जब ओलम्पिक के मैदान पर भारत ने लड़ी थी पाकिस्तान के खिलाफ जंग
नई दिल्ली। 1956 से 1964 के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच बेइंतहां तनाव था। खेल का मैदान भी ऐसा लगता था जैसे कि वो जंग का मैदान हो। वक्त भी शायद दोनों देशों का इम्तहान ले रहा था। ओलम्पिक हॉकी में पिछले तीन दफे से भारत और पाकिस्तान की टीमें फाइनल में पहुंच रही थीं। 1956 में भारत जीता। 1960 में पाकिस्तान ने भारत को हरा कर उसकी बादशाहत खत्म कर दी। 1964 के टोकियो ओलम्पिक के फाइनल में फिर दोनों देश आमने-सामने खड़े थे। भारत अपनी खोयी प्रतिष्ठा पाने के लिए बेचैन था। पाकिस्तान अपने खिताब (गोल्ड मेडल) को कायम रखने के दबाव से गुजर रहा था। फाइनल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों का फ्रस्ट्रेशन इतना बढ़ गया कि वे फाउल खेलने लगे। भारतीय खिलाड़ियों को चोट पहुंचाना उनकी स्ट्रेट्जी बन गयी। ऐसा लगने लगा कि अब मैदान पर ही कहीं जंग न शुरू हो जाए। रेफरी ने मजबूरन कुछ देर के लिए मैच रोक दिया। समझाने-बुझाने और चेतावनी देने पर स्थिति संभली। तनाव से भरे इस मैच को भारत ने कैसे जीता, ये एक रोमांचक कहानी है।

पाकिस्तान का फाउल प्ले
23 अक्टूबर 1964 को ओलम्पिक हॉकी का फाइनल था। फाइनल मैच के पहले आस्ट्रेलिया और स्पेन के बीच कांस्य पदक के लिए मुकाबला चल रहा था। भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी तैयार बैठे थे कि कब ये मैच खत्म हो और वे अपना मुकाबला खेल सकें। निर्धारित समय में आस्ट्रेलिया-स्पेन का मैच बेनतीजा होने की वजह से एक्स्ट्रा टाइम में चला गया। फिर भी जीत-हार का फैसला नहीं हुआ। तब सडेन डेथ (जिसने भी पहला गोल किया उसकी जीत) का फैसला लिया गया। ऐसे में भारत और पाकिस्तान के मुकाबले में देर हो रही थी। दोनों तरफ बेचैनी बढ़ने लगी। कई खिलाड़ी चहलकदमी कर खुद को संभालने की कोशिश करने लगे। पाकिस्तान के खिलाड़ी ज्यादा नर्वस थे क्यों कि उनको अपना ताज बचाना था। आखिरकार मैच शुरू हुआ। तनाव तो पहले से था, कुछ ही देर में तकरार भी शुरू हो गयी। मैच शुरू होने के कुछ ही देर बाद पाकिस्तान के लेफ्ट इन अशद मलिक गेंद लेकर आगे बढ़े तो दुनिया के सबसे मजबूत बैक में शुमार पृथ्वीपाल सिंह उन्हें टैकल किया। अशद ने पृथ्वीपाल सिंह के साथ हल्की धक्कामुक्की कर दी। रेफरी ने मैच रोक दिया। फाउल खेलने के लिए चेतावनी दी गयी। बीच बचाव के बाद मैच फिर शुरू हुआ। पहले हाफ में दोनों टीमों ने जबर्दस्त खेल दिखाया लेकिन कोई गोल नहीं हो सका।

यूं हुआ गोल्डन गोल
हाफ टाइम में भारत के कप्तान चरणजीत सिंह ने अपने साथी खिलाड़ियों से कहा कि पाकिस्तानी खिलाड़ी ध्यान भटकाने के लिए उन्हें उकसा रहे हैं। इसलिए उनकी चाल में फंसना नहीं है। दूसरे हाफ का मैच शुरू हुआ तो भारत के फॉरर्वड हरबिंदर सिंह और जोगिन्दर सिंह ने पाकिस्तान के गोलपोस्ट पर ताबड़तोड़ हमला बोल दिया। दूसरे हाफ में अभी पांच मिनट का ही खेल हुआ था कि भारत को पेनल्टी कॉर्नर मिला। तब पृथ्वीपाल सिंह को दुनिया का नम्बर एक पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ माना जाता था। वे टोकियो ओलम्पिक में 11 गोल कर चुके थे। लेकिन ये मौका उनके लिए जीवन-मरण के सवाल था। उनकी कामयाबी पर ही भारत का भविष्य टीका था। वे पेनल्टी कॉर्नर लेने आये। अपनी प्रतिष्ठा के मुताबिक उन्होंने गेंद निशाने पर मारी। हिट जोरदार थी। गेंद गोलकीपर के पैड से टकरा कर गोलपोस्ट में जा ही रही थी कि पाकिस्तान के बैक ने मुनीर दार ने उसे पैर से रोक दिया। भारत को पकिस्तान के खिलाफ पेनल्टी स्ट्रोक मिला। मोहिंदर लाल पेनल्टी स्ट्रोक लेने आये। वे ये कीमती मौका गंवाना नहीं चाहते थे। उन्होंने देखा कि पाकिस्तान के गोलकीपर अब्दुल हमीद नाटे कद के हैं। तब उन्होंने गोलपोस्ट के ऊपरी सिरे पर एक दनदनाते हुए शॉट लगाया। गेंद गोलपोस्ट में समा चुकी थी। भारत ने 41 वें मिनट में ये गोल किया जो मैच का एकलौता गोल साबित हुआ।

जीत की खुशी में उमंग की तरंग
आखिरी लम्हे में पाकिस्तान ने पूरा जोर लगाया लेकिन भारत के करिशमाई गोलकीपर शंकर लक्ष्मण अभेद्य दीवार की तरह खड़े रहे। उन्होंने पाकिस्तान को मिले एक पेनल्टी कॉर्नर और एक शॉर्ट कॉर्नर को बखूबी बचाया। इस प्रदर्शन के लिए शंकर लक्ष्मण को मैच का सर्वश्रेषठ खिलाड़ी चुना गया। भारत के महान धावक मिल्खा सिंह भी ये मैच देख रहे थे। जैसे ही रेफरी ने मैच खत्म होनी की सीटी बजायी, मिल्खा सिंह और दूसरे भारतीय खिलाड़ी खुशी के मारे मैदान में कूद पड़े। बीच मैदान पर ही वे भांगड़ा करने लगे। भारत ने पाकिस्तान को 1-0 से हरा कर ओलम्पिक हॉकी का सातवां गोल्ड मेडल जीत लिया था। इस जीत से पूरे भारत में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। चरणजीत सिंह की कप्तानी में जब भारतीय टीम ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीत कर दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर पहुंची तो रात के 9 बज चुके थे। एयरपोर्ट पर लोगों की भारी भीड़ जमा थी। उस समय पालम हवाई अड्डे पर सुरक्षा को लेकर उतनी सख्ती नहीं थी। लोग रनवे तक पहुंच गये और खिलाड़ियों को कंधे पर उठा लिया। हर तरफ जोश और उमंग की तरंग दौड़ रही थी। इसके बाद एक दिल्ली में एक विशाल विजय जुलूस निकला गय। जनता ने अपने राष्ट्रीय नायकों का दिल खोल कर स्वागत किया।
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