़ी उम्मीदें हैं. गगन नारंग और अभिनव बिंद्रा ने भी अच्छी तैयारी की है. मेरे हिसाब से शूटिंग में तो भारत को पदक मिलना चाहिए.
एथलेटिक्स में पदक की बात तो मैं नहीं सोच रहा. टेनिस में भी बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है. हालाँकि पेस और भूपति खेल रहे हैं. सानिया भी शायद कुछ कर जाएँ.
इसके अलावा मुक्केबाज़ी में भी भारत कुछ अच्छा कर सकता है. भारोत्तोलन में भारत इस बार मज़बूत नहीं नज़र आ रहा.
मुश्किल
एथलेटिक्स में इसलिए कोई उम्मीद नहीं दिखती क्योंकि अमरीकी, यूरोपीय और अफ़्रीकी खिलाड़ियों के मुक़ाबले भारत कहीं नज़र नहीं आता.
लिएंडर पेस डबल्स में भूपति के साथ उतरेंगे
दरअसल भारत में तो खेल नीति है ही नहीं. जब भी ओलंपिक आते हैं, बड़ी-बड़ी बाते होती हैं. लेकिन बाद में सब भूल जाते हैं.
अब हॉकी की ही बात लीजिए. फेडरेशन भंग हो गई. लेकिन नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है. हमारी मुश्किल ये है कि हम खेलों में राजनीति ले आते हैं.
अगर हॉकी को सुधारना ही था तो पुराने खिलाड़ियों को ले आते. लेकिन मंत्रालय ने ओलंपियन खिलाड़ियों को लाकर यह दिखाने की कोशिश की है को ओलंपियन ही खेल को सुधार सकते हैं. ये ग़लत बात है.
जब भी मैं ओलंपिक कवर करने जाता था, मुझे लगता था कि भारत पदक ज़रूर जीतेगा. इस बार शोर तो बहुत मच रहा है. दावे भी हो रहे हैं.
लेकिन मुझे सबसे अच्छा मौक़ा निशानेबाज़ी में नज़र आ रहा है. दुर्भाग्य से इस बार ओलंपिक में हॉकी तो है ही नहीं. बिना हॉकी के ओलंपिक में भारत का जाना टीम का पंगु जैसा लगता है.
मेरा अपना अनुभव है कि ओलंपिक में भारतीय हॉकी के बिना चर्चा नहीं होती. लेकिन इस बार तो बहुत ग़लत बात हो गई. लेकिन इसके ज़िम्मेदार भी तो हम ही हैं.
हॉकी में हम जीते या हारें, ओलंपिक में रहते तो थे. लेकिन इस बार तो पहली बार ऐसा हुआ कि ओलंपिक में टीम जा ही नहीं रही.
निशानेबाज़ी
जहाँ तक निशानेबाज़ी की बात है, टीम में राज्यवर्धन राठौर हैं, जिन्होंने एथेंस ओलंपिक में रजत पदक जीता था. राज्यवर्धन के अलावा दो-चार अन्य निशानेबाज़ भी अच्छा कर रहे हैं.
मानवजीत सिंह संधू से भी बीजिंग ओलंपिक में काफ़ी उम्मीदें हैं. गगन नारंग और अभिनव बिंद्रा ने भी अच्छी तैयारी की है. मेरे हिसाब से शूटिंग में तो भारत को पदक मिलना चाहिए.
एथलेटिक्स में पदक की बात तो मैं नहीं सोच रहा. टेनिस में भी बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है. हालाँकि पेस और भूपति खेल रहे हैं. सानिया भी शायद कुछ कर जाएँ.
इसके अलावा मुक्केबाज़ी में भी भारत कुछ अच्छा कर सकता है. भारोत्तोलन में भारत इस बार मज़बूत नहीं नज़र आ रहा.
मुश्किल
एथलेटिक्स में इसलिए कोई उम्मीद नहीं दिखती क्योंकि अमरीकी, यूरोपीय और अफ़्रीकी खिलाड़ियों के मुक़ाबले भारत कहीं नज़र नहीं आता.
लिएंडर पेस डबल्स में भूपति के साथ उतरेंगे
दरअसल भारत में तो खेल नीति है ही नहीं. जब भी ओलंपिक आते हैं, बड़ी-बड़ी बाते होती हैं. लेकिन बाद में सब भूल जाते हैं.
अब हॉकी की ही बात लीजिए. फेडरेशन भंग हो गई. लेकिन नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है. हमारी मुश्किल ये है कि हम खेलों में राजनीति ले आते हैं.
अगर हॉकी को सुधारना ही था तो पुराने खिलाड़ियों को ले आते. लेकिन मंत्रालय ने ओलंपियन खिलाड़ियों को लाकर यह दिखाने की कोशिश की है को ओलंपियन ही खेल को सुधार सकते हैं. ये ग़लत बात है.
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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