
1958 के राष्ट्रीयमंडल खेल
आपको बता दें कि संग्रहालय के खेल क्षेत्र में लगने वाले पुतले में मिल्खा सिंह दौड़ते हुए दिखेंगे। इस मुद्रा (पोज) को 1958 के राष्ट्रीयमंडल खेलों से लिया गया है जिसमें वह विजेता रहे थे।

मेहनत की जरूरत
मिल्खा ने कहा हर कोई मिल्खा बन सकता हैं, बस लक्ष्य पर फोकस और मेहनत की जरूरत है। मैं इस प्रतिमा के सामने यही कहना चाहता हूं कि मेहनत ही सब कुछ है।

हाथ की लकीरों से जिंदगी नहीं बनती...
एक शेर है कि हाथ की लकीरों से जिंदगी नहीं बनती, अज़म हमारा भी कुछ हिस्सा है जिंदगी बनाने में। मैंने कभी हाथ की लकीरें नहीं देखी। रोम ओलंपिक (1960) में मेडल से चूकना मुझे आज भी खलता है।

बस गोल्ड ले आए...बस
मुझे जिंदगी ने सब कुछ मिला, अब बस एक खिलाड़ी चाहिए जो देश के लिए गोल्ड ले आए। एक मेडल मेरे हाथों से ओलंपिक में छूट गया था, वह दर्द आज तक मुझे है। अगर ये ख्वाब पूरा हो जाता हैं तो कोई इच्छा बाकी नहीं रहेगी।


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