हॉकी स्टार सुमित ने बताया आखिर क्या थी ओलंपिक में मिस्ट्री लॉकेट पहनने की कहानी, कैसे मेडल जीतने में हुई मदद
नई दिल्ली। जापान की राजधानी टोक्यो में खेले गये ओलंपिक खेलों में भारतीय दल ने इतिहास रचते हुए अपने 125 सालों में सबसे ज्यादा पदक हासिल किये। भारतीय दल ने न सिर्फ अपने सबसे ज्यादा पदक जीतने के रिकॉर्ड को बेहतर किया बल्कि अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी में भी 41 सालों से चले आ रहे पदक के सूखे को भी दूर किया। मनदीप सिंह की कप्तानी वाली भारतीय हॉकी टीम ने ब्रॉन्ज मेडल मैच में जर्मनी को 5-4 से हराकर पदक के सूखे को खत्म किया।
इस जीत न सिर्फ टीम को बल्कि सालों से पदक का इंतजार कर रहे भारतीय फैन्स को भी खुशी से भर दिया और पूरा देश उनकी जीत के इस जश्न को मना रहा है। इस बीच हमने भारतीय टीम के मिडफील्डर सुमित वाल्मिकी से बात की और ओलंपिक में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच उनके अनुभव को जाना।
पेश है उनसे बातचीत के अंश:

41 साल बाद मिली जीत के बाद कैसा रहा अनुभव
41 साल से चले आ रहे पदक के सूखे को खत्म करने का अनुभव कैसा रहा है और देश के बाहर खेलने पर किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
देश के लिये पदक जीतकर जो अहसास हो रहा है उसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है, बस यह समझ लीजिये की बहुत खुशी हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हर खेल का दबाव अलग होता है और जब ओलंपिक खेलते हैं तो वो सबसे ऊपरी स्तर का अनुभव होता है। पिछली बार जब हम टोक्यो गये थे तो हमें पता चला था कि यहां पर काफी गर्मी होती है, इसी का ध्यान रखते हुए हमने भारत में भी अभ्यास 12 से एक के बीच किया जिसका फायदा हमें ओलंपिक में हुआ।

फिटनेस के चलते जर्मनी के खिलाफ मिला फायदा
जर्मनी के साथ खेले गये ब्रॉन्ज मेडल मैच में आप काफी पिछड़ रहे थे लेकिन फिर टीम ने वापसी करते हुए पदक हासिल किया, तो यह बदलाव कैसे आया?
जर्मनी के खिलाफ मैच में हम 3-1 से पिछड़ रहे थे, हम लोग उस वक्त बेंच पर बैठे हुए थे और बस यही चल रहा था कि एक गोल आ जाये तो हम वापसी कर जायेंगे। हालांकि हमने 2 मिनट के अंदर 2 गोल कर दिये और बराबरी कर ली। उस वक्त लगा कि हम मैच को जीत सकते हैं। हमें एहसास हुआ कि हमने भारत में गर्मी में रहकर जो कड़ा अभ्यास किया था और फिटनेस पर काम किया था उसका हमें फायदा मिला है।

धनराज पिल्लै ने कैसे किया प्रभावित
पूर्व ओलंपियन और हॉकी स्टार धनराज पिल्लै को आप अपना आदर्श मानते हैं, आपके खेल और निजी जीवन में उनका कितना प्रभाव रहा है?
मैं बचपन से ही धनराज सर का बहुत बड़ा फैन रहा हूं। जब वो हॉकी खेलते थे तो उनके बड़े-बड़े बाल थे और उनका और मेरा रंग एक जैसा है, ऐसे में जब मैं छोटी उम्र में हॉकी खेलता था तो मेरे दोस्त मुझे कहते थे कि तू बाल बढ़ा ले एकदम धनराज लगेगा। धनराज सर ने हमेशा मेरी मदद की है और मुझे हमेशा खुलकर खेलने की सलाह दी है। उनके खेल को देखकर मैंने काफी कुछ सीखा है और जब भी उनके सामने खड़ा होता हूं तो लगता है कि मैं उन्हें अपने बचपन की कितनी कहानियां सुना सकूं। एचआईएल में भी जब मैं उनकी टीम से खेला करता था तो उन्होंने मुझे हमेशा प्रोसेस को जारी रखने की सलाह दी और कहा कि नतीजे की चिंता मत करो। आप बस प्रक्रिया पर ध्यान दो और बिना डरे खेलो, नतीजे अपने आप आयेंगे।

हार से उबरने के लिये क्या था टीम का मूल मंत्र
क्वार्टरफाइनल में जीत के बाद हम 1972 के बाद पहली बार सेमीफाइनल में पहुंचे लेकिन वहां टीम को हार मिली और फिर हमने ब्रॉन्ज मेडल मैच में कमबैक किया। इस उतार-चढ़ाव के बीच टीम की मानसिकता क्या रही और कैसे सभी ने कमबैक को लेकर काम किया।
हम जिस भी मैच में हारे हमने उसे वहीं पर छोड़ दिया, हमने एक टीम के तौर पर उस मैच को लेकर ज्यादा बात ही नहीं कि, हमें पता था कि अगर हम नतीजे को लेकर ज्यादा बात करेंगे तो आगे आने वाले मैच से पहले ही खो जायेंगे और शायद एक बार फिर पदक से दूर रह जायेंगे। हम जानते थे कि हम पिछले मैच के नतीजे को नहीं बदल सकते लेकिन क्या हम कर सकते थे और कहां हम से चूक हुई इसको याद रखते हुए अगले मैच में मेहनत की और सफलता मिल गई।

मिस्ट्री लॉकेट के पीछे की कहानी
ओलंपिक के लिये आप एक खास लॉकेट लेकर गये थे इसके पीछे की क्या कहानी है?
दरअसल मैंने अपनी मां से वादा किया था कि अगर ओलंपिक के लिये मेरा भारतीय हॉकी टीम में चयन होता है तो मैं उसे अपने साथ जरूर लेकर जाउंगा। हालांकि ऐसा हो न सका (6 महीने पहले उनकी मां का देहांत हो गया था), लेकिन मुझे उनसे किया अपना वादा याद था। मैंने अपने बड़े भाई से बात की और कहा कि मां के कान के जो झुमके हैं उन्हें तुड़वाकर एक तस्वीर वाली लॉकेट बनवा दे जिसे पहनकर मैं ओलंपिक गया। यह पदक मेरी मां के नाम है जिनकी मेहनत और त्याग का नतीजा है कि मैं देश के लिये हॉकी खेल पाया और उस टीम का हिस्सा बना जिसने देश के लिये पदक का सूखा मिटाया।
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