समीक्षा हो पर वफ़ा का चश्मा उतारकर
टेस्ट क्रिकेट में विवादास्पद फ़ैसलों पर बल्लेबाज़ों को आउट देने पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन ये चर्चा वफ़ादारी का चश्मा उतारकर होनी चाहिए.
यहाँ गेंदबाज़ों की भूमिका सिर्फ़ अपने हिस्से के ओवर ख़त्म करने भर तक सीमित नहीं है, बल्कि दर्शकों के बीच खेल का रोमांच बनाए रखने में भी वे अहम भूमिका निभाते हैं.
मैं जानता हूँ कि ऐसे तमाम लोग होंगे जो मेरी इन बातों से सहमत नहीं होंगे, लेकिन मैं ये भी जनता हूँ कि ऐसे खेलप्रेमियों की संख्या भी काफ़ी है जो गुणात्मक क्रिकेट को पसंद करते हैं.
टेस्ट क्रिकेट कभी भी नीरस नहीं हो सकता बशर्ते इसे ऐसे विकेटों पर खेला जाए जो गेंदबाज़ों और बल्लेबाज़ों दोनों के लिए मददगार हों.
बैंगलौर टेस्ट में अब तक का खेल रोमांचक रहा है. हालाँकि भारत फ़िलहाल बैकफुट पर है और वो भी असीमित उछाल और दिन पर दिन दरक रहे विकेट पर, जो रिवर्स स्विंग के लिए मददगार है.
इस बात पर ख़ूब चर्चा हो चुकी है कि किसने अच्छा खेला और किसने नहीं. साथ ही इस पर भी चर्चा हो चुकी है कि क्यों कप्तान अनिल कुंबले पहली पारी में एक भी विकेट नहीं चटका सके.
कई स्वतंत्र पर्यवेक्षकों ने मैदान पर अनिल कुंबले के नेतृत्व पर भी चर्चा की. यही टेस्ट क्रिकेट है. इसके कई पहलू हैं. ये रन बनाने, गेंदों का सामना करने के गणित से कहीं बढ़कर है.
किसी भी टेस्ट मैच ख़ासकर भारत और ऑस्ट्रेलिया की बीच, इसमें भी कुछ विवाद हुए हैं. अंपायरों के कुछ फैसलों पर उंगलियाँ उठी हैं.
ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में कहा गया है कि पहले दिन के कुछ फ़ैसलों को लेकर ऑस्ट्रेलियाई टीम ख़ुश नहीं है, जबकि भारतीय टीम तीसरे दिन के कुछ फ़ैसलों पर ऐतराज़ जता रही है.
विवाद
कहा जा रहा है कि अंपायरों को राहुल द्रविड़ को संदेह का लाभ देना चाहिए था. द्रविड़ कड़ी मेहनत के बाद 50 के आंकड़े के पार पहुँचे थे और अच्छा खेल रहे थे.
उनमें रनों की भूख भी दिखाई दे रही थी. ऐसे मौके पर उनका एलबीडब्ल्यू आउट होना उन्हें और उनके प्रशंसकों को खलना कोई अचरज की बात नहीं है.
कप्तान अनिल कुंबले को बंगलौर टेस्ट में पहली पारी में एक भी विकेट नहीं मिला
लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मैथ्यू हेडन और रिकी पोंटिंग को जिस तरह आउट दिया गया वो द्रविड़ के फ़ैसले से कहीं अधिक ख़राब थे.
भारतीय प्रशंसकों और मीडिया को तीखी टिप्पणियां देने से पहले इन फ़ैसलों को भी दिमाग़ में रखना चाहिए.
अगर आप ऐसे एक निर्णय की बात करते हैं तो आपको बिना ये सोचे कि किस टीम को इनसे फ़ायदा होता, सभी फ़ैसलों की समीक्षा करनी चाहिए.
ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सिरीज़ के कड़वे अनुभवों के बाद माना जा रहा था कि दोनों टीमें रेफरल सिस्टम के लिए राज़ी हो जाएँगी ताकि सिरीज़ के दौरान ख़राब अंपायरिंग बड़ा मुद्दा न बने.
यक़ीन
लेकिन श्रीलंका के खिलाफ़ टेस्ट सिरीज़ में रेफरल सिस्टम का भारत का अनुभव संतोषजनक नहीं रहा और भारत ने तय किया कि रेफरल सिस्टम के बजाय मैदानी अंपायरों पर भरोसा करना ज़्यादा अच्छा है.
ऑस्ट्रेलिया भी तीसरे अंपायर से फै़सले लेने का बहुत बड़ा समर्थक नहीं रहा है. इसलिए दोनों पक्षों की रज़ामंदी से तय हो गया कि फ़ैसलों के लिए मैदानी अंपायरों पर ही यकीन करना बेहतर है.
हमें ये याद रखना चाहिए कि खिलाड़ियों की तरह अंपायर भी ग़लती करते हैं, लेकिन अधिकांश मौक़ों पर वे सही होते हैं.
और अगर कभी फ़ैसले में ग़लती हो भी जाती है तो बेशक खिलाड़ियों के साथ सहानुभूति ज़रूर रखिए, लेकिन फ़ैसलों को वफ़ादारी के चश्में से मत देखिए.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)
यहाँ गेंदबाज़ों की भूमिका सिर्फ़ अपने हिस्से के ओवर ख़त्म करने भर तक सीमित नहीं है, बल्कि दर्शकों के बीच खेल का रोमांच बनाए रखने में भी वे अहम भूमिका निभाते हैं.
मैं जानता हूँ कि ऐसे तमाम लोग होंगे जो मेरी इन बातों से सहमत नहीं होंगे, लेकिन मैं ये भी जनता हूँ कि ऐसे खेलप्रेमियों की संख्या भी काफ़ी है जो गुणात्मक क्रिकेट को पसंद करते हैं.
टेस्ट क्रिकेट कभी भी नीरस नहीं हो सकता बशर्ते इसे ऐसे विकेटों पर खेला जाए जो गेंदबाज़ों और बल्लेबाज़ों दोनों के लिए मददगार हों.
बैंगलौर टेस्ट में अब तक का खेल रोमांचक रहा है. हालाँकि भारत फ़िलहाल बैकफुट पर है और वो भी असीमित उछाल और दिन पर दिन दरक रहे विकेट पर, जो रिवर्स स्विंग के लिए मददगार है.
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कई स्वतंत्र पर्यवेक्षकों ने मैदान पर अनिल कुंबले के नेतृत्व पर भी चर्चा की. यही टेस्ट क्रिकेट है. इसके कई पहलू हैं. ये रन बनाने, गेंदों का सामना करने के गणित से कहीं बढ़कर है.
किसी भी टेस्ट मैच ख़ासकर भारत और ऑस्ट्रेलिया की बीच, इसमें भी कुछ विवाद हुए हैं. अंपायरों के कुछ फैसलों पर उंगलियाँ उठी हैं.
ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में कहा गया है कि पहले दिन के कुछ फ़ैसलों को लेकर ऑस्ट्रेलियाई टीम ख़ुश नहीं है, जबकि भारतीय टीम तीसरे दिन के कुछ फ़ैसलों पर ऐतराज़ जता रही है.
विवाद
कहा जा रहा है कि अंपायरों को राहुल द्रविड़ को संदेह का लाभ देना चाहिए था. द्रविड़ कड़ी मेहनत के बाद 50 के आंकड़े के पार पहुँचे थे और अच्छा खेल रहे थे.
उनमें रनों की भूख भी दिखाई दे रही थी. ऐसे मौके पर उनका एलबीडब्ल्यू आउट होना उन्हें और उनके प्रशंसकों को खलना कोई अचरज की बात नहीं है.
कप्तान अनिल कुंबले को बंगलौर टेस्ट में पहली पारी में एक भी विकेट नहीं मिला
लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मैथ्यू हेडन और रिकी पोंटिंग को जिस तरह आउट दिया गया वो द्रविड़ के फ़ैसले से कहीं अधिक ख़राब थे.
भारतीय प्रशंसकों और मीडिया को तीखी टिप्पणियां देने से पहले इन फ़ैसलों को भी दिमाग़ में रखना चाहिए.
अगर आप ऐसे एक निर्णय की बात करते हैं तो आपको बिना ये सोचे कि किस टीम को इनसे फ़ायदा होता, सभी फ़ैसलों की समीक्षा करनी चाहिए.
ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सिरीज़ के कड़वे अनुभवों के बाद माना जा रहा था कि दोनों टीमें रेफरल सिस्टम के लिए राज़ी हो जाएँगी ताकि सिरीज़ के दौरान ख़राब अंपायरिंग बड़ा मुद्दा न बने.
यक़ीन
लेकिन श्रीलंका के खिलाफ़ टेस्ट सिरीज़ में रेफरल सिस्टम का भारत का अनुभव संतोषजनक नहीं रहा और भारत ने तय किया कि रेफरल सिस्टम के बजाय मैदानी अंपायरों पर भरोसा करना ज़्यादा अच्छा है.
ऑस्ट्रेलिया भी तीसरे अंपायर से फै़सले लेने का बहुत बड़ा समर्थक नहीं रहा है. इसलिए दोनों पक्षों की रज़ामंदी से तय हो गया कि फ़ैसलों के लिए मैदानी अंपायरों पर ही यकीन करना बेहतर है.
हमें ये याद रखना चाहिए कि खिलाड़ियों की तरह अंपायर भी ग़लती करते हैं, लेकिन अधिकांश मौक़ों पर वे सही होते हैं.
और अगर कभी फ़ैसले में ग़लती हो भी जाती है तो बेशक खिलाड़ियों के साथ सहानुभूति ज़रूर रखिए, लेकिन फ़ैसलों को वफ़ादारी के चश्में से मत देखिए.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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